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वह आखिर नहीं आए

दिलीप गुप्ते Updated Mon, 03 Nov 2014 06:33 PM IST
After all, he not come
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डॉन फिल्म के लोकप्रिय संवाद को वारेन एंडरसन ने अपने जीवन में साबित कर दिखाया कि उन्हें पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। सारा देश उन्हें अपने यहां देखना चाहता था, अपराधी की तरह। कई लोग तो इसी उम्मीद में ऊपर पहुंच गए, जहां वह अब पहुंचे हैं। उन्हें भारत लाने के लिए जुलूस निकले, धरने दिए गए, ज्ञापनों के गट्ठर सौंपे गए और भूख हड़तालों की तो गिनती नहीं रही। उनके नाम के साथ मुर्दाबाद के नारे सुनकर कान फट गए थे, लेकिन सरकारों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा।
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मेरे यहां दूध वाले ने आना बंद कर दिया था। काम वाली बाई छुट्टियां मारने लगी थीं। चौकीदार नदारद रहने लगा। सब उसे वापस लाने के अभियान में जुटे थे। भिखारी ने भी कह दिया कि जब तक मैं एंडरसन को लाने के हस्ताक्षर अभियान में हिस्सा नहीं लेता, तब तक वह मेरे यहां से बासी रोटी नहीं लेगा। मैं उस अभियान में हिस्सा नहीं लेना चाहता था। सरकारी नौकरी जो करनी थी। वैसे मैं सच्चा देशभक्त हूं। लेकिन यथार्थवादी भी तो हूं। मैं जानता था कि उन्हें नहीं लाया जा सकता।

वह भारत क्यों नहीं आए, इसका कोई जवाब नहीं मिल सका। मिलता भी नहीं। उन्हें मालूम था कि यहां कोई खतरा नहीं है। बल्कि अगर वह अपराधी की तरह आते, तब भी उनका स्वागत ही होता। इस बात का मुझे भी यकीन था। जो लोग उन्हें तीस साल पहले सरकारी सम्मान से विदा कर सकते थे, वे आज भी उनका भव्य स्वागत कर सकते थे। फिर भी वह नहीं आए।मुझे तो मालूम ही था कि जो हाथ गरीबों के साथ होने का दावा करता है, वह अमीरों की डोर से बंधा है। जो चाल, चरित्र और चेहरे की बात करते हैं, उनकी चाल समय देखकर बदल जाती है। अगर एंडरसन आते, तो सच्ची बात बक जाते और स्वर्णिम अतीत वाले इस देश के वर्तमान पर कालिख पुत जाती। भारत का इतिहास बिना जयचंद के नहीं लिखा जा सकता। हमारे नेता, अफसर, मंत्री उसकी परंपरा जारी रखे हुए हैं। हमारी राजनीति और प्रशासन को नंगेपन से बचा ही लिया एंडरसन ने।
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