वसंत में बौराया हुआ एक आदमी
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केजरीवाल जी का वास्तविक वसंत अब आया है। इस समय वह उल्लास-उमंग से सराबोर हैं। इधर फागुन शुरू हुआ है और उन्होंने अपना पद त्याग कर दिया। उनचास दिन सत्ता भोगकर आम आदमी का पाजामा पहन कर अब वह भाजपा और कांग्रेस से होली खेलने को तत्पर हैं। उन्होंने अपने गले में लिपटा मफलर उतार फेंका है और खांसी में भी आराम है। जिस सरकारी बंगले में वह पिछले दिनों गए थे, अब उसे खाली करने की तैयारी है। अभी तो ठीक से गठरियां खुली भी नहीं होंगी। अभी तो सामान ठीक से निकाले भी नहीं गए होंगे कि उन्हें फिर से पैक करने की तैयारी चल रही है।
वसंत में आदमी कैसे बौराता है, यह कोई केजरीवाल जी से सीखे। मदमस्त-हरफनमौला की तर्ज पर उनकी पिचकारी के रंग न्यारे हैं। दिल्ली में पुनः चुनाव लड़ने को वह आतुर हैं। इस देश की भलाई के लिए वह हजार बार मुख्यमंत्री पद त्याग करने को तैयार हैं। कांग्रेस को खत्म हुआ मानकर उन्होंने भाजपा से दो-दो हाथ करने की ठान रखी है। उन्होंने किस-किसको नहीं डांटा। प्रधानमंत्री से लेकर संतरी तक उसकी जद में थे। भ्रष्टतम व्यक्तियों की एक लिस्ट तो वह जारी कर चुके हैं। दूसरी लिस्ट होली तक आ जाएगी। वह किसी को छोड़ने वाले नहीं।
अपने चुनावी वायदे पूरा करने की जल्दबाजी और जन लोकपाल ने कुर्सी छोड़ने को उन्हें मजबूर किया, तो उसके बाद से ही वह मदमस्त होलियाना मूड में हैं। किसी की हिम्मत हो, तो कोई खेले उनसे होली। उनकी पिचकारी में सबके लिए रंग है, जिसे डलवाने से पहले घिग्घी बंधती है। पता नहीं, वह भ्रष्टाचार के गुलाल का कौन-सा टीका लगा देंगे। उनकी टीम भी कम नहीं है। सबको संविधान कंठस्थ है। उनमें से कौन, कब, किस पर हमला बोल दे, पता नहीं। वैसे भी जिस पार्टी का चुनाव चिह्न झाड़ू है, उससे बचने में ही भलाई है।
लेकिन केजरीवाल जी चाहे जितने भी बौराए हुए हों, दिल्ली की सत्ता छोड़कर उन्होंने यह तो जता ही दिया है कि इस मामले में कांग्रेस और भाजपा उनके सामने नहीं टिकती। मजाल है, तो अभी दोबारा दिल्ली में चुनाव कराकर देख लें। लेकिन राजनीति के पुराने खिलाड़ी सहमे हुए हैं। क्या पता, दोबारा चुनाव में कांग्रेस की रही-सही लुटिया भी डुब जाए। क्या पता, हर्षवर्धन जी को दुख के साथ विपक्ष की कुर्सी पर ही बैठे रहना पड़े। कोई कुछ कहे, केजरीवाल का जवाब नहीं है।