फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   aaication of maa saraswati devi

मां शारदा देवी की ममता

Tue, 05 Feb 2013 12:39 AM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Tue, 05 Feb 2013 12:39 AM IST
विज्ञापन
aaication of maa saraswati devi

दूसरों की सेवा-सहायता करने से कितना पुण्य मिलता है, यह हमारे नीतिशास्त्रों और धर्मग्रंथों में बखूबी बताया गया है। अगर कोई दीन-दुखियों की सेवा-सहायता में अपना जीवन होम करता है, तो उसे स्वतः मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

विज्ञापन


वर्ष 1917 की बात है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस की सहधर्मिणी मां शारदा देवी जयरामबाटी (पश्चिम बंगाल) में श्रद्धालुजनों को उपदेश दे रही थीं। उन्हें पता चला कि एक अनाथ विधवा के शरीर का कोई अंग सड़ गया है। दुर्गंध के कारण कोई उसके पास तक नहीं फटकता।
विज्ञापन


मां ने ठाकुर जी की पूजा बीच में छोड़ दी। नीम के पत्ते उबलवाए और अपनी एक भक्त महिला को साथ लेकर रोगी के पास जा पहुंचीं। उन्होंने उसके घाव को नीम के पानी से धोया। उसमें से कीड़े बाहर निकाले तथा अपने भक्तों से कहा, इसे तुरंत आश्रम ले चलो। अनाथ रोगी की सेवा करोगे, तो ठाकुर जी की पूजा से जो पुण्य प्राप्त होता है, उससे कई गुना ज्यादा मिलेगा।
विज्ञापन
विज्ञापन


मां के आदेश से अनाथ महिला रोगी को ग्वालपाड़ा के आश्रम में लाया गया। वहां मां स्वयं उसकी सेवा करतीं, उसे गरम दूध पिलातीं और परम संतोष का अनुभव करती थीं। मां ने भक्तजनों के बीच कहा, ठाकुर (रामकृष्ण परमहंस) तथा नरेन (स्वामी विवेकानंद) के मिशन का सार यही है कि रोगियों और गरीबों की सेवा मानव का सर्वोपरि कर्तव्य है, और इस धर्म का पालन जीवन के हर क्षण में करना चाहिए।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed