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ग्राम प्रधानों की जवाबदेही तय हो

Fri, 28 May 2021 10:09 AM IST
सुभाष कुशवाह सुभाष चंद्र कुशवाहा
सुभाष चंद्र कुशवाहा Published by: सुभाष कुशवाह Updated Fri, 28 May 2021 10:09 AM IST
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Accountability of village pradhan should be fixed
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गांवों में ग्राम प्रधान का पद कुछ दशकों में महत्वपूर्ण बन चुका है। मनरेगा के आने के बाद, गांवों के विकास के लिए प्रधानों के हाथों में जबसे सरकारी बजट का महत्वपूर्ण हिस्सा पहुंचने लगा, तभी से वे गांव के प्रशासक की हैसियत से काम करने लगे। पंचायतीराज व्यवस्था के बहाने गांवों में ग्राम प्रधान के रूप में एक माफिया तंत्र को भी बढ़ावा मिला। उसके सहारे गांव के वोट बैंक को चुनावों में आखेट करने का प्रयास किया जाने लगा। गांव के सभी निर्माण कार्य, चाहें वे कच्चे हों या पक्के, प्रधानों के माध्यम से हो रहे हैं। दूर-दराज के गांवों पर स्थानीय प्रशासन की पकड़ न के बराबर होती है। 


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केवल सामाजिक संरचना के सहारे गांवों की व्यवस्था संचालित होती है। गांवों के विकास के लिए आवंटित धन का व्यय ग्राम प्रधान को करना होता है। काम कराना, घटिया काम कराना या न कराना उसके हाथ में होता है, बशर्ते कि वह स्थानीय प्रशासन तक, गांव की बजट राशि का एक निश्चित हिस्सा पहुंचाता रहे। यह अकारण नहीं है कि तमाम गांवों में सुलभ शौचालयों के रंगीन बोर्ड तो दिखते हैं, मगर अंदरखाने शौचालयों का निर्माण नहीं दिखता। जो शौचालय बनाए गए, उनमें गांव वाले लकड़ी और दूसरे सामान रख रहे हैं। खुले में शौच की प्रथा बदस्तूर जारी है। तो यह सब इसलिए संभव हो पा रहा है, क्योंकि गांव का  प्रधान और स्थानीय प्रशासन का नाभिनाल आपस में जुड़ा हुआ है। एक ही चकरोड पर बार-बार मिट्टी भराई दर्शाई जाती है और बरसात बाद उसे बहा दिया जाता है। उस बहाव से जो धन प्राप्त होता है, वही ग्राम प्रधानों को सामंती ठाटबाट से सजा देता है। उनकी कोठियों के आगे गाड़ी, ट्रैक्टर-कंबाइन और बैठकखाना गुलजार हो जाता है। यही वर्तमान पंचायतीराज-व्यवस्था की देन है। ग्राम प्रधानों का पद जब से लाखों की कमाई वाला हुआ, तब से खाड़ी देशों से लेकर मुंबई में कमाई करने वाले लोग भी गांव आकर प्रधानी का चुनाव लड़ने लगे। 

कोरोना काल की दूसरी लहर ने जिस तरह गांवों को प्रभावित किया है, गांव वाले स्वयं को अकेला और असहाय महसूस कर रहे हैं। ऐसे में ग्राम प्रधानों की आपदा के समय भूमिका तय करने का समय आ चुका है। ऐसा नहीं हो सकता कि मलाई खाने के लिए प्रधान जी गांव के मुखिया नजर आएं और आपदा की घड़ी में सेवा करने के बजाय गांव वालों को अकेला छोड़ दें। सरकारी धन से निर्माण कार्य में प्रधान की रुचि है, तो गांव में आपदा प्रबंधन का कार्य कौन करेगा? स्थानीय प्रशासन की पहुंच गांवों में प्रधान के बिना कैसे होगी?

कोरोना की पहली लहर के समय जब प्रवासी मजदूरों का गांवों की ओर पलायन हुआ था, तब उत्तर प्रदेश में प्रधानों को यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वे अपने गांवों में आने वाले प्रवासी मजदूरों को क्वारंटीन रखें। तब लगभग बीसों गांवों के भ्रमण के दौरान मैंने पाया था कि एकाध प्रधानों को छोड़कर, किसी ने इस दिशा में कोई रुचि न दिखाई थी। किसी ने गांवों में मास्क का वितरण नहीं किया था और न सैनिटाइजर उपलब्ध कराया था। जो मजदूर बाहर से आए थे, वे अपने छोटे-छोटे घरों में परिवार वालों के साथ देखे गए। प्रधानों ने उन्हें क्वारंटीन करने में रुचि न दिखाई। इसका मूल कारण यह था कि कोई भी अपने वोटर
की इच्छा की उपेक्षा नहीं करना चाहता था। 

कोरोना की दूसरी लहर में प्रधानों एवं स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों ने गांवों के संक्रमित लोगों को चिह्नित करने का काम नहीं किया। ऐसी महामारी के समय ग्राम प्रधानों की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए थी। अगर स्थानीय प्रशासन ने ग्राम प्रधानों के जिम्मे कोरोना मरीजों की देखरेख करने, उनकी सूचना प्रशासन को देने और मृत्यु की दशा में दाह-संस्कार करने के दिशा-निर्देश दिए होते, तो आज गंगा सहित अन्य नदियों में लाशों के बहने का वीभत्स दृश्य देखने को न मिलता। आने वाले समय में कोरोना प्रकोप की आशंका बनी हुई है। ऐसे में गांवों में संक्रमित मरीजों की देखरेख के लिए दिशा-निर्देश और जिम्मेदारी ग्राम प्रधानों पर डाली जानी चाहिए। इसके बिना गांवों में आपदा प्रबंध संभव नहीं होगा।

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