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अधिग्रहण और मुआवजा

Wed, 05 Dec 2018 06:13 PM IST
अवधेश कुमार
अवधेश कुमार Updated Wed, 05 Dec 2018 06:13 PM IST
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Acquisition and Compensation
अवधेश कुमार

तमिलनाडु का कांचीपुरम हिंदुओं के लिए अत्यंत पवित्र तीर्थस्थान है। शास्त्रों में जिन सात स्थानों को मोक्षदायिका कहा गया है, उनमें कांची का स्थान काशी के बाद आता है। किंतु यह शहर अभी दूसरे कारण से चर्चा में है। कांचीपुरम की एक स्थानीय अदालत ने एक ऐसा फैसला दिया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। रेल इंजन तथा जिला कलेक्टर कार्यालय के कंप्यूटर सहित अनेक सामान जब्त करने के आदेश के बारे में जब अखबारों में खबर छपी, तो उसे न रेलवे प्रशासन ने गंभीरता से लिया, न ही जिला प्रशासन ने। पर न्यायालय की सख्ती के बाद अधिकारी जब स्टेशन पर एक यात्री गाड़ी का इंजन जब्त करने पहुंचे, तो रेल प्रशासन के होश उड़ गए। अदालत ने ऐसा आदेश क्यों दिया? दरअसल रेलवे ने करीब तीस साल पहले एक परियोजना के लिए कुछ लोगों की जमीनों का अधिग्रहण किया था, पर उन्हें आज तक उसका मुआवजा नहीं मिला। मुआवजा देने का न्यायालय का आदेश न रेलवे मान रहा था, न जिला प्रशासन इसके क्रियान्वयन के लिए मुस्तैद होता था। ऐसे में न्यायालय को यह कदम उठाना पड़ा।


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जांच करने पर पूरे देश में ऐसे अनगिनत मामले मिल जाएंगे, जिनमें वर्षों पहले जमीन अधिग्रहण कर लिया गया, पर आज तक न लोगों को मुआवजा मिला, न ही पुनर्वास हुआ। इसलिए कांचीपुरम की स्थानीय अदालत का फैसला भले एक मामले तक सीमित हो, पर इसका आयाम देशव्यापी है। वहां 1989 में लोगों से जमीन ले ली गई और वे मुआवजे के लिए अभी तक भटक रहे हैं। आम आदमी की पीड़ा यही है। रेल इंजन जब्त करने के आदेश के बाद अधिकारियों को पुरानी फाइल खोजनी पड़ी। पता चला कि रेलवे ने मुआवजे की पांच करोड़ की राशि सरकार को दे दी थी। यदि यह राशि सरकार को मिल गई, तो भूमालिकों को क्यों नहीं मिली?

हमारा पूरा तंत्र आज तक किस आपराधिक तरीके से काम करता रहा है, इसका यह एक दिल दहला देने वाला उदाहरण है। जमीन वालों से आपने जमीन ले ली, पर उनके प्रति किसी की कोई जिम्मेवारी नहीं। वस्तुतः आजादी के बाद भी अंग्रेजों द्वारा बनाया भूमि अधिग्रहण कानून हमारे देश में जारी रहा, जिसमें जमीन मालिक के पास कोई अधिकार ही नहीं था। औने-पौने दाम और वह भी कब मिलेगा, यह निश्चित नहीं। फिर इसमें बिचौलिये भी आ गए, जो मुआवजा दिलवाने के एवज में अपना हिस्सा ले लेते हैं। ऐसा भी होता है कि बिचौलिये ने जमीन मालिक से दस्तखत करवाकर सरकारी विभागों के अधिकारियों-कर्मचारियों की मिलीभगत से घोषित मुआवजा उठा लिया और जमीन मालिकों को कुछ नहीं मिला। ऐसे भी मामले आए, जिनमें बिचौलिया न होने के बावजूद जारी मुआवजा जमीन मालिक को नहीं मिला। हालांकि अब भूमि अधिग्रहण कानून बदल गया है तथा किसानों या जमीन मालिकों को कई तरह के अधिकार दिए गए हैं।

कांचीपुरम के मामले ने पूरे देश का ध्यान इस समस्या की ओर खींचा है। प्रदेश सरकार को इसका संज्ञान लेकर सबसे पहले उन छोटे भूमालिकों के साथ हो रहे अन्याय को खत्म करना चाहिए। रेलवे द्वारा दिया गया धन कहां गया, इसकी छानबीन तो हो, पर इनको तुरंत मुआवजा दे दिया जाए। यही नहीं, जमीन मालिकों को 1989 के अनुसार नहीं, बल्कि 2018 के अनुसार मुआवजा मिलना चाहिए। भूमि अधिग्रहण के नाम पर देश में जितना अन्याय हुआ है, उसका उदाहरण किसी लोकतांत्रिक देश में शायद ही मिले। ऐसे में, लाजिमी यही है कि ऐसे सारे मामलों की सूची बनाकर हर राज्य एक अधिकार प्राप्त आयोग बनाए, उनकी छानबीन के आधार पर कार्रवाई हो एवं लोगों को उनका मुआवजा मिले। यही काम केंद्र सरकार भी करे। कांचीपुरम की अदालत का फैसला इस मायने में देश की आंखें खोलने वाला साबित होना चाहिए।

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