कृषि अध्यादेश: किसानों को अपने उत्पाद कहीं भी बेचने की आजादी

Amit Kohliअमित कोहली Updated Sat, 19 Sep 2020 05:05 AM IST
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किसान - फोटो : PTI

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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जून, 2020 में कृषि से संबंधित तीन अध्यादेश पारित किए थे, कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश, 2020, किसानों (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) का मूल्य आश्वासन अनुबंध एवं कृषि सेवाएं अध्यादेश, 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश, 2020। ये तीनों अध्यादेश कोविड-19 जैसी अभूतपूर्व आपदा में जारी तालाबंदी के दौरान लाए गए थे और संसद के मौजूदा मानसून सत्र में इन्हें कानून की शक्ल दिए जाने की उम्मीद है। देश में किसान अपने उत्पाद कृषि उपज मंडी में लाइसेंसधारी व्यापारियों को ही बेच सकते हैं। 
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इन मंडियों में व्यापारियों की संख्या कम होती जा रही है, जिससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा नहीं हो पाती, नतीजतन किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है। कानूनन किसान अपने उत्पाद बाहर खुले में नहीं बेच सकते थे, इसलिए वे मंडी के व्यापारियों के मोहताज बन जाते थे। कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश, 2020 किसानों को अपने उत्पाद कहीं भी बेचने की आजादी देता है। यह अध्यादेश कृषि उपज की ऑनलाइन खरीद-बिक्री को  भी मान्यता देता है और राज्य सरकारों को किसानों, व्यापारियों और इलेक्ट्रॉनिक व्यापार प्लेटफार्मों से किसी भी तरह के लेवी, मंडी शुल्क या उपकर लेने से भी रोकता है।
केंद्र सरकार ने दावा किया है कि ये किसानों, व्यापारियों और आम उपभोक्ताओं को कृषि उत्पाद बेचने, खरीदने, भंडारण और परिवहन करने जैसी गतिविधियों में आ रही अड़चनों को दूर करने के लिए व्यापक लोकहित में उठाए गए कदम हैं। इनके जरिये किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा, कृषि उपज मंडी समितियों का एकाधिकार खत्म होगा एवं व्यापारियों के बीच स्वस्थ
प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा। इससे कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री में कुशलता, पारदर्शिता और बाधा-रहित व्यापार को प्रोत्साहन मिलेगा। सरकार के मुताबिक, तीनों अध्यादेश किसान और व्यापारियों के हित में हैं और उन्हें अपना माल खरीदने-बेचने की आजादी देते हैं। अनुमान यह लगाया जा रहा है कि कृषि उत्पादों की स्वतंत्र खरीद-बिक्री सुनिश्चित करने के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था भी खत्म करने जा रही है। 

किसानों (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) का मूल्य आश्वासन अनुबंध एवं कृषि सेवाएं अध्यादेश, 2020 के तहत किसान किसी व्यक्ति, सहकारी संस्था, कंपनी आदि के साथ अपनी उपज को बेचने का अग्रिम करार कर सकते हैं। इस करार में उत्पाद की कीमत परस्पर सहमति से तय करने की छूट है। करार के तहत किसान को मिलने वाली रकम, उसके द्वारा बैंक या किसी सरकारी योजना से लिए गए कर्ज से लिंक कर दी जाएगी। यानी उपज के दाम मिलने पर पहले कर्ज चुकाया जाएगा, शेष रकम किसान के खाते में आएगी। कृषि उत्पाद की खरीद-बिक्री को नियंत्रित करने वाले राज्य सरकारों के कानून इस करार पर लागू नहीं होंगे। आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश, 2020 में संशोधन कर अनाज, दालें, खाद्य तेल और चीनी को आवश्यक वस्तु के दायरे से बाहर कर दिया गया है। यानी अब इनका असीमित संग्रहण, भंडारण और परिवहन किया जा सकता है। ये तीनों अध्यादेश कृषि उपज को खुले बाजार के हवाले कर रहे हैं। यानी आजादी के बाद से कृषि को मिले सरकारी संरक्षण का यह खात्मा है।

कृषि उपज के दाम नियंत्रित करना दोधारी तलवार है। उपज के दाम कम हों, तो किसान संकट में आ जाता है और अगर किसान को उपज का पूरा दाम दे दिया जाए, तो महंगाई अनियंत्रित हो सकती है। आमतौर पर अधिकांश मुल्कों की सरकारें अपने किसानों के हितों का संरक्षण करने के लिए कृषि उपज के बाजार भाव को नियंत्रित करने तथा जमाखोरी और मुनाफाखोरी रोकने के लिए विशिष्ट प्रावधान करती हैं। किसानों की हालत लगातार बदतर होते जाने के बावजूद आखिर विरोध में कोई व्यापक आंदोलन नजर क्यों नहीं आता? पहली बात तो यह कि किसान अपने आप में कोई एक समूह या वर्ग नहीं हैं। वे जाति, जोत, वर्ग और राजनीतिक प्रतिबद्धता (यानी वोट बैंक) के रूप में न केवल बंटे हुए हैं, बल्कि परस्पर संघर्ष करते भी नजर आते हैं। इससे जुड़ा दूसरा पहलू किसानों की हैसियत का है। हरित क्रांति का लाभ उठाने वाले किसानों ने न सिर्फ अपनी आर्थिक, बल्कि समाजिक और राजनीतिक हैसियत भी बढ़ाई। इनके राजनीतिक-आर्थिक हित हाशिये के उन किसानों से बेहद अलग और कुछ अर्थों में प्रतिकूल हैं, जो कम जोत की खेती करते हैं, कृषि आधारित अन्य दस्तकारी करते हैं या फिर कृषि मजदूर हैं। परिणामस्वरूप किसानों की समस्याएं गंभीर और व्यापक होते हुए भी राजनीतिक पटल पर कोई व्यापक किसान आंदोलन नजर नहीं आता। 

अगली समस्या नेतृत्व और उसकी समझ की है। आजाद भारत के इतिहास में किसान नेता के रूप में हम पांच-सात नामों की गिनती कर सकते हैं, जिनका काम और असर अधिकांशत: किसी भौगोलिक क्षेत्र या सामाजिक वर्ग तक ही सीमित रहा है। किसान नेतृत्व ऐसा राष्ट्रीय स्वरूप नहीं ले सका है, जिसके साथ तमाम इलाकों और वर्गों के किसान लामबंद हो सकें। किसान हित की बात करते हुए व्यापारी और कृषि मजदूर के हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती। आम उपभोक्ता के सरोकारों का भी ध्यान रखना जरूरी है। इस रूप में कृषि की बात किसी एक वर्ग या क्षेत्र की बात न रहकर एक व्यापक स्वरूप ग्रहण कर लेती है। नहीं भूलना चाहिए कि हाल में पेश हुए तीनों अध्यादेश कोई अकेली घटना नहीं है। 

एक बड़े एजेंडे के तहत सरकारों के समाजवादी और लोक-कल्याणकारी स्वरूप को सीमित करके बाजार की पहुंच और असर को बढ़ाया जा रहा है। उरुग्वे दौर की बातचीत में यह एजेंडा खुलकर सामने आया था, नतीजतन 1995 में विश्व व्यापार संगठन की स्थापना हुई थी। इसमें कृषि उपज के साथ-साथ तमाम क्षेत्रों में सरकारी संरक्षणवाद को खत्म करके बाजार में बेलगाम वित्त के प्रवाह को खुली छूट देने की वकालत की गई थी। हाल के अध्यादेश भी उसी शृंखला का हिस्सा हैं। तात्कालिक संकट की फौरी और पुरजोर प्रतिक्रिया जरूर होनी चाहिए, पर यहीं तक सीमित रह जाना व्यापक लड़ाई को कमजोर करने वाला कदम हो सकता है। इसकी राह तो आपसी संवाद और विमर्श से ही निकल सकती है। (सप्रेस) 
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