फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   against the tradition of politics

राजनीति अपनी लीक बदलेगी

Thu, 06 Mar 2014 06:36 PM IST
स्वामी अग्निवेश
स्वामी अग्निवेश Updated Thu, 06 Mar 2014 06:36 PM IST
विज्ञापन
against the tradition of politics

जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की आंच में एक ऐसी राजनीतिक पार्टी का शासन छिना था, जो देश पर तानाशाही कर रही थी, लोकतंत्र को कुचल रही थी। 1977 में देश में जनता पार्टी की लहर आई। जहां तक मैं समझता हूं तब क्षेत्र, जाति, धर्म तमाम आग्रहों से ऊपर उठकर वोट पड़े थे। वह चुनाव एकतरफा था। उस बड़ी सफलता में कुछ कांग्रेस शासित राज्यों की सरकारें भी भंग कर दी गईं।

विज्ञापन


जनता पार्टी का यह कदम गलत था। पर इसी ऊहापोह में हरियाणा के विधानसभा चुनाव में मुझे भी पुंडरी से प्रत्याशी बना दिया गया। मैं तो आंध्र प्रदेश का रहने वाला था, लालन-पालन छत्तीसगढ़ में हुआ था। मैट्रिक के बाद कलकत्ता चला गया था। इस नाते हरियाणा की एक विधानसभा सीट पर लड़ना मेरे लिए मुश्किल होता। लेकिन आश्चर्य, मुझे कुछ नहीं करना पड़ा। न किसी ने जाति पूछी, न धर्म, न गांव का पता। यहां तक कि चुनाव के लिए जो पैसे जुटाए थे, उसमें भी कुछ पैसे बच गए। जब चुनाव परिणाम आए तो जीतने वाले उम्मीदवारों में मैं भी शामिल था। वह अद्भुत चुनाव था।
विज्ञापन


लेकिन इस चुनाव के बाद आगे जब भी चुनाव हुए, उसे तमाम विसंगतियों से घिरा पाया। चुनाव जीतने के लिए हर तरह की कोशिशें हुईं। कहीं कोई मर्यादा नहीं रही। एक तरह से राजनीति के चरित्र हनन की शुरुआत भी जनता पार्टी के समय से हो गई थी। किसी भी समय, किसी कारण जो लहर चलती है, उसके नुकसान भी होते हैं। ऐसे समय जनता में अंधश्रद्धा बढ़ती है। इस स्थिति में नेता अहंकारी हो जाते हैं। जनता पार्टी जिस लहर में मग्न थी, वही भंवर बन गई। सही मायनों में धन, जाति, धर्म, क्षेत्र के जरिये मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश ज्यादा होने लगी। आगे के दशक अच्छे दृश्य नहीं दिखाते। राजनीति पतन की ओर चलती गई। येन-केन चुनाव जीतना ही अहम हो गया। बाहुबलियों का सहारा भर नहीं लिया गया, बल्कि उन्हें ही टिकट दिए गए। चुनाव को निष्पक्ष बनाने की तमाम बातें चली हैं, पर यह दौर थमा नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन


आज इतनी लंबी यात्रा के बाद भी हम देखते हैं कि पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। बल्कि राजनीति का स्वरूप ‘सुप्रीमो’ मॉडल है। किसी राजनीतिक पार्टी में किसी हद तक कुछ कहने की स्वतंत्रता छीन ली जाती है। यह एक वाकये से समझा जा सकता है। जब मैंने चंद्रशेखर की जगह पार्टी अध्यक्ष बनने की इच्छा जताई थी, तो मेरे दफ्तर में तोड़फोड़ की गई। मुझे पार्टी तक से निकाला गया। आज हम लोकतंत्र की बात तो करते हैं, लेकिन राजनीतिक क्षेत्र की विसंगतियों को दूर नहीं कर पाए हैं। शायद इसी हताशा ने मुझे भी सक्रिय राजनीति से दूर कर दिया। संन्यासी की राजनीति दूसरों से अलग होती है। वह जिस नेता के गुण-दोष देखता है, उनको बताने में हिचक नहीं करता। दक्ष राजनीति शायद यह आचरण स्वीकार नहीं करती।

लेकिन सामाजिक आंदोलन के जरिये राजनीति से मेरा जुड़ाव बना रहा है। बंधुआ मुक्ति मोर्चा हो या देवराला कांड के बाद महिलाओं के हितों के लिए आवाज, मंदिरों में दलितों का प्रवेश या फिर उड़ीसा के वनवासी क्षेत्रों में आदिवासियों के किए गए काम की आहट राजनीति के मंचों तक पहुंचती रही। सत्ता तिलमिलाती रही। लोग राजनीति से संन्यास की ओर आते हैं। मैं संन्यास के साथ राजनीति में आया। सात अप्रैल, 1970 को दयानंद मठ, रोहतक में संन्यास की दीक्षा ली। उसी दिन मंच से आर्य समाज पार्टी की घोषणा की गई। इस पार्टी ने पलवल का उपचुनाव भी लड़ा था। फिर यह राजनीतिक यात्रा कई पड़ावों से होकर गुजरी। अभी इसमें विराम नहीं है। आज भी हम जैसे लोग चुनाव लड़ सकते हैं और किसी भी पार्टी से लड़ सकते हैं। यह राजनीतिक पार्टियों को सोचना है कि वे सामाजिक आंदोलनों से जुड़े लोगों, संतों से किस तरह काम ले सकती हैं।

मगर आज के राजनीतिक दौर पर कई चीजें हावी हैं। हालांकि कुछ बातों को आप सकारात्मक भी कह सकते हैं। अब मतपत्र नहीं लूटे जाते। राजनेताओं की जवाबदेही बढ़ी है। जनता सीधा संवाद कर रही है। कहना होगा कि अन्ना हजारे के आंदोलन या फिर उसी पृष्ठभूमि में आप पार्टी के कारण भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अभियान-सा छिड़ा है। इस अभियान को राजनीतिक ताकत मिली है। राजनीतिक पार्टियां बताना चाहती हैं कि वे इस अभियान में कहीं कमजोर नहीं पड़ रही हैं। युवा हर तरह से सवालों से लैस हैं। लेकिन मतदाता के दिलो-दिमाग पर छाने के लिए बाजार के नायाब तरीके हैं। रैलियां बीच में सिकुड़ गई थीं। फिर उनका दौर चल पड़ा है। मतदाता को प्रभावित करने के लिए तमाम सब्जबाग हैं। पहले राजनेता चुनाव में अपनी रणनीति बनाते थे। आज चुनाव के लिए पेशेवर रणनीतिकारों की मदद ली जाती है।


बदलते दौर में अब राजनेताओं को पुरानी परंपराओं को छोड़ना होगा। दुखद है कि इस देश में आदिवासी कोई मुद्दा ही नहीं है, जबकि वे इस समय सबसे ज्यादा शोषित हैं। ओडिशा जैसे प्रांत में शाह कमीशन की टिप्पणी है कि खदानों में साठ हजार करोड़ का घोटाला है। लेकिन जानकार कह रहे हैं कि यह तो पांच लाख करोड़ का मामला है। इसी तरह नक्सलवाद से निपटने में हमेशा चूक होती रही। सच तो यह है कि उस समस्या की तह तक हम पहुंच ही नहीं पाए। इसी तरह खाप के मामले में देखिए। खाप ने 1857 के स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई लड़ी है। कई जगहों पर खाप सकारात्मक भी है। कहीं कुछ झोल है, तो सुधार की जरूरत हो सकती है। लेकिन संकुचित राजनीति में चीजें उलझती जाती हैं, जबकि राजनीति का दायरा तो काफी बड़ा होना चाहिए।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed