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कुसुंडा भाषा

Vinit Narain Updated Mon, 14 May 2012 12:00 PM IST
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नेपाल की कुसुंडा जनजाति की भाषा कुसुंडा खत्म होने के कगार है। हालांकि नेपाल के सांख्यिकी विभाग के मुताबिक, कुसुंडा जनजाति के करीब सौ लोग अभी जीवित हैं, पर उनमें से एक को छोड़कर, जो 75 वर्षीय महिला हैं, इस भाषा को अच्छी तरह न कोई समझ पाता है और न ही बोल पाता है।
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त्रिभुवन विश्वविद्यालय के तीन भाषा विज्ञानियों-डॉ योगेंद्र प्रसाद यादव, डॉ डेविड ई वाटर्स एवं प्रो माधव प्रसाद पोखरेल ने इस दुर्लभ भाषा की शब्दावली और व्याकरण को तैयार किया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह भाषा सात हजार वर्ष पहले से बोली जा रही है। इस भाषा की वाक्य संरचना तो अलग है ही, इसमें काल निर्धारण की शैली भी अनूठी है। भाषा विज्ञानियों का मानना है कि अफ्रीका के कुछ इलाकों में बोली जाने वाली भाषा की संरचना से इसकी थोड़ी-सी निकटता जान पड़ती है। इस दल ने कुसुंडा भाषा के उच्चारण और शब्दावली के वैज्ञानिक पहलू का अध्ययन किया है और इसके तीन स्वर एवं 15 व्यंजन वर्णों की पहचान की है। हालांकि इस भाषा के उद्भव का अभी पता नहीं चल पाया है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यह तिब्बती-बर्मी एवं इंडो-ईरानी भाषा बोलने वाले लोगों की किसी भाषा का अवशेष है।

अज्ञात उद्भव और रहस्यमय वाक्य विन्यास के कारण यह भाषा लंबे समय से भाषा विज्ञानियों के लिए चुनौती बनी हुई है। कुछ वर्ष पहले तक दो और लोग थे, जो कुसुंडा भाषा को धाराप्रवाह बोल-समझ सकते थे, लेकिन उनमें से एक का निधन हो गया और दूसरी, उनकी बेटी थी, जो रोजगार की तलाश में देश से बाहर कहीं चली गई। दुखद है कि इस भाषा के संरक्षण के लिए नेपाल सरकार के पास कोई खास योजना नहीं है।

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