{"_id":"3087","slug":"Tavleen-Singh-3087-","type":"story","status":"publish","title_hn":"परमाणु हथियारों से मुक्ति का छलावा","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
परमाणु हथियारों से मुक्ति का छलावा
Tavleen Singh
Updated Sat, 11 Aug 2012 12:00 PM IST
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छह और नौ अगस्त, 1945 को अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर जब बम गिराए गए थे, तभी दुनिया को संदेश मिल गया था कि अगर भविष्य में परमाणु हथियारों की होड़ रोकी नहीं गई, तो एक दिन दुनिया बारूद की ढेर पर होगी। उसके बाद पहले से जारी निरस्त्रीकरण के प्रयास काफी तेज हो गए थे। इसके बावजूद दुनिया हथियारों से मुक्त हो नहीं पाई।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में परमाणु निरस्त्रीकरण और परमाणु अप्रसार के लिए सर्वसम्मति से प्रस्ताव संख्या 1887 पारित कराया जा चुका है,जिसमें उन सभी देशों से परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत करने को कहा गया है, जिन्होंने अभी तक इस संधि को स्वीकार नहीं किया है। क्या इस संधि पर हस्ताक्षर न करने वाले देश दुनिया में शांति नहीं चाहते?
उल्लेखनीय है कि हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1954 में पूरी दुनिया में सभी प्रकार के परमाणु परीक्षणों पर रोक संबंधी प्रस्ताव रखकर निरस्त्रीकरण की दिशा में जो ठोस कदम उठाने की कोशिश की थी, उसे शीतयुद्धकालीन परिस्थितियों में न केवल अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ ने, बल्कि चीन और फ्रांस ने भी अप्रासंगिक करार दे दिया था।
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हालांकि इस दिशा में पहली सफलता अक्तूबर, 1958 में तब मिली, जब अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ ने जिनेवा सम्मेलन में बातचीत शुरू की और एक साल के लिए परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाने की घोषणा की गई। वर्ष 1963 की ‘आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि’ (पीएनटीबीटी) इसकी अगली कड़ी थी, जिसमें वायुमंडल, बाहरी अंतरिक्ष और पानी के अंदर परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाने पर सहमति बनी। उसमें वैसे भूमिगत परीक्षणों पर रोक लगाने का प्रावधान था, जिससे किसी एक देश की भौगोलिक सीमाओं के बाहर रेडियोधर्मी विकिरण फैलने का अंदेशा हो तो। लेकिन उसे धता बताते हुए चीन ने एक वर्ष बाद ही लोपनोर इलाके में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया।
फलतः 1966 में परमाणु अप्रसार के लिए प्रयास पुनः शुरू कर दिए गए। जुलाई, 1968 में परमाणु हथियारों का प्रसार रोकने के लिए अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और 58 अन्य देशों ने मिलकर परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) की रूपरेखा तय की। लेकिन इस संधि ने परमाणु क्लब के सदस्य देशों के परमाणु परीक्षण के लिए रास्ता छोड़ रखा था, इसलिए इसे सफलता नहीं मिलनी थी।
बीती सदी के नब्बे के दशक में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने घोषणा की कि अमेरिका सभी प्रकार के परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाने के लिए ‘शून्य उत्पाद’ संधि चाहता है। रूस ने इसका समर्थन भी कर दिया। फलतः सितंबर, 1996 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा सीटीबीटी का मसौदा स्वीकृत हो गया, लेकिन गुटनिरेपक्ष देशों सहित कुछ अन्य को भी इसकी विषयवस्तु पर ऐतराज था। इसकी वजह यह थी कि इस संधि में समग्रता का तत्व बिलकुल ही नदारद था।
समग्र निरस्त्रीकरण के लिए प्रतिबद्धता जाहिर करने वाले परमाणु क्लब के देशों की सचाई यह है कि उन्होंने 1945 से लेकर 1998 तक प्रतिवर्ष 38-39 की दर से परीक्षण करते हुए परमाणु आयुधों का इजाफा किया। यही कारण है वैश्विक शांति संबंधी मुहिम ने मंचीय प्रगति तो खूब कर ली, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर उसकी प्रगति सिफर रही। फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में 23,000 से ज्यादा बम घोषित रूप से बनाए जा चुके हैं, जिनमें से लगभग 8,100 बम कभी भी दागे जाने की स्थिति हैं।
रूस का परमाणु जखीरा सबसे बड़ा है, जबकि अमेरिका दूसरे स्थान पर है। आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षा परिषद् के पांच स्थायी सदस्यों के पास लगभग 23,125 परमाणु हथियार हैं, जो कुल वैश्विक परमाणु आयुधों के 98.5 प्रतिशत से भी अधिक है। पाकिस्तान का परमाणु जखीरा इस्राइल और भारत की तुलना में कहीं अधिक हो गया है। उत्तर कोरिया भी इस दिशा में लगातार अग्रसर है, जबकि ईरान किसी भी क्षण धमाका कर सकता है। ऐसे में शांति की उम्मीद बेबुनियाद ही लगती है।
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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में परमाणु निरस्त्रीकरण और परमाणु अप्रसार के लिए सर्वसम्मति से प्रस्ताव संख्या 1887 पारित कराया जा चुका है,जिसमें उन सभी देशों से परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत करने को कहा गया है, जिन्होंने अभी तक इस संधि को स्वीकार नहीं किया है। क्या इस संधि पर हस्ताक्षर न करने वाले देश दुनिया में शांति नहीं चाहते?
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उल्लेखनीय है कि हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1954 में पूरी दुनिया में सभी प्रकार के परमाणु परीक्षणों पर रोक संबंधी प्रस्ताव रखकर निरस्त्रीकरण की दिशा में जो ठोस कदम उठाने की कोशिश की थी, उसे शीतयुद्धकालीन परिस्थितियों में न केवल अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ ने, बल्कि चीन और फ्रांस ने भी अप्रासंगिक करार दे दिया था।
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हालांकि इस दिशा में पहली सफलता अक्तूबर, 1958 में तब मिली, जब अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ ने जिनेवा सम्मेलन में बातचीत शुरू की और एक साल के लिए परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाने की घोषणा की गई। वर्ष 1963 की ‘आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि’ (पीएनटीबीटी) इसकी अगली कड़ी थी, जिसमें वायुमंडल, बाहरी अंतरिक्ष और पानी के अंदर परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाने पर सहमति बनी। उसमें वैसे भूमिगत परीक्षणों पर रोक लगाने का प्रावधान था, जिससे किसी एक देश की भौगोलिक सीमाओं के बाहर रेडियोधर्मी विकिरण फैलने का अंदेशा हो तो। लेकिन उसे धता बताते हुए चीन ने एक वर्ष बाद ही लोपनोर इलाके में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया।
फलतः 1966 में परमाणु अप्रसार के लिए प्रयास पुनः शुरू कर दिए गए। जुलाई, 1968 में परमाणु हथियारों का प्रसार रोकने के लिए अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और 58 अन्य देशों ने मिलकर परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) की रूपरेखा तय की। लेकिन इस संधि ने परमाणु क्लब के सदस्य देशों के परमाणु परीक्षण के लिए रास्ता छोड़ रखा था, इसलिए इसे सफलता नहीं मिलनी थी।
बीती सदी के नब्बे के दशक में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने घोषणा की कि अमेरिका सभी प्रकार के परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाने के लिए ‘शून्य उत्पाद’ संधि चाहता है। रूस ने इसका समर्थन भी कर दिया। फलतः सितंबर, 1996 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा सीटीबीटी का मसौदा स्वीकृत हो गया, लेकिन गुटनिरेपक्ष देशों सहित कुछ अन्य को भी इसकी विषयवस्तु पर ऐतराज था। इसकी वजह यह थी कि इस संधि में समग्रता का तत्व बिलकुल ही नदारद था।
समग्र निरस्त्रीकरण के लिए प्रतिबद्धता जाहिर करने वाले परमाणु क्लब के देशों की सचाई यह है कि उन्होंने 1945 से लेकर 1998 तक प्रतिवर्ष 38-39 की दर से परीक्षण करते हुए परमाणु आयुधों का इजाफा किया। यही कारण है वैश्विक शांति संबंधी मुहिम ने मंचीय प्रगति तो खूब कर ली, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर उसकी प्रगति सिफर रही। फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में 23,000 से ज्यादा बम घोषित रूप से बनाए जा चुके हैं, जिनमें से लगभग 8,100 बम कभी भी दागे जाने की स्थिति हैं।
रूस का परमाणु जखीरा सबसे बड़ा है, जबकि अमेरिका दूसरे स्थान पर है। आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षा परिषद् के पांच स्थायी सदस्यों के पास लगभग 23,125 परमाणु हथियार हैं, जो कुल वैश्विक परमाणु आयुधों के 98.5 प्रतिशत से भी अधिक है। पाकिस्तान का परमाणु जखीरा इस्राइल और भारत की तुलना में कहीं अधिक हो गया है। उत्तर कोरिया भी इस दिशा में लगातार अग्रसर है, जबकि ईरान किसी भी क्षण धमाका कर सकता है। ऐसे में शांति की उम्मीद बेबुनियाद ही लगती है।