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समझौते और संदेश: बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत-जर्मनी साझेदारी को नई धार
Wed, 14 Jan 2026 06:16 AM IST
देवेश त्रिपाठी
अमर उजाला
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Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Wed, 14 Jan 2026 06:16 AM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज
- फोटो :
ANI
विस्तार
यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में अस्थिरता, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का पुनर्संतुलन, जलवायु संकट और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के दौर में जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की भारत यात्रा महज एक द्विपक्षीय कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में इसके रणनीतिक निहितार्थ अधिक व्यापक हैं। गौरतलब है कि यह यात्रा ऐसे समय में हुई है, जब दोनों देशों ने पिछले वर्ष ही रणनीतिक साझेदारी के 25 वर्ष पूरे किए हैं।
महज संयोग नहीं है कि आठ महीने पहले जर्मनी के चांसलर के रूप में पदभार संभालने के बाद मर्ज ने अपनी पहली एशिया यात्रा के लिए भारत को चुना, जो वैश्विक राजनीति में भारत के बढ़ते कद और जर्मनी की ‘इंडो-पैसिफिक’ रणनीति में दिल्ली की केंद्रीय भूमिका को ही रेखांकित करता है। जर्मनी यूरोपीय संघ (ईयू) की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के साथ ईयू में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार भी है, जबकि भारत, विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। मर्ज की यात्रा इसी पूरकता को ठोस समझौतों और साझेदारियों का रूप देने की कोशिश दिखी।
इस दौरान, सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि 19 समझौतों और आठ प्रमुख घोषणाओं का औपचारिक रूप लेना रहा, जो दोनों देशों के 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार दोगुना करने को लेकर उनकी प्रतिबद्धता को ही दर्शाता है। इसके अतिरिक्त, भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर मर्ज का समर्थन महत्वपूर्ण है, जिस पर आगामी 27 जनवरी को हस्ताक्षर किए जाने की संभावना है, जब यूरोपीय आयोग व यूरोपीय परिषद के प्रमुख आगामी गणतंत्र दिवस के अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि भारत में मौजूद होंगे।
मर्ज की यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रक्षा क्षेत्र में सहयोग को गति देने पर तो सहमति जताई ही, भारतीयों के लिए जर्मनी में ट्रांजिट वीजा की अनिवार्यता भी खत्म कर दी, जिससे दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क को बढ़ावा मिलेगा। पिछले पांच वर्षों के दौरान जर्मनी में रहने वाले भारतीयों की संख्या दोगुनी होकर तीन लाख तक पहुंच चुकी है, जिनमें से 60 हजार तो छात्र ही हैं। ऐसे में, दोनों देशों ने जर्मनी में रह रहे भारतीयों के हितों के मद्देनजर एक संस्थागत व्यवस्था पर सहमति दर्शाई, जो महत्वपूर्ण है।
इसके अतिरिक्त, उच्च शिक्षा, हरित हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर व क्रिटिकल खनिज पर भी महत्वपूर्ण घोषणाएं हुईं। कुल मिलाकर, मर्ज की यात्रा वैश्विक अस्थिरता के दौर में भारत की बढ़ती भूमिका को दर्शाती है, जिसकी पुष्टि उनकी टिप्पणी से भी होती है कि चुनौतीपूर्ण समय में भारत के साथ हाथ मिलाना जरूरी है। अमेरिका की अनिश्चित नीतियों के चलते बहुध्रुवीय हो रही दुनिया में भारत और जर्मनी जैसे लोकतांत्रिक व तकनीकी रूप से उन्नत देशों का सहयोग न सिर्फ इन राष्ट्रों, बल्कि वैश्विक व्यवस्था के लिए भी अहम हो सकता है।