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मुद्दा : एआई क्रांति किताबों के लिए सीधा खतरा नहीं, लेकिन राजकीय संस्थाओं को करने होंगे महत्वपूर्ण प्रयास

Shyouraj Singh Bechain श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Thu, 27 Mar 2025 07:02 AM IST
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सार
एआई क्रांति किताबों के लिए सीधा खतरा नहीं है, लेकिन न्यूनाधिक डरावने संकेत तो हैं ही। ऐसे में, देश की राजकीय संस्थाओं के प्रयास महत्वपूर्ण हैं।
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AI revolution not direct threat to books, but there are scary signs
विश्व पुस्तक मेला में किताब देखते लोग। - फोटो : विवेक निगम

विस्तार

हाल ही में वरिष्ठ लेखिका क्षमा शर्मा ने ‘स्वीडन में किताबों की वापसी’ शीर्षक से लेख लिखा। स्वीडन फिर से कक्षाओं में किताबों का प्रयोग शुरू कर रहा है। इस पर 13.2 करोड़ डॉलर खर्च किए जाएंगे। सरकारों को चाहिए कि वे ऐसी नीति बनाएं कि किताबें बची रहें। ऐसे में स्वामी अछूतानंद की पंक्तियां स्मरण होती हैं-‘अपनी तरफ निहारो, अपनी दशा सुधारो’ तो देश में किताबों को लेकर भाषाई प्रकाशकों का योगदान स्मरण हुआ, साहित्यिक उत्सवों, लिटफेस्ट में लॉन्च होते सेलिब्रिटी राइटर्स दिखे हैं। संयोग से इस लेखक को कई लिटफेस्ट को अंदर-बाहर से देखने के भी अवसर मिले हैं।



सरकारों और स्वायत्त संस्थाओं के आयोजनों में किताब और किताब वाले की बात हुई। इसी वर्ष फरवरी में दिल्ली में सप्ताह भर ‘विश्व पुस्तक मेला’ भी पुस्तकों के लिए समर्पित रहा। समाज कल्याण विभाग, उत्तर प्रदेश और मेटाफर लखनऊ लिटफेस्ट की ओर से आठ से नौ फरवरी तक संपन्न हुए ‘भागीदारी साहित्य उत्सव’ में छोटे-बड़े कई प्रकाशकों के पुस्तक बिक्री केंद्र अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। दिल्ली यूनिवर्सिटी के ‘मिरांडा हाउस’ महाविद्यालय में 24 फरवरी को ‘लेखक से मुलाकात’ में खास बात थी, लेखक से केवल वही विद्यार्थी-शिक्षक प्रश्न पूछ सकते थे, जिन्होंने लेखक की कोई किताब अर्थात कविता, कहानी, निबंध या आत्मकथा पढ़ी हो। यह डॉ. संगीता राय, डॉ. उमा मीणा, डॉ. मधु, डॉ. अंकिता, कीर्ति और इशरत की सूझबूझ से संभव हुआ था। जिसकी वजह से प्रश्नकर्ता किताबों से गुजरकर आए थे। यही कारण था, वे एक लेखक से तीन घंटे तक सार्थक संवाद कर पाए।


किताबों के लिए कुछ अखबारों में जगह नहीं बढ़ रही है। हिंदी में इसकी आवश्यकता अधिक है। अंग्रेजी अखबारों के साप्ताहिक परिशिष्ट जरूर अंग्रेजी किताबों के अंश व समीक्षाएं देते रहते हैं। अमर उजाला कई वर्षों से साहित्यिक कृतिकारों को सम्मानित करता आ रहा है। विभिन्न राज्यों सहित राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक आयोजन हो रहे हैं, ‘साहित्य अकादमी’ में देश की सभी भाषाओं के लेखकों की भागीदारी हो रही है, जो हर वर्ष हर भाषा के लेखक को कई दशकों से सम्मान प्रदान कर रही है। अकादमी सम्मानित लेखकों की किताबें तो छापती ही है, अपितु राष्ट्रीय महत्व की गैर सम्मानित लेखक की स्तरीय रचना भी प्रकाशित करती है। यहां तक कि दलित, आदिवासी लेखकों की कृतियों के लिए भी खिड़की खोल रही है।

इस बाबत साहित्य अकादमी के प्रकाशन का संक्षिप्त विवरण अवलोकनीय है। साहित्य अकादमी के पुस्तकालय में कुल 2,59,233 किताबें हैं। जिनमें वर्ष 2024 में 3,048 नई किताबें और शामिल हुई हैं। मुख्यालय के पुस्तकालय में 1,87,207 और क्षेत्रीय कार्यालय के पुस्तकालय में नई जुड़ी पुस्तकों की संख्या 72,026 है। पुस्तकालय के कुल सदस्य 13,000 से अधिक हैं और वर्ष 2024 में 178 नए सदस्य बने हैं। साहित्य अकादमी ने वर्ष 2024 में 484 पुस्तकें प्रकाशित कीं, जिनमें 224 नई और 260 पुनर्मुद्रित पुस्तकें शामिल हैं। अकादमी को पुस्तक बिक्री से 7.50 करोड़ रुपये से ज्यादा की आय हुई। अकादमी ने कुल 117 पुस्तक मेलों का या तो आयोजन किया या उनमें सहभागिता की। इनमें एक मेला विदेश में लगा। यह वर्ष 2024 में 23 भाषाओं में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 24 भाषाओं में अनुवाद पुरस्कार तथा 24 भाषाओं में ही बाल साहित्य पुरस्कार प्रदान कर चुकी है।

कुल मिलाकर किताबों के हक में भारत की राजकीय और स्वायत्त संस्थाओं के प्रयास काफी आश्वस्त करने वाले हैं। ये महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि एआई और सोशल मीडिया क्रांति मुद्रित शब्दों के लिए सीधा खतरा नहीं हैं, तो न्यूनाधिक डरावने संकेत तो हैं ही। अंत में यह कहना कि पश्चिमी देशों में पुस्तक प्रेम बढ़ रहा है और हमारे यहां किताबें नहीं पढ़ी जाती हैं, तो यह भी पुस्तक प्रेम का एक पहलू है। वास्तव में पुस्तकें नहीं पढ़ी जा रही होतीं, तो प्रकाशित क्यों की जाती हैं?, पुस्तक मेले क्यों लगते हैं? यदि ऐसा होता तो साहित्य अकादमी का प्रकाशन रुक जाता, लेखकों से मुलाकातें औचित्यहीन हो जातीं और निजी प्रकाशक, तो कोई और लाभदाई धंधा कर लेते। दरअसल, हमारे यहां निराली विविधता है। यहां कुछ लोग पुस्तक देखकर दूर भागने वाले हैं, तो कुछ ऐसे प्रेमी भी हैं, जिन्हें पुस्तक सीने से लगाए बगैर नींद नहीं आती है। बढ़ती आबादी का एक रूप यह भी है कि हमारे यहां जेलों में डाकू-चोर बहुत हैं, तो समाज में साधु-संत भी कम नहीं हैं। पुस्तक की आमद स्वागतेय है। -लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय मेंे हिंदी के पूर्व विभागाध्यक्ष रहे हैं।

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