फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   A New Dawn in Land of the Rising Sun: A Look at Capitalist and Communist Ideology in Japan

उगते सूरज के देश में एक नया सवेरा : जापान में पूंजीवादी और साम्यवादी विचारधारा पर एक नजर

Sun, 18 Sep 2022 06:36 AM IST
Vir Singh वीर सिंह
Updated Sun, 18 Sep 2022 06:36 AM IST
विज्ञापन
सार
पूंजीवाद की विफलताओं का सामना कर रहे जापान की दशा पर कैपिटल इन द एंथ्रोपोसिन जैसी किताब लिखने वाले कोहेई सैटो को लगा था कि मार्क्सवाद के पहलुओं पर आधारित पुस्तक का चलना कठिन होगा, पर अब तक इसकी पांच लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं।
loader
A New Dawn in Land of the Rising Sun: A Look at Capitalist and Communist Ideology in Japan
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : istock

विस्तार

आजकल जापान के मानस में एक अद्भुत हलचल है, जिसकी लेखन जगत में भी बहुत चर्चा है। साम्यवाद कभी जापान को प्रभावित नहीं कर पाया। पूंजीवाद ने जापान को बहुत कुछ दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी की ऐतिहासिक मार के बाद पूंजीवादी दुनिया का सिरमौर बने जापान को एक बार तो पूंजीवाद का आदर्श-सा माना जाने लगा था। लेकिन लगता है अब जापान पूंजीवाद का पल्लू छोड़ जीवन के नए विकल्प खोज रहा है। 



जापानियों को लुभाने वाला एक मंत्र एक 'हरित घोषणा पत्र' के रूप में कोहेई सैटो की पुस्तक कैपिटल इन द एंथ्रोपोसिन में प्रकट हुआ है। जापानी लोगों, विशेषकर युवाओं में, यह पुस्तक एक अप्रत्याशित हिट बन गई है और इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया जा रहा है। इतना ही नहीं, जापानी युवाओं के मन में यह पुस्तक एक नई सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक विचारधारा के बीज रोपित करती प्रतीत होती है। उगते सूरज के देश में एक नया सवेरा! पुस्तक के लेखक कहते हैं: 'अगर आर्थिक नीतियां विफल हो रही हैं, तो हम जीवन का एक नया तरीका क्यों नहीं खोजते? उसकी इच्छा अचानक होती है।'


जब तक दुनिया पूंजीवाद पर 'आपातकालीन ब्रेक' लागू नहीं करती और 'जीवन जीने का नया तरीका' तैयार नहीं करती, तब तक जलवायु संकट मुंह बाए खड़ा रहेगा। जापानी अकादमिक कोहेई सैटो की मार्क्सवाद और पर्यावरण पर पुस्तक एक आश्चर्यजनक बेस्टसेलर बन गई है। पुस्तक में लेखक का मार्क्सवाद की ओर झुकाव है, लेकिन केवल पर्यावरण के रक्षार्थ। पूंजीवाद केवल प्रकृति विनाश की लीला रचता है।

कोहेई सैटो, जो टोक्यो विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर हैं, का संदेश सरल है: असीमित लाभ के लिए पूंजीवाद की मांग ग्रह को नष्ट कर रही है और केवल 'डिग्रोथ' (अर्थात वृद्धि में गिरावट) सामाजिक उत्पादन को धीमा करके और धन को साझा करके नुकसान की भरपाई कर सकती है। व्यावहारिक रूप से, इसका अर्थ है बड़े पैमाने पर उत्पादन का अंत और तेजी से फैशन जैसे बेकार सामान की बड़े पैमाने पर खपत पर नकेल कसना। कैपिटल इन द एंथ्रोपोसिन में, सैटो कम काम के घंटों के माध्यम से डिकार्बोनाइजेशन की वकालत करते हैं और देखभाल जैसे आवश्यक 'श्रम-गहन' काम को प्राथमिकता देते हैं।

जैसे ही दुनिया महामारी से उभरती है और वैश्विक ताप से उत्पन्न अस्तित्व के खतरे का सामना करती है, वह नए विकल्पों के बारे में गहराई से सोचेगी, और एक विकल्प है पूंजीवादी राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग। सैटो ने स्वीकार किया है कि उन्होंने सोचा था कि आधुनिक समय के संकटों के समाधान के रूप में मार्क्सवाद के पहलुओं पर आधारित एक पुस्तक का जापान में चलना कठिन होगा, जहां पूंजीवादी राजनीति का प्रभुत्व रहा है। इसके बजाय, पुस्तक – जो पर्यावरण पर कार्ल मार्क्स के लेखन से प्रेरित है – एक अप्रत्याशित हिट बन गई है और सितंबर 2020 में प्रकाशित होने के बाद से इसकी पांच लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं।

जैसे-जैसे दुनिया जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अधिकाधिक सामना करती है – पाकिस्तान में बाढ़ से लेकर ब्रिटेन में गर्मी की लहरों तक – सामाजिक और आर्थिक संकट विकराल रूप धारण करते जाएंगे। सैटो का एक अधिक टिकाऊ, पूंजीवाद के बाद की दुनिया का नव दृष्टिकोण अगले प्रकाशित होने वाले अकादमिक पाठ में दिखाई देगा, जब कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा उनके बेस्टसेलर के अंग्रेजी अनुवाद का संस्करण दुनिया के सामने आएगा।

मोटे तौर पर दुनिया में जो हो रहा है, उससे जलवायु संकट का विचित्र-सा चित्र उभर कर हमारे सामने आता है। निश्चित रूप से जलवायु संकट की जड़ें पूंजीवाद में हैं। वैसे साम्यवाद या मार्क्सवाद भी दूध का धुला नहीं है। बीसवीं सदी से दुनिया पूंजीवाद और साम्यवाद के पाटों में पिसती रही है। वास्तविकता यह भी है कि पिछली सदी के आठवें-नवें दशक में मार्क्सवाद का तम्बू उखड़ने के बाद पूंजीवाद उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण कर दुनिया को ज्यादा बारीक पीस रहा है! 

प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और पर्यावरण प्रदूषण से होकर जलवायु परिवर्तन वस्तुतः पूंजीवाद का ही एक 'उपहार' है। इसके विपरीत साम्यवाद ने विस्तारवाद और मानवाधिकारों के हनन का इतिहास रचा है। एक तीसरी विचारधारा जो विगत शताब्दी के सातवें दशक में ईरान की राजशाही के बाद शनैः शनैः बढ़ती गई, वह है आतंकवाद की धारा। मजहबी कोख से पैदा हुई यह धारा निठल्ले समाज की पड़ोसियों की हरी-भरी भूमि पर हिंसात्मक तरीके से कब्ज़ा करने की नीयत स्पष्ट करती है।    

प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन, पर्यावरण प्रदूषण, और जलवायु परिवर्तन उन सामाजिक-आर्थिक नीतियों का दुष्परिणाम हैं, जो एक विशिष्ट राजनीतिक व्यवस्था में गढ़ी जाती हैं। यही राजनीतिक व्यवस्थाएं हमारा भविष्य तय करती हैं। एक यथास्थितिवाद में फंसकर निरीह-सी हमारी समकालीन दुनिया अपनी दुर्दशा झेलने और अपने भविष्य के अंधकार को टटोलने के लिए अभिशप्त है। लेकिन यह भी सच है कि राजनीतिक विचारधाराएं बुलबुलों के सामान होती हैं, और नई वैकल्पिक विचारधाराओं की हवा बहने से बुलबुले फटने लगते हैं। 

राजनेताओं और शासकों से अपेक्षा नहीं की जा सकती, लेखकों और धरा के शुभचिंतकों एवं समय के आर-पार देखने वाले दार्शनिकों को अंधकार से प्रकाश की ओर तथा विनाश से अक्षय विकास की ओर ले जाने वाली वैकल्पिक व्यवस्थाओं के साथ एक नई दुनिया के निर्माण हेतु बीड़ा उठाना चाहिए। समकालीन रचनाधर्मिता का यही धर्म होना चाहिए। (लेखक एमेरिटस प्रोफेसर, जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय)

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed