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क्या तिब्बत बदलेगा, लहर उठी है

Sun, 13 Sep 2020 05:59 AM IST
के. विक्रम राव विक्रम राव
विक्रम राव Published by: के. विक्रम राव Updated Sun, 13 Sep 2020 05:59 AM IST
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After the death of Naima tenjin will Tibet change
तिब्बत का झंडा

विशेष सीमा बल के तिब्बती मूल के एक युद्धरत सिपाही नाइमा तेनजिन की पूर्वी लद्दाख की पहरेदारी करते वक्त गत सप्ताह अचानक हुई मौत से एक चिंगारी उठी है। वह मुक्त तिब्बत के अभियान के लिए कारक, विस्फोटक भी बन सकती है। कारण है कि भाजपा के शीर्ष पधाधिकारी और कश्मीर मसलों के प्रभारी राम माधव ने शहीद सैनिक की शवयात्रा के समय दो सूत्र उच्चारे थे: 'भारत माता की जय' और 'जय तिब्बत देश।'


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गत सात दशकों से बौद्ध तिब्बत पर विस्तारवादी चीन के रक्तरंजित कब्जे को भारत सरकार मूक-बधिर बनकर स्वीकारती रही है। दलाई लामा ने कम्युनिस्ट आक्रांताओं से त्रस्त होकर ल्हासा के पोटाला महल से भागकर धर्मशाला नगर में शरण ली थी। तिब्बती (1958 से) जुल्म सहते रहे। लुके-छिपे लद्दाख के सीमावर्ती शिविरों को शरणार्थी बस्ती बनाते रहे। अब उन्हीं में से एक (सोनामलिंग शिविर के वासी) प्रहरी शहीद नाइम तेनजिन की विधवा और तीन संतानों की यही कामना है कि उनकी मातृभूमि निरंकुश कम्युनिस्टों के चंगुल से छूटे। क्या संयोग था कि 1962 में चीन द्वारा लद्दाख में एक बारूदी सुरंग डाली गई थी। इस पर 58 वर्ष बाद पैर पड़ने से इस सैनिक की मृत्यु हो गई थी।

अब पार्टी का काफी दबाव मोदी सरकार पर पड़ेगा। पारंपरिक नीति बदलेगी। मसलन किसी ने सोचा था क्या कि अनुच्छेद 370 हटेगा? लद्दाख कश्मीरी घाटी द्वारा मजहबी शोषण से आजाद होगा? इतिहास के छात्र याद करेंगे कि क्रूरतम तानाशाह जोसेफ स्टालिन की लाल सेना की गुलामी से बाल्टिक सागरतटीय राष्ट्र समूह लातविया, एस्टोनिया और लिथुआनिया छः दशक बाद स्वतंत्र होकर संयुक्त राष्ट्र के सदस्य बने। इंडोनेशिया का गुलाम रहा पूर्व तिमोर आजाद है। मुस्लिम-बहुल युगोस्लाविया से कटकर कोसोवो इस्लामी गणराज्य बना। ये सब निकट भूतकाल के वाकये हैं।

अतः तिब्बत की आजादी का एकमात्र आधार यही है कि वह हमेशा स्वशासित रहा। हर रूप और रंग, हर आकार तथा प्रकार से स्वतंत्र रहा। हान-नस्ल के चीनियों से एकदम जुदा है। इसी संदर्भ में याद कर लें कि पड़ोसी भारत और चीन कभी भी सटे ही नहीं थे। दोनों की सीमा नहीं थी। तिब्बत अधिकृत कर चीन की सीमा भारत पर आन पड़ी। अतः राम माधव की गूढ़ और मायने भरी उक्ति के मर्म में भविष्य की भारतीय-तिब्बत-नीति पल रही है। यूं भी प्रायश्चित के तौर पर भाजपा सरकार पश्चाताप तो अब कर ही रही है। तिब्बत पर भारत सरकार की ही नहीं, वरन् विपक्षी राजनीतिक दलों की दृष्टि भी शुर्तमुर्गी रही। किसी ने कभी भी कोई क्रियाशील कदम नहीं उठाया, भले ही सत्ता में रहे हों।

कम्युनिस्ट तो तिब्बत को चीनी साम्राज्यवाद का उपनिवेश मानते ही हैं। देशप्रेमी भारतीयों को अटल बिहारी वाजपेयी ने ज्यादा निराश किया। विपक्ष के नाते संसद में तिब्बत के मसले पर वह अक्सर हुंकारते थे। वह गरजे थे, 'तिब्बत को स्वतंत्र होने का अधिकार है। यदि तिब्बत के बारे में मौन धारण करके बैठे रहे, तो न हम तिब्बत के साथ न्याय करेंगे और न अपने साथ न्याय करेंगे।' (राज्य सभा, 27 अप्रैल 1989)। इसके ठीक तीन दशक पूर्व लोकसभा में (21 अगस्त 1959) अटल जी ने एक प्रस्ताव द्वारा नेहरू सरकार से मांग की थी कि तिब्बती मसले को संयुक्त राष्ट्र संघ में भेजना चाहिए। अपने पुराने तेवर को भुलाकर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राज्य सभा में (एक अगस्त 2003) को कहा, 'विपक्ष का नेता होकर मैंने तिब्बत की मुक्ति पर कई बयान दिए। मगर हम इतिहास को देखते नहीं रह सकते है।' वह तभी चीन की यात्रा पर से लौटे थे।

राम माधव के बयान के आधार में तिब्बत का इतिहास ही सबल प्रमाण है। इतिहास गवाह है कि 1949 में चीनी कब्जे के पूर्व तिब्बत एक सार्वभौम राष्ट्र था। ग्यांत्से और यातुंग शहरों में 1949 तक भारतीय व्यापारी एजेंट कार्यरत थे। नई दिल्ली में 1947 में संपन्न एशियन रिलेशन्स सम्मेलन में एक सार्वभौम राष्ट्र के रूप में तिब्बत शरीक हुआ था। भारतीय तीर्थयात्रा तब मानसरोवर जाने हेतु चीन से वीजा नहीं लेते थे। क्या विडंबना थी कि स्वेच्छा से महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत में विलय स्वीकारने के बावजूद जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर में आत्मनिर्णय का सुझाव रखा था, मगर तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद नेहरू ने उसे बौद्ध जनता के आत्मनिर्णय की बात तक नहीं की। इस खामोशी से उत्साहित होकर माओ ने तिब्बत को चीन की कटी हुई हथेली बताया। इस पंजे की पांच उंगलियां हैं- नेपाल, भूटान, सिक्किम, लद्दाख और अरूणाचल प्रदेश।

1913 में जब शिमला में भारत और चीन के बीच सीमावार्ता हुई थी, तो तिब्बत एक स्वाधीन राष्ट्र की भूमिका में शामिल हुआ था। तीनों राष्ट्र समान थे। जनरल च्यांग काई शेक के राष्ट्रपति काल में भी तिब्बत 1949 तक अपने राजदूत को बीजिंग में रखता था। राजधानी ल्हासा में भारतीय वाणिज्य दूतावास था। भारतीय बौद्ध, जिनमें राहुल सांकृत्यायन भी थे, ने तिब्बत को स्वतंत्र देश के रूप में देखा था। बौद्ध धर्म का यह महान केंद्रस्थल और उसके साठ लाख तिब्बतियों का आज कैसा हश्र है?

भारत को मानना और बतलाना होगा कि हांगकांग तथा ताईवान से तिब्बत भिन्न है। उन दोनों द्वीपों पर हान जाति की नस्ल वाले रहते हैं, जो चीन से अलग नहीं हैं। तिब्बत ही भारत की पूर्वोत्तर सीमाओं की सुरक्षा की गारंटी हो सकता है। इसी निमित्त से भारत स्वाधीन तिब्बत का पक्षधर है।
 

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