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नीतीश का गैर संघ-भाजपावाद

Tue, 19 Apr 2016 07:12 PM IST
अवधेश कुमार
अवधेश कुमार Updated Tue, 19 Apr 2016 07:12 PM IST
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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गैर संघ-भाजपावाद की जो अपील की है, उसे उनकी वर्तमान राजनीतिक स्थिति को देखते हुए बिल्कुल स्वाभाविक मानना चाहिए। भाजपा के साथ सरकार चलाते हुए वह 2010 से ही नरेंद्र मोदी विरोधी तेवर से अपनी अलग छवि बनाने की रणनीति पर चलने लगे थे। अंततः अलग होकर उन्होंने विधानसभा चुनाव के पूर्व गैर भाजपा राजनीतिक ध्रुवीकरण किया और उसके कारण ही अभी मुख्यमंत्री हैं। अपनी राजनीतिक जमीन कायम रखने के लिए तो इसे धार देते रहना आवश्यक है ही, राष्ट्रीय राजनीति में अपना कद बढ़ाने और प्रासंगिक बने रहने के लिए भी यह जरूरी है। अब चूंकि वह जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बन चुके हैं, इसलिए राष्ट्रीय राजनीति में किसी प्रकार की महत्वपूर्ण भूमिका के लिए जगह बनाने की कोशिश लाजिमी है। प्रश्न है कि क्या उन्होंने भाजपा विरोधी सभी दलों के इकट्ठे आने की जो बात की है, उसके जमीन पर उतरने की संभावना है।

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अभी तक माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी अकेले नेता हैं, जिन्होंने इसके पक्ष में बयान दिया है। माकपा या वामदल पहले से गैर भाजपावाद की राजनीति पर चल रहे हैं। इसी राजनीति के कारण 1996 में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी या फिर 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन बना, जिसमें कांग्रेस नेतृत्व की सरकार को वामदलों ने जुलाई, 2008 तक समर्थन दिया। गैर भाजपावाद की कोई राजनीति तभी सफल हो सकती है, जब उसमें कांग्रेस शामिल हो। कांग्रेस बिहार में नीतीश के साथ गठजोड़ में शामिल है, पर उसका जवाब अस्पष्ट है। उसकी ओर से कहा गया कि 2019 आते-आते शायद प्रगतिशील दलों को इकट्ठा होने की जरूरत ही न रहे। साफ है कि कांग्रेस अभी किसी और के नेतृत्व में गैर भाजपा गठजोड़ की मानसिकता में नहीं है।
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नीतीश कुमार ने इसे सैद्धांतिक स्वरूप देने के लिए डॉ. राम मनोहर लोहिया को उद्धृत किया है। उन्होंने कहा है कि जिस तरह 60 के दशक में लोहिया जी ने गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया था, उसी तरह आज गैर संघवाद की आवश्यकता है और जितने गैर भाजपा दल हैं, सबको एक साथ आना होगा। लोहिया ने जब गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया, उस समय विपक्षी दलों का अस्तित्व नाम मात्र का था। आज चार-पांच राज्यों को छोड़कर हर जगह क्षेत्रीय दल ताकतवर हैं। कई राज्यों में तो भाजपा मुकाबले में भी नहीं है और प्रतिस्पर्धा केवल क्षेत्रीय दलों के बीच है।
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नीतीश कुमार अभी अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोकदल और बाबूलाल मरांडी की झारखंड विकास मोर्चा की जनता दल में विलय की कोशिश कर रहे हैं। इससे संभव है कि उत्तर प्रदेश एवं झारखंड में जनता दल यू की थोड़ी ताकत बढ़े, किंतु इससे भाजपा को कोई बड़ी चुनौती मिल जाएगी, ऐसा नहीं है। ध्यान रहे मुलायम सिंह यादव ने ऐसेे एकीकरण को नकार दिया तथा बिहार चुनाव में अलग राह ली। 2019 तक कैसी परिस्थिति बनेगी, यह देखना होगा। किंतु कुछ बातें साफ हैं। भाजपा विरोधी मुहिम को अभी ज्यादा बल मिलता नहीं दिख रहा है। बिहार में नीतीश के साथ सरकार में शामिल लालू प्रसाद यादव का राजद ही अभी इस पर मुखर नहीं है। सपा और बसपा की अपनी अलग-अलग राहें हैं। ममता बनर्जी भाजपा विरोधी होते हुए भी 2019 चुनाव पूर्व इस गैर भाजपावाद गठजोड़ का अंग बनेगी इसमें संदेह है, क्योंकि वामदलों के साथ जाना उनके लिए कठिन है। फिलहाल तस्वीर उत्साहजनक नहीं है।

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