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सटीक मतदाता सूची लोकतंत्र की मूल शर्त: चुनाव आयोग व्यापक मतदाता सूची तैयार कर रहा है... आवधिक पुनरीक्षण जरूरी

Sat, 06 Dec 2025 05:44 AM IST
ज्योति भास्कर स्वपन दासगुप्ता (वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व राज्यसभा सदस्य)
स्वपन दासगुप्ता (वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व राज्यसभा सदस्य) Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 06 Dec 2025 05:44 AM IST
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सार
यह पहला मौका नहीं है, जब चुनाव आयोग एक व्यापक मतदाता सूची तैयार कर रहा है। हालांकि, इस बड़े पैमाने के कार्यक्रम के लिए कोई निश्चित समय निर्धारित नहीं है। जब तक यह आवधिक पुनरीक्षण नहीं किया जाएगा, चुनाव परिणाम जनभावना को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं करेंगे।
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accurate voter list foundation of democracy Election Commission comprehensive SIR Periodic revision essential
बिहार से हुई शुरुआत, अब 12 राज्यों में एसआईआर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पचास साल से भी अधिक समय पहले, भारतीय राजनीति के एक प्रतिष्ठित ब्रिटिश विद्वान ने व्यंग्यपूर्वक टिप्पणी की थी, ‘चुनाव उन चीजों में से एक है, जिन्हें भारतीय बहुत अच्छे से संपन्न करते हैं।’ भारतीय लोकतंत्र के स्थायी रूप से स्थगित या ‘निर्देशित’ होने की आशंका (जो पूरी तरह से गलत नहीं थी) की पृष्ठभूमि में, चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता को सार्वजनिक जीवन की एक उद्धारक विशेषता के रूप में देखा जाता था। लोकतंत्र के इस प्राथमिक स्तंभ की अंतिम पुष्टि 1977 में तब हुई, जब आपातकाल की छाया के बावजूद, मतदाताओं ने एक अधिनायकवादी शासन को वोट के जरिये सत्ता से बाहर कर दिया।



चुनाव आयोग की यह सुनिश्चित करने की क्षमता कि जनमानस की इच्छा विधायिकाओं में परिलक्षित हो, स्वतंत्रता प्राप्ति के पिछले सात दशकों में बार-बार परखी गई है। हालांकि, मार्ग से विचलित होने के उदाहरण भी हैं, इनमें 1972 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और 1987 का जम्मू-कश्मीर चुनाव उल्लेखनीय हैं, लेकिन, भारत का चुनावी अनुभव आमतौर पर राजनीतिक प्रणाली की वैधता बनाए रखने में सहायक रहा है। जैसा कि सर्वाधिक मत से जीत की प्रणाली में होता है, जो विधायी बहुमत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाती है, ऐसे उदाहरण भी हैं, जब हारने वाले लोग हैरानी में रह गए, जिनके चुनावी अभियान के अनुभव परिणाम से मेल नहीं खाते थे। 1971 में, एक पराजित पक्ष ने जोर देकर कहा कि सोवियत-निर्मित ‘अदृश्य स्याही’ के उपयोग ने इंदिरा गांधी को शानदार जीत हासिल करने में मदद की। उपग्रह द्वारा ईवीएम के हेरफेर के अविश्वसनीय दावे 2009 के आम चुनाव के बाद भी सुने गए थे।  


जो कभी साजिश सिद्धांतकारों का विशेषाधिकार हुआ करता था, वह अब हाशिये का मुद्दा नहीं रहा है। अपनी पार्टी के संख्या-विश्लेषकों से प्रोत्साहित होकर, जिनकी भविष्यवाणियां परिणाम से भिन्न थीं, विपक्ष के नेता ने मतदाता सूचियों की सत्यता को चुनौती दी है। जोरदार दावे किए गए हैं कि चुनाव आयोग विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का उपयोग कर अल्पसंख्यक मतदाताओं को इस आधार पर बाहर करने पर विचार कर रहा है कि वे भारतीय नहीं भी हो सकते हैं। यह विवाद पश्चिम बंगाल के राजनीतिक दलों के बीच खींचतान का विषय बन चुका है और यह असम तथा अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में भी फैल सकता है। 

चूंकि, संविधान का अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम चुनाव आयोग को चुनाव के संचालन के संबंध में ‘विशेष क्षेत्राधिकार’ देता है, इसलिए चुनावी प्रक्रिया को राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखा गया है। दशकों से चुनाव आयोग ने चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए कई नवाचार किए हैं। सबसे महत्वपूर्ण उपायों में आदर्श आचार संहिता शामिल है, जो अप्रिय राजनीतिक व्यवहार पर अंकुश लगाती है और ईवीएम ने वोटों में हेरफेर को कठिन बना दिया है, हालांकि यह असंभव नहीं है। अब मतदान केंद्रों पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती के लिए नियम मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त, प्रौद्योगिकी के प्रसार के साथ, चुनाव आयोग मतदान केंद्रों में सीसीटीवी कैमरों पर जोर दे रहा है, ताकि मर्यादा बनी रहे तथा मतदान अधिकारियों और मतदाताओं को डराया-धमकाया न जा सके।

यह सच है कि इन नवाचारों में से कोई भी पूर्णतः दोषरहित नहीं है। मतगणना केंद्रों सहित स्थानीय स्तर पर अक्सर बाहुबल का प्रभाव रहता है और इसके संभावित रूप से विकृत परिणाम हो सकते हैं। मतदान अधिकारियों द्वारा हेरफेर के अनुभवजन्य प्रमाणों को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। जब संसद में शीतकालीन सत्र के दौरान चुनाव सुधारों पर चर्चा होगी, तो संभव है कि देश को आदर्श लोकतांत्रिक आचरण के अन्य विचलनों के बारे में सुनने को मिले, जिनका चुनाव आयोग द्वारा समाधान किए जाने की आवश्यकता है। लोकतांत्रिक परियोजना में एक महत्वपूर्ण हितधारक के रूप में, संसद को आम जनता के लिए अपने व्यापक चुनाव अनुभव को संकलित करने की आवश्यकता है। हालांकि, अच्छी राजनीति के बड़े लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी, यदि कार्यपालिका चुनाव आयोग के खिलाफ आम धमकियों, जिनमें शारीरिक नुकसान भी शामिल है, का इशारा करती है और सरकारी अधिकारियों, जिनके शालीन आचरण पर पूरी प्रणाली निर्भर है, को अपने सांविधानिक कर्तव्यों का पालन करने से रोकती है। पश्चिम बंगाल में चल रहे एसआईआर के दौरान सत्तारूढ़ दल का आचरण शर्मनाक है। 

सटीक मतदाता सूची का अस्तित्व लोकतंत्र की मूल शर्त है। यदि वंचित समुदायों के सदस्य मतदान केंद्रों से दूर रहने के लिए मजबूर किए जाते हैं, तो इसका विरोध होना लाजिमी है। दुर्भाग्यवश, इस बात का विरोध काफी कम होता है, जब बड़ी संख्या में लोगों को मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जाता है या दोहरी-तिहरी प्रविष्टियां होती हैं, जो परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं। चुनाव आयोग ने फोटो के साथ मतदाता पहचान पत्र के माध्यम से धोखाधड़ी की समस्या को सुलझाने की कोशिश की है। हालांकि, धोखेबाजों ने मृत या स्थायी रूप से स्थानांतरित लोगों के नाम पर वोट देकर चुनाव प्रणाली को चकमा देने के तरीके खोज लिए हैं। पूर्वी भारत में अतिरिक्त समस्या यह है कि मतदाता सूचियों में उन व्यक्तियों को जोड़ दिया गया है, जो चुनावों में वोट देने के लिए अयोग्य हैं। वर्तमान एसआईआर प्रक्रिया पहला मौका नहीं है, जब चुनाव आयोग एक व्यापक मतदाता सूची तैयार कर रहा है। हालांकि, इस बड़े पैमाने के कार्यक्रम के लिए कोई निश्चित समय (जैसे हर 10 साल में एक बार या ऐसी कोई अन्य अवधि) निर्धारित नहीं है, लेकिन माना जाता है कि जब तक यह आवधिक पुनरीक्षण नहीं किया जाएगा, चुनाव परिणाम जनभावना को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं करेंगे।

20वीं सदी के शुरुआती दशकों में आयरलैंड के संदर्भ में कहा जाता था कि लोगों को ‘जल्द वोट दें और अक्सर वोट दें’ की सलाह दी जाती थी। एक उत्साही शोधकर्ता के लिए यह दस्तावेज बनाने लायक हो सकता है कि भारत के कुछ हिस्सों में किस प्रकार की अभिनव प्रथाएं प्रचलित हैं, जैसे मृत व्यक्तियों द्वारा मतदान या एक उम्मीदवार के मतों का उसके प्रतिद्वंद्वी के खाते में सहजता से स्थानांतरित हो जाना। विशेष गहन पुनरीक्षण रचनात्मक राजनीति के इन सभी उदाहरणों को इतिहास में नहीं बदल देगा, पर यह वैश्विक भरोसे में थोड़ी और दृढ़ता जोड़ेगा कि भारत चुनाव प्रक्रियाओं को अच्छे से संचालित करता है। आशा है कि आने वाले दशकों में किसी भी राज्य या क्षेत्र के बारे में यह नहीं कहा जाएगा कि वहां चुनाव नहीं होते, बल्कि उन्हें ‘प्रबंधित’ किया जाता है।

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