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सोने की चमक से सब हैरान
Fri, 06 Mar 2020 07:19 PM IST
Raman Singh
मधुरेन्द्र सिन्हा
मधुरेन्द्र सिन्हा
Published by: Raman Singh
Updated Fri, 06 Mar 2020 07:19 PM IST
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सोना
- फोटो : a
सोना अपनी चमक से सभी को हैरान किए जा रहा है। उसकी कीमतें हैं कि बढ़ती ही जा रही हैं और नए कीर्तिमान बनते ही जा रहे हैं। हालत यह है कि सोना स्टैंडर्ड प्रति दस ग्राम 43,400 रुपये की सीमा रेखा को पार कर चुका है और 44,000 की ओर बढ़ चला है। सिर्फ तीन महीने में सोने ने लगभग चार हजार रुपये की जबर्दस्त छलांग लगाकर सभी को चकाचौंध कर दिया है। पिछले साल सोने के दामों में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह अब भी बढ़ रहा है। सोने के दाम इतने बढ़ जाएंगे, ऐसा किसी ने सोचा भी नहीं था। इसकी कीमतें यहीं ठहर जाएंगी या आगे जाएंगी, यह कहना बेहद मुश्किल है। वैसे ज्यादातर विशेषज्ञ मानते हैं कि यह साल भी सोने की बुलंदियों का साल होगा।
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दरअसल भारत में सोने की खदानें अब लगभग बंद ही हैं और वहां सोने की प्राप्ति नहीं के बराबर हैं। इसलिए हमें लगभग सारा सोना आयात करना होता है। भारतीयों के सोने के प्रति मोह का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि हमारा देश हर साल औसतन लगभग 800 टन सोना आयात करता है। क्या आम आदमी, क्या रईस सभी तो सोने के दीवाने हैं। यह पीली दुर्लभ धातु सदियों से हमें ललचाती रही है और हमारी महिलाएं स्वर्णाभूषणों की तो हमेशा से दीवानी रही हैं। और इसलिए वर्षों से हम सोना आयात करते रहे हैं। लेकिन इसकी लगातार बढ़ती कीमतें देश के आयात बिल को जरूरत से ज्यादा बढ़ाती जा रही हैं। अब सोने की कीमतें फिर बढ़ती जा रही हैं, तो जाहिर है कि आयात का बिल भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
सोने की कीमतें भारत में भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर निर्भर करती हैं। सच तो यह है कि दुनिया भर में सोने की कीमतें कमोबेश एक जैसी ही रहती हैं, लेकिन फर्क टैक्स का होता है। इस समय सोने की कीमतें भी कोरोना वायरस से प्रभावित हो गई हैं। जब कभी दुनिया में कोई बड़ा संकट मंडराने लगता है, तो उस समय सोने के दाम इसलिए बढ़ जाते हैं, क्योंकि निवेशक इसे निवेश का सुरक्षित माध्यम मानने लग जाते हैं। पिछले दिनों जब चीन और अमेरिका में व्यापार युद्ध बढ़ने लगा था, तो इसके दाम बढ़ गए थे और उसके पहले जब अमेरिका तथा ईरान में जबर्दस्त तनाव चल रहा था, तब भी इसके दाम बढ़े थे। सोना हमेशा से अपने निवेशकों को उनके भविष्य के बारे में विश्वास दिलाता है। शायद यही कारण है कि हमारे यहां बेटियों को विवाह के अवसर पर सोना देकर विदा करने का रिवाज रहा है।
सोने के दाम भी अर्थशास्त्र के सामान्य नियम 'आपूर्ति और मांग' पर निर्भर करते हैं। दुनिया भर में सोने की खदानें बहुत कम हैं और सोने का उत्पादन बहुत कम ही हो पाता है और इसकी मांग है कि घटती नहीं। इस वजह से यह दुर्लभ कमोडिटी है और इसकी कीमतें भी कम नहीं होतीं। इसके अलावा ग्राहकों का व्यवहार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दिलचस्प बात यह है कि सोना अन्य जिन्सों की तरह उपयोग के बाद खत्म नहीं हो जाता है। यह बना रहता है और हर साल दुनिया में सोने की उपस्थिति बढ़ती जाती है। इतना भंडारण होने के बावजूद इसकी कीमतों का न गिरना अपने आप में एक कहानी है। सोने के साथ एक और बात है कि वह आभूषण बनाने तथा छोटे-मोटे उद्योगों के अलावा किसी और काम का नहीं है। इसलिए इसे डेड एसेट भी कहते हैं।
सोना खरीदने वालों में आम जनता और कुछ कॉरपोरेट के अलावा दुनिया भर के सेंट्रल बैंक हैं, जो अपनी तिजोरियों में देश की आर्थिक स्थिति के अनुसार सोने की खरीद-बिक्री करते हैं। दरअसल वे सोने के सबसे बड़े ग्राहक होते हैं और एक बार में सैकड़ों टन सोना खरीदते हैं, लेकिन उनकी खरीदारी तब होती है, जब आम उपभोक्ता इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाता। जब वे सोना बेचते हैं, तो उसकी कीमतें भी गिरती जाती हैं। और इसलिए 1999 में 13 देशों के सेंट्रल बैंकों ने एक समझौता किया कि वे जब सोने को बेचेंगे, तो इस चालाकी से बेचेंगे कि बाजार भाव में खास कमी न आए। इस समझौते को 'वाशिंगटन एग्रीमेंट' का नाम दिया गया था और 2004 में इसमें कुछ संशोधन के साथ इसे लागू किया गया। इससे सोने की बड़ी बिक्री के कारण कीमतों में अत्यधिक गिरावट का अंदेशा खत्म हो गया। यह एक तरह की कार्टेंलिंग (गुटबंदी) ही कही जाएगी।
एक और बात है कि सोने की खदानों के प्रमोटर भी इसकी खुदाई बहुत सोच-समझकर करते हैं, ताकि बाजार में इसकी बहुलता न आ जाए। उनकी अंतरराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल स्वर्ण उद्योग के हितों का ख्याल रखती है और बाजार के हालात से उन्हें रूबरू कराती है, ताकि उनका मुनाफा बना रहे। यह दुनिया भर के सेंट्रल बैंकों के संपर्क में भी रहती है, ताकि सोने के दामों में ज्यादा उतार-चढ़ाव न हो। लेकिन एक और फैक्टर है, जो सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव के लिए जिम्मेदार है। यह है अंतरराष्ट्रीय सट्टेबाजों या सटोरियों का खेल। कारोबार की दुनिया में सट्टेबाजी सामान्य-सी बात है और पश्चिमी देशों तथा अमेरिका में तो यह खूब प्रचलन में है। सोने के अंतरराष्ट्रीय सट्टेबाज ज्यादातर अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में हैं। अमेरिकी अरबपति सट्टेबाज जॉर्ज सोरोस जैसे खिलाड़ी समय-समय पर सोने में सट्टा लगाकर इसकी कीमतों को उछाल देते हैं। सऊदी अरब के अरबपति उस जैसे सट्टेबाजों को फंडिंग करते रहते हैं। इसके लिए कई हेज फंड बने हुए हैं। ऐसा नहीं है कि भारत में इस पर सट्टा नहीं लगता, लेकिन सोने की ऊंची कीमतों के कारण यहां यह खेल बहुत सीमित पैमाने पर होता है। यह शादियों के सीजन में खास तौर से होता है, जब देश में सोने की मांग स्वतः बढ़ जाती है। भारत में सोने पर 12.5 प्रतिशत कस्टम ड्यूटी और 2.5 प्रतिशत जीएसटी होने के कारण सट्टेबाजी के बजाय तस्करी को ज्यादा बढ़ावा मिला है।
सोना महंगा है, बेशकीमती है और इसलिए यह हमेशा मांग में रहता है। कहते हैं कि सोने ने अपने निवेशकों को कभी निराश नहीं किया है और इसलिए समझदार निवेशक सोने को अपनी बचत पोर्टफोलियो में हमेशा रखते हैं।