दहेज के विरुद्ध: जब सुप्रीम कोर्ट ने दी इसे 'कानूनी आतंकवाद' की संज्ञा
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हाल ही में राजस्थान की एक अदालत ने एक पिता पर अपनी बेटी के ससुराल वालों को कथित तौर पर दहेज देने के संबंध में मामला दर्ज करने का निर्देश दिया। ऐसा ही आदेश विगत जनवरी में छत्तीसगढ़ में भी दिया गया। सामान्यत: यही माना जाता रहा है कि दहेज लेना अपराध है, जबकि दहेज मांगने से ज्यादा बड़ी सजा दहेज देने वालों के लिए निर्धारित की गई है। दहेज निरोधक कानून की धारा-3 के तहत दहेज देना अपराध है, जिसमें पांच साल की कैद की सजा है, जबकि दहेज मांगने पर कम से कम छह महीने और अधिकतम दो साल की सजा हो सकती है। दिल्ली की एक अदालत ने इसी संदर्भ में, 2010 में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि दहेज दोतरफा लेन-देन है। दहेज लेने-देने के मामले में वर पक्ष की तरह दुल्हन के परिजनों पर भी मुकदमा चलना चाहिए।
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सवाल यह है कि दहेज निरोधक कानून का एकतरफा इस्तेमाल क्यों होता है। अदालतों में सिर्फ दहेज लेने के मामले ही क्यों पहुंचते हैं? जब 1961 में दहेज निरोधक कानून बना था, तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि इस कानून का इस सीमा तक दुरुपयोग होगा कि सर्वोच्च न्यायालय इसे 'कानूनी आतंकवाद (जुलाई, 2005) की संज्ञा देगा। विधि आयोग ने अपनी 154वीं रिपोर्ट में स्वीकारा है कि आईपीसी की धारा 498ए के प्रावधानों का दुरुपयोग हो रहा है। ऐसा क्यों?
दरअसल संपूर्ण भारतीय समाज एक सामाजिक- सांस्कृतिक संक्रमण काल से गुजर रहा है। रिश्तों में, भौतिकता ने घुसपैठ कर ली है, जिसके चलते अहम टकराने लगते हैं। महिलाएं शिक्षित हुई हैं, उन्होंने अपने विधिक अधिकारों को जाना है और यह किसी भी समाज एवं देश की उन्नति के लिए अपरिहार्य भी है। पर इसके साथ दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह जुड़ा है कि निज स्वार्थ की पूर्ति हेतु, या क्रोध में महिलाएं अपने पति एवं ससुरालजनों पर दहेज का मिथ्या आरोप लगाती हैं। सामान्यत: कोई यह सहजता से स्वीकार नहीं करता कि महिलाएं झूठे आरोप लगा सकती हैं, क्योंकि उन्हें सिर्फ शोषित ही माना जाता रहा है। कुछ प्रतिशत पुरुषों के दुर्व्यवहार का उदाहरण देकर पूरे पुरुष वर्ग को आपराधिक मानसिकता का ठहराना घोर अमानवीयता है। यों तो दहेज निरोधक कानून आपराधिक है, पर इसका स्वरूप पारिवारिक है। पारिवारिक झगड़े को दहेज प्रताड़ना के विवाद में परिवर्तित करना सरल है। कानूनवेत्ताओं की मानें, तो दहेज प्रताड़ना के नब्बे प्रतिशत मामले झूठे पाए जाते हैं।
'हर कोई महिलाओं के अधिकारों को लेकर लड़ रहा है, लेकिन पुरुषों के लिए कानून कहां है, जो महिलाओं द्वारा झूठे केस में फंसा दिए जाते हैं? शायद इस बारे में कदम उठाने का वक्त आ चुका है।' दिल्ली के एक ट्रायल कोर्ट की टिप्पणी यह बताने के लिए काफी है कि सामाजिक व्यवस्था असंतुलित हो रही है। किसी एक के लिए न्याय के लिए लड़ाई इतने पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं हो जानी चाहिए कि दूसरा पक्ष बिना अपराध के ही प्रताड़ित और अपमानित होता रहे। दहेज निरोधक कानून महिलाओं के संरक्षण के लिए बना था, पर इसके निरंतर दुरुपयोग ने समाज के एक तबके को भयभीत कर दिया है। जरूरत इसकी है कि इस सामाजिक समस्या का हल समाज के भीतर से ही निकाला जाए। उल्लेखनीय है कि बिहार के मधुबनी और दरभंगा जिले के 32 गांवों के एक संगठन 'बत्तीसगामा समाज' ने विगत तीन सौ साल से दहेज लेने-देने पर प्रतिबंध लगा रखा है। क्या यह सारे देश में संभव नहीं है?