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अमेरिकी इशारों पर विदेश नीति

Mon, 14 May 2012 12:00 PM IST
Mrinal Pandey
Mrinal Pandey Updated Mon, 14 May 2012 12:00 PM IST
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Gestures on US foreign policy
अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की भारत यात्रा विदेश मंत्री के रूप में संभवतः उनकी आखिरी भारत यात्रा थी। उनके इस दौरे का मकसद यह सुनिश्चित करना था कि भारत अपने तथा अन्य देशों के लिए भी ईरान से तेल की आपूर्ति बंद कराने के अमेरिकी मनसूबे के पीछे-पीछे चलने लगे। पिछले साल लगाई गई उसकी पाबंदियां अमेरिकी कंपनियों को ऐसे किसी भी देश के साथ कारोबार करने से रोकती हैं, जो अब भी ईरानी केंद्रीय बैंक के माध्यम से ईरान से तेल की खरीद कर रहा हो।
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इन पाबंदियों का मकसद यही है कि ईरान के तेल निर्यात को रुकवा दिया जाए और उसके केंद्रीय बैंक और अर्थव्यवस्था को पंगु कर दिया जाए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् ने जून, 2010 में ईरान पर जो पाबंदियां लगाई थीं, उसमें ईरान के पेट्रोलियम क्षेत्र या उसके तेल व्यापार को इनके दायरे में नहीं घसीटा गया था। बाद में अमेरिका तथा यूरोपीय संघ ने ईरान के तेल उद्योग को निशाना बनाते हुए कई पाबंदियां थोपी हैं। अमेरिका अब चीन, जापान, भारत, दक्षिण कोरिया आदि देशों पर दबाव बना रहा है कि वे ईरान से अपना तेल आयात घटाएं।
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भारत ईरान के तेल के प्रमुख खरीदारों में रहा है। मंगलौर रिफाइनरी ईरान के तेल के सबसे बड़े ग्राहकों में से है, जो वहां से सालाना करीब 710 लाख टन तेल लेती आई है। लेकिन अब इस मामले में हमें शर्मनाक सूरते हाल से दो-चार होना पड़ रहा है। अमेरिका ने दो साल पहले धमकी दी थी कि जो भी भारतीय कंपनी ईरान वित्तीय लेन-देन के एशियन क्लीयरिंग यूनियन का सहारा लेगी, उसे अमेरिका के उन कानूनों के उल्लंघन का दोषी माना जाएगा, जो अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को ईरानी बैंकों तथा उसके तेल उद्योग के साथ कारोबार करने से रोकते हैं।
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नतीजतन भारतीय रिजर्व बैंक ने ईरान से लेन-देन का निपटारा एशियाई क्लीयरिंग हाउस के जरिये किए जाने पर ही अंकुश लगा दिया। आगे चलकर भारत और ईरान ने जर्मनी के एक बैंक के माध्यम से ईरान से तेल आयात के भुगतान का रास्ता निकालने की कोशिश की थी। लेकिन अमेरिकी दबाव में यह रास्ता भी बंद हो गया। बाद में इस काम के लिए तुर्की के एक बैंक को चुना गया। पर इस व्यवस्था का भी वही हश्र हुआ। फिलहाल एक भारतीय बैंक, यूको बैंक, को भारतीय तेल कंपनियों द्वारा रुपये में भुगतान संभालने के लिए अधिसूचित किया गया है। लेकिन हमारी सरकार ने इस सिलसिले में ईरान के निजी बैंक पर्शियन को मुंबई में अपनी शाखा खोलने की इजाजत ही नहीं दी। कहना अतिशयोक्ति नहीं कि इस शाखा के खुलने से व्यापार तथा भुगतान में आसानी होती।

अमेरिका के लगातार दबाव बनाए रखने का नतीजा यह है कि हमारी सरकार ने तेल कंपनियों को इशारा कर दिया है कि ईरान से तेल आयात घटाएं। नतीजतन मंगलौर रिफाइनरीज, हिंदुस्तान पेट्रोलियम तथा एस्सार कंपनी ने अपने ऑर्डर में कमी की है। वर्ष 2008-09 में भारत ने ईरान से दो करोड़ 18 लाख टन तेल का आयात किया था। 2010-11 में यह आयात घटकर एक करोड़ 85 लाख टन रह गया। 2011-12 में यह आयात और भी गिरकर एक करोड़ 40 लाख टन रह गया है।

एक ओर सरकार कह रही है कि ईरान से तेल आयात के बिना काम नहीं चल सकता, दूसरी ओर, अमेरिका को यह आश्वासन देने में लगी हुई है कि ईरान से तेल आयात में कटौती के सभी कदम उठाए जा रहे हैं। खुद हिलेरी क्लिंटन ने विगत मार्च में अमेरिकी कांग्रेस की एक कमेटी में कहा था कि भारत पर ईरान से तेल आयात में कटौती करने की मांग का असर दिख रहा है। अपनी कोलकाता की ताजातरीन यात्रा के दौरान भी उन्होंने ईरान से तेल का आयात घटाने के लिए भारत द्वारा उठाए गए कदमों की सराहना की थी।

अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ अवैध तरीके से पाबंदियां थोपने तथा तीसरे देशों के खिलाफ कार्रवाई की उसकी धमकियों का यूपीए सरकार कोई विरोध नहीं करती। हिलेरी क्लिंटन ने कोलकाता पहुंच कर ममता बनर्जी को इसका उपदेश दे डाला कि तीस्ता नदी जल बंटवारे का समाधान कैसे किया जाए और खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए दरवाजे खोलना क्यों जरूरी है। लेकिन यूपीए सरकार के मुंह से इस संबंध में एक शब्द तक नहीं फूटा कि कोलकाता में हिलेरी ने जो किया, वह उचित नहीं था, और उसका समर्थन नहीं किया जा सकता। वैसे ईरान के मुद्दे पर अमेरिकी दबाव में यूपीए सरकार के घुटने टेकने का इतिहास काफी लंबा है। सितंबर, 2005 में भारत ने आईएईए के मंच पर पहली बार ईरान के खिलाफ वोट किया था। अमेरिकी दबाव में ही हमारी सरकार ने बाद में ईरान से पाकिस्तान होते हुए भारत आने वाली गैस पाइपलाइन परियोजना से अपना हाथ खींच लिया था।


ईरान भारत में तेल का परंपरागत आपूर्तिकर्ता रहा है। दूसरे देशों के मुकाबले ईरान से तेल का आयात करना हमें कहीं सस्ता पड़ता है। गैस पाइपलाइन अगर चालू हो गई होती, तो उससे हमें सस्ते दाम पर गैस की आपूर्ति सुनिश्चित होती। ईरान भारतीय मालों और व्यापार के लिए अफगानिस्तान तथा मध्य एशिया का द्वार है। इसके बावजूद अमेरिका को खुश रखने की फिक्र में इस सबको खतरे में डाला जा रहा है। मनमोहन सिंह सरकार भारत-अमेरिका रणनीतिक गठजोड़ की वेदी पर देश के महत्वपूर्ण हितों की बलि चढ़ा रही है।
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