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एक साल बाद कश्मीर के हालात, बता रहे हैं रामचंद्र गुहा

Sun, 09 Aug 2020 06:20 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 09 Aug 2020 06:20 AM IST
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After One Year, Situation In Jammu And Kashmir, Ramchandra Guha Telling About
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Amar Ujala

पांच अगस्त, 2019 को भारत सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 को मृतप्राय कर दिया। इसके अगले दिन प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया, 'मैं जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के मेरी बहनों और भाइयों को उनके हौसले और धैर्य के लिए सलाम करता हूं। वर्षों से भावनात्मक ब्लेकमेल करने वाले निहित स्वार्थी समूहों ने कभी भी लोगों के सशक्तीकरण की परवाह नहीं की। जम्मू और कश्मीर अब उनकी जंजीरों से मुक्त हो गया है। एक नया सवेरा और बेहतर भविष्य इंतजार कर रहा है!'


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प्रधानमंत्री ने इसके बाद अगले ट्वीट में जम्मू और कश्मीर राज्य का कद छोटा कर उसे महज एक केंद्र शासित क्षेत्र में बदलने वाले वास्तुकार की सराहना की। नरेंद्र मोदी ने कहा, हमारे गृह मंत्री अमित शाह जी जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के लोगों का जीवन बेहतर बनाने के लिए लगातार काम कर रहे हैं। उनका समर्पण और परिश्रम इन बिलों के पारित होने में साफ दिखता है। मैं अमित भाई को विशेष रूप से बधाई देना चाहूंगा!

इन घोषणाओं को अब एक साल पूरे हो गए हैं। जम्मू और कश्मीर के लोगों से जिस 'बेहतर जिंदगी' और 'नया सवेरा' का वादा किया गया था, वह किस स्थिति में है? जम्मू और कश्मीर :  मानवाधिकार पर लॉकडाउन का प्रभाव, शीर्षक की एक रिपोर्ट में इन सवालों के जवाब मिलते हैं। जमीनी अध्ययनों और विस्तृत साक्षात्कारों पर आधारित यह रिपोर्ट एक स्वतंत्र नागरिक पहल फोरम फॉर ह्यूमन राइट इन कश्मीर ने जारी की है। जस्टिस मदन लोकुर और डॉ राधा कुमार की सह अध्यक्षता वाले इस फोरम में स्वतंत्र कानूनविद, थल सेना और वायु सेना के सम्मानित अधिकारी, नौकरशाह और लेखक शामिल हैं, जो लंबे समय से जम्मू-कश्मीर से जुड़े रहे हैं (स्पष्टीकरणः यह लेखक भी इस फोरम का सदस्य है, लेकिन इस विशेष रिपोर्ट में उसका कोई योगदान नहीं है)

एक शिक्षक के रूप में मुझे शिक्षा के क्षेत्र से शुरुआत करने दीजिए। इस क्षेत्र में पिछले वर्ष अगस्त में लगाए गए लॉकडाउन और सुरक्षा घेरे का प्रभाव, जैसा कि रिपोर्ट बताती है, खासतौर से बेहद बुरा पड़ा है। फोरम की रिपोर्ट में शिक्षकों और अभिभावकों के हवाले से कहा गया कि बच्चे खुद को अकेला, असुरक्षित और मानसिक रूप से रिक्त पा रहे हैं। एक अभिभावक ने टिप्पणी की कि स्कूल और कॉलेज जाने वाले विद्यार्थियों को इंटरनेट से वंचित करना वैसे ही है, जैसे मौजूदा 'डिजिटल दुनिया में उन्हें जीने के अधिकार से वंचित करना।'

देश में बाकी जगहों पर काम लाई जा रही जूम तकनीक 2जी कनेक्टिविटी में नहीं चल सकती। 2 जी के साथ ऑनलाइन क्लास में शामिल होने की कोशिश करने वाली श्रीनगर की एक स्कूली छात्रा की टिप्पणी थी :  ' खरखराती आवाजें, बार-बार टूटती काल, शोर-शराबा, आवाज की खराब गुणवत्ता और ठीक से नजर न आने वाले बोर्ड में लिखे शब्दों से मस्तिष्क पर जोर पड़ने लगा और इससे सीखने की यह प्रक्रिया बेहद कष्टप्रद अनुभव में बदल गई।' एक अन्य छात्रा का जवाब और तीखा था। उसने कहा, 'मौजूदा सत्ता चाहती है कि कश्मीरी हर चीज के लिए भीख मांगें।'

अतीत के अध्ययन दिखाते हैं कि दशकों के विवाद ने कश्मीरियों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। फोरम की रिपोर्ट में घाटी के एक मनोचिकित्सक के हवाले से दर्ज किया गया, 'अनुच्छेद 370 को खत्म करने के बाद लगाए गए लॉकडाउन के दौरान चिंता, हताशा और आत्महत्या की प्रवृत्ति से जुड़े मामले बढ़ गए।' चिंता और तनाव के कारण अनेक युवा ड्रग्स की ओर प्रवृत हो गए। 4 जी तक पहुंच की कमी ने कारोबार पर भी प्रतिकूल असर डाला है। रिपोर्ट्स कहती है, 'इंटरनेट पर प्रतिबंध से शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग को भारी नुकसान हुआ है। किसी लोकतंत्र में इंटरनेट पर यह सबसे लंबी बंदी है...। चीन या म्यांमार की तानाशाही सत्ताओं ने ही इंटरनेट पर इतनी लंबी अवधि के प्रतिबंध लगाए हैं।' और न ही कड़ी कार्रवाई से कश्मीर घाटी में सुरक्षा के हालात सुधरे हैं। वर्ष 2019 में अनुमानतः आतंकवाद की 135 घटनाएं हुईं; 2020 के उत्तरार्ध में कम से कम 80 घटनाएं हुई हैं। ऐसी घटनाओं में स्थानीय कश्मीरियों के मारे जाने का अनुपात बढ़ा है। इस बीच, जैसा कि रिपोर्ट का आकलन है, कश्मीर के अशांत माहौल से फायदा उठाने की पाकिस्तान की सात दशक से जारी कोशिशें जारी रहीं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 'अगस्त, 2019 के घटनाक्रम के बाद पाकिस्तान ने आतंकवादियों की घुसपैठ के लिए अभियान तेज करने के साथ ही सीमा पार से फायरिंग तेज की, जहरीले सोशल मीडिया अभियान के जरिये कश्मीरियों को भड़काने की कोशिश की...। ' भारत सरकार की कार्रवाइयों के कारण इस विवाद में चीन सक्रियता के साथ पाकिस्तान के साथ खड़ा हो गया।

पांच अगस्त, 2019 के बाद से कश्मीर में राज्य की कार्रवाई का सबसे हताश करने वाला पहलू है मानवाधिकारों का बेतहाशा उल्लंघन। जैसा कि फोरम की रिपोर्ट ने दर्ज किया, 'सरकार ने बार-बार भारतीय संविधान के प्रावधानों और अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन किया है, जिस पर उसने हस्ताक्षर किए हैं।' कश्मीर में पिछले एक वर्ष से की जा रही राज्य की अवैधानिक कार्रवाइयों में राजनेताओं (जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री शामिल हैं) की नजरबंदी शामिल है, जिन्होंने कभी दूर से भी हिंसक कार्रवाइयों का समर्थन नहीं किया। बच्चों को हिरासत में लेना, धारा 144 का बेजा इस्तेमाल, निर्दोष नागिरकों ( जिनमें बच्चे शामिल हैं) की पिटाई और हत्या, घरों को ध्वस्त करना और पुलिस द्वारा मामले दर्ज कर पत्रकारों को धमकाने  की घटनाएं इसमें शामिल हैं।

कश्मीर की राजनीतिक समस्याएं लंबे समय से चली आ रही हैं, फिर भी पिछले दशकों के संघर्ष के बावजूद यहां की अर्थव्यवस्था अधिकांश अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर रही है। अनेक आर्थिक और सामाजिक सूचकांकों पर जम्मू और कश्मीर बेहतर रहा है। (देखें, https://www.telegraphindia.com/india/jean-dreze-contests-amit-shah-with-gujarat-data/cid/1696457) अगस्त से दिसंबर, 2019 के बीच अकेले कश्मीर के उद्योगों को अनुमान है कि 18,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। तकरीबन पांच लाख कश्मीरी बेरोजगार हो गए। जम्मू और घाटी, दोनों ही जगहों पर कभी बागवानी और हॉस्पिटेलिटी क्षेत्र फलते-फूलते थे, केंद्र सरकार की कार्रवाई के बाद उन्हें भी नुकसान हुआ।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि जम्मू और कश्मीर में एक साल पहले किए गए बदलाव का आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से विनाशकारी प्रभाव पड़ा है। उद्योगों को भारी नुकसान हुआ है, हजारों लोगों का रोजगार छिन गया है; स्कूल और यूनिवर्सिटी के बंद होने से पढ़ाई बुरी तरह से प्रभावित हुई है; कर्फ्यू और नाकेबंदी के कारण स्वास्थ्य सेवाएं बाधित हुई हैं; क्षेत्रीय और स्थानीय मीडिया की आजादी छिन गई है। (फोरम की पूरी रिपोर्ट यहां हैः https://www.scribd.com/document/470117300/Kashmir-Human-Rights-Report#from_embed)

यह रूपरेखा है 'नया सवेरा' और 'बेहतर कल' की, जिसका वादा प्रधानमंत्री ने एक साल पहले कश्मीर के लोगों से किया था। कश्मीर के लोगों की तकलीफ नई नहीं है। यह अगस्त, 2019 के पहले से है। और इसके पीछे कई किरदार रहे हैं, जिनमें आतंकवाद को प्रायोजित करने वाला पाकिस्तान, घुमंतू इस्लामिक कट्टरपंथी और कश्मीर का अक्षम तथा कई बार अहितकारी राजनीतिक नेतृत्व। और न ही नई दिल्ली पांच अगस्त, 2019 से पहले सम्मान से पेश आई।

नेहरू, शास्त्री, इंदिरा और राजीव इत्यादि की सरकारों ने कश्मीर में कई वादे किए, लेकिन बाद में मुकर गए और उनके कार्यकालों में मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएं भी हुईं। मोदी-शाह की सरकार में पिछले एक वर्ष के दौरान इसमें और गिरावट आई है। हमारी सरकार की कार्रवाइयों से ऐसे सारे भारतीय शर्मिंदा होंगे, जिनमें जरा-सी भी नैतिक विवेक बचा हो, फिर उनकी धार्मिक आस्था या राजनीतिक संबद्धता कुछ भी क्यों न हो।

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