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चुनाव और जंग में सब जायज

सुरेंद्र कुमार Updated Sun, 07 Apr 2019 07:03 PM IST
दोषारोपण
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इस बार के लोकसभा चुनाव को भारत के चुनावी इतिहास में सबसे आक्रामक चुनाव अभियान के रूप में याद रखा जाएगा, जिसमें किसी तरह का कोई अंकुश नहीं है। उत्तर-आधुनिक युग में प्यार और चुनाव में सब कुछ जायज है! महाभारत के अर्जुन की तरह राजनेताओं का एक ही लक्ष्य है-चुनाव में जीत। चुनावी अर्जुन जीतने के लिए साम, दाम, दंड, भेद का इस्तेमाल कर रहे हैं। गांधी की धरती पर गांधी को ही अप्रासंगिक कर दिया गया है। उम्मीदवारों के लिए सत्य ईश्वर का पर्याय नहीं है, यह परिवर्तनशील है! सत्य वही है, जो हम कहते हैं, बाकी सब झूठ है, विरोधियों का छल-कपट है, सफेद झूठ है! गांधी को छोड़ विभिन्न विचारधाराओं के हमारे राजनेताओं ने चीनी दिग्गज देंग श्याओ पिंग को गले लगा लिया है, जिनकी यह उक्ति बेहद लोकप्रिय है कि जब तक बिल्ली चूहे पकड़ती रहती है, तब तक इसका कोई मतलब नहीं कि वह सफेद है या काली!
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माना यह जाता है कि प्रतिस्पर्धा उत्कृष्टता की ओर ले जाती है। पर जब प्रतिस्पर्धा झूठ बोलने, झूठ का प्रचार करने, निराधार अफवाहें फैलाने और चरित्र हनन की हो, तो क्या उससे उत्कृष्टता बढ़ती है? प्रतिस्पर्धी राजनीति में विनम्रता की जगह नहीं है, हर कोई अपने किए का ढिंढोरा पीटता है और दूसरों के किए का भी श्रेय लेता है। मुद्दों का हल होगा या नहीं, यह बाद की बात है, जनता को यह भी याद नहीं रहता कि क्या वादा किया गया था। सबसे अहम है एक विश्वसनीय कहानी गढ़ना, जिस पर भरोसा किया जा सके। चुनावी नतीजों ने अक्सर साबित किया है कि जमीनी स्तर के कठोर यथार्थ के बजाय लहर पैदा करने में धारणाएं अधिक महत्वपूर्ण होती हैं। इस रणनीति का पहला हथियार है अपने विरोधियों को बुरा और खतरनाक बताना, अतीत में या वर्तमान में देश में जो कुछ भी गलत हुआ है, उसका दोष अपने विरोधियों पर मढ़ना और खुद को ईश्वर के भेजे दूत के रूप में पेश करना, जो सभी गड़बड़ियां ठीक करेगा और एक सुरक्षित, मजबूत, आत्मविश्वास से भरे, सुखी और वैश्विक स्तर पर सम्मानित नए भारत का निर्माण करेगा।

आज सारा दोष नेहरू को दिया जाता है। उन्होंने जो भी किया, वह गलत था! अगर वह देश के पहले प्रधानमंत्री नहीं होते, तो भारत कितना महान बन जाता! मैं जो करता हूं, वह सही है और आप जो करते हैं, वह गलत है! यदि लोगों ने आपको वोट देकर जिताया, तो आप देश को आपदा में धकेल देंगे, जबकि मेरे हाथ में देश सुरक्षित है। विकास का एजेंडा कहां है? क्या चुनावी बॉन्ड ने चुनावी चंदे में अस्पष्टता को शुरू नहीं किया है? क्या अब भी जाति महत्वपूर्ण नहीं है? मोदी का 'किसान सम्मान' या राहुल का 'न्याय' क्या है?

चुनावी प्रचार भारतीय प्रतिभाओं को आकर्षक नारों और मजाक उड़ाने वाले नए शब्द गढ़ने के लिए प्रेरित करता है। एनडीए सरकार के समर्थकों ने नियंत्रण रेखा के पार बालाकोट में सर्जिकल स्ट्राइक और शक्ति मिशन के जरिये मजबूत राष्ट्रवाद को हवा दी है। वे सरकार को लाखों रोजगार पैदा करने और सामाजिक व आर्थिक समावेशन के लिए सैकड़ों नवीन योजनाओं की शुरुआत कर निम्न आय वर्ग के करोड़ों लोगों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था में लाने का श्रेय देते हैं। जबकि विरोधी उस पर सशस्त्र बल और वैज्ञानिकों की सफलता का राजनीतिकरण कर चुनावी लाभ लेने का आरोप लगाते हैं। विरोधियों ने किसानों का संकट, बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था व घरेलू निवेश में सुस्ती, नोटबंदी और जीएसटी के खराब कार्यान्वयन के जरिये अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने, अपने लोगों को फलने-फूलने देने वाले पूंजीवाद को बढ़ाने देने, आर्थिक अपराधियों को देश से भगाने, संस्थानों में पसंदीदा लोग भरने, विभाजनकारी नीति और नफरत को बढ़ावा देने, अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला करने, अपने सारे बड़े वादों को चुनावी जुमला कहकर खारिज करने का भी सरकार पर आरोप लगाया है। वे प्रधानमंत्री मोदी पर यह भी आरोप लगाते हैं कि वह गंभीर मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय नाटकबाजी में लिप्त हैं।

मोदी के समर्थक कहते हैं कि उनकी सरकार ने 55 महीने में जो कर दिखाया, वह कांग्रेस 55 वर्ष में नहीं कर सकी। चुनावी रैलियों में मोदी खुद को चौकीदार बताते हैं, जो धरती के साथ-साथ समुद्र और अंतरिक्ष में भारत की रक्षा करेंगे। वह मतदाताओं को मिलावटी गठबंधन और 'सराब' के नेताओं से बचने की सलाह देते हैं, जिनके पास सिर्फ एक लक्ष्य-'मोदी हटाओ' के अलावा और कुछ नहीं है, जबकि वह देश बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

न रोम एक दिन में बना था, न ही भारत! इसे बनाने में वर्षों तक लाखों लोगों ने खून-पसीना बहाया है। सभी नेताओं ने अपने कार्यकाल में अपने-अपने तरीके से राष्ट्र निर्माण की पूरी कोशिश की। अगर इंदिरा गांधी के समय 1974 में परमाणु परीक्षण नहीं होता, तो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1998 में परमाणु परीक्षण नहीं होता। और इन परीक्षणों के बिना जॉर्ज बुश और डॉ. मनमोहन सिंह के बीच असैन्य परमाणु समझौता नहीं हुआ होता। कांग्रेस सरकार द्वारा 1991 में पेश किए गए आर्थिक सुधारों ने भारत के आर्थिक पुनरुत्थान की प्रक्रिया को गति दी; वर्ष 2006-2007 में हमारी विकास दर 9.6 फीसदी थी। कांग्रेस के काम और योगदान के बिना परमाणु रिएक्टर, डीआरडीओ, इसरो, चंद्रयान, सूचना का अधिकार, आधार और मनरेगा की कामना नहीं की जा सकती थी। इसी तरह जीएसटी, बैंकिंग ऐंड इन्सोल्वेंसी ऐक्ट, व्यापार सुगमता की सूची में भारत की छलांग, स्वच्छ भारत, जन धन, सौभाग्य, उज्ज्वला और दर्जनों अन्य समावेशी योजनाएं प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में शुरू हुईं। यहां तक कि मनरेगा और आधार ज्यादा कुशलता के साथ चल रहे हैं। 2013 की तरह दिल्ली की सड़कों पर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन क्यों नहीं हो रहे?

इसलिए जैसे यह कहना बेईमानी है कि कांग्रेस सरकारों के समय कुछ नहीं हुआ, वैसे ही यह कहना भी गलत होगा कि मोदी के शासन में कुछ नहीं हुआ। यह सही नहीं है! हम यह क्यों नहीं स्वीकार करते कि राष्ट्र निर्माण एक सतत प्रक्रिया है, जो लगातार चल रही है। दूसरे को बुरा बताने के बजाय उनके योगदान को स्वीकार करने में क्या समस्या है?
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