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दबाव में शरीफ और सेना पर निगाहें
मरिआना बाबर
Updated Fri, 06 May 2016 07:29 AM IST
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मरिआमा बाबर
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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के लिए गर्मी का यह मौसम काफी लंबा और तीखा होने वाला है, पर उससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या इस्लामाबाद में लोकतंत्र फिर खतरे में है। पनामा लीक से संबंधित लोगों ने अब पुष्टि की है कि जिन लोगों के खाते विदेशों में हैं, उनमें नवाज शरीफ और उनकी बेगम कुलसुम नवाज का नाम नहीं है। वस्तुतः ये कंपनियां शरीफ के बेटे-हुसैन और हसन नवाज तथा उनकी इकलौती बेटी मरियम नवाज के नाम हैं।
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संयुक्त विपक्ष ने सरकार पर दबाव बढ़ाते हुए मांग की है कि तीन महीने में शरीफ अपने बच्चों के खिलाफ जांच पूरी करें और उस बारे में लोगों को बताएं। आम पाकिस्तानी भी विपक्ष का समर्थन करते हुए कह रहा है कि लंबे समय से संपन्न और ताकतवर लोगों को जवाबदेह नहीं बनाया गया है। भले ही विपक्ष अभी शरीफ से इस्तीफा नहीं मांग रहा, लेकिन उसने जाहिर किया है कि वह इस कथित भ्रष्टाचार को भूलने वाला नहीं है। शरीफ के लिए फिलहाल राहत की बात है कि उन्हें संसद में सालाना बजट पेश करने की अनुमति मिल जाएगी। लेकिन जब तक शरीफ के बच्चे इस मामले में बेदाग साबित नहीं होते, विपक्ष उनके इस्तीफे की मांग करते हुए सड़कों पर उतरेगा। मजबूत विपक्षी नेता के रूप में उभरे इमरान खान ने नवाज शरीफ के खिलाफ इस्लामाबाद और लाहौर में बड़ा जुलूस निकाला था और अगले महीने उन्होंने फैसलाबाद में जुलूस निकालने की बात कही है। उन्होंने घोषणा की कि शरीफ अगर अपने परिजनों का नाम स्पष्ट नहीं करते, तो प्रदशर्नकारी उनके घर तक पहुंच जाएंगे।
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लगता है कि पाकिस्तान इन दिनों चुनावी मोड में आ गया है। नवाज शरीफ ने अपने सांसदों से मशविरा करना शुरू कर दिया है और वह अन्य पार्टी कार्यकर्ताओं को भी समय दे रहे हैं, जिन्हें पहले उनसे मिलने में मुश्किल होती थी। वह विभिन्न शहरों का दौरा भी कर रहे हैं और विकास के लिए धन आवंटन का आश्वासन देने के साथ स्कूल, अस्पताल एवं सड़कों का उद्घाटन कर रहे हैं। इस बीच सैन्य प्रतिष्ठान चुपचाप मामले का जायजा ले रहा है। तो क्या फिर वह उनका तख्तापलट करेगा, जैसा कि जनरल परवेज मुशर्रफ ने पिछली बार जबरन उन्हें सत्ता से हटाकर निर्वासित होने के लिए मजबूर किया था? तब मुशर्रफ ने इमरान खान के सामने प्रधानमंत्री पद का प्रस्ताव रखा था। आज अगर इमरान खान शरीफ को जबरन सत्ता से हटाना चाहें, तो उन्हें सेना की मदद की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि संसद के भीतर शरीफ अविश्वास प्रस्ताव को गिरा सकते हैं।
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पिछले कुछ महीनों से सरकार और सेना के बीच रिश्ते सहज नहीं हैं। अपने तीसरे कार्यकाल में शरीफ बेवजह सेना से टकराव मोल नहीं लेते। बल्कि उन्होंने सेना को उन क्षेत्रों में दखल की अनुमति दी है, जो सांविधानिक रूप से लोकतांत्रिक सरकार के अधीन है। सेना का विदेश नीति, रक्षा नीति और परमाणु कार्यक्रम पर पूरी तरह से नियंत्रण है। यहां तक कि भारत के साथ व्यापार जैसे द्विपक्षीय मुद्दे पर भी अंतिम फैसला सेना का ही होता है। सैन्य प्रतिष्ठान का विरोध इसलिए नहीं होता, क्योंकि आतंकवाद से लड़ने में उसे सफलता मिली है। उसने उत्तर वजीरिस्तान के इलाके को आतंकियों से मुक्त कराया और अब वहां एकाध आतंकी घटनाएं ही होती हैं। इसके अलावा बंदरगाह वाला शहर कराची भी रेंजरों के अधीन अपराध, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष कर रहा है और शहर का चेहरा पूरी तरह बदल गया है।
तथ्य यह भी है कि पनामा लीक के तुरंत बाद सैन्य प्रमुख ने सार्वजनिक घोषणा की कि सेना के वरिष्ठ जनरलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई है। साल भर पुरानी कार्रवाई को इस मौके पर सार्वजनिक करते हुए राहील शरीफ अपना राजनीतिक कार्ड खेल रहे थे। सैन्य प्रमुख खुद को पूरी तरह से ईमानदार बताते हैं और उनका नाम किसी घोटाले से जुड़ा हुआ नहीं है। दरअसल उनके कुछ साहसिक फैसले के कारण कई लोग उनसे कह रहे हैं कि इस वर्ष के अंत में (जब उनका कार्यकाल खत्म होगा) पद छोड़ने के अपने फैसले पर वह पुनर्विचार करें। पाकिस्तान के लोग यह देखना चाहते हैं कि क्या राहील शरीफ नवाज शरीफ को हटाने में इमरान खान की मदद करते हैं। यदि पूरे मुल्क में प्रदर्शन होता है, तो प्रधानमंत्री पर दबाव बढ़ जाएगा और उन्हें फैसला करना होगा कि वह आकस्मिक चुनाव कराते हैं, अपनी पार्टी का नया नेता चुनकर पद छोड़ते हैं या अपने कार्यकाल तक पद पर बने रहने का फैसला करते हैं।
प्रतिष्ठित राजनीतिक विश्लेषक आयशा सिद्दीका का मानना है कि इस्लामाबाद में चल रही चर्चा से चार संभावनाओं का पता चलता है। पहला, जनदबाव के तहत सरकार को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है और फिर से चुनाव हो सकता है, दूसरा, यह सरकार चली जाएगी, पर एक व्यापक आधार वाली राष्ट्रीय सरकार सत्ता में आ सकती है। तीसरा, नवाज शरीफ इस्तीफा दे सकते हैं, पर उनकी पार्टी सत्ता में बनी रह सकती है। और चौथा, इस बात की मामूली संभावना है कि सेना इसमें दखल दे।
दिलचस्प है कि समय पर चुनाव और शांतिपूर्ण ढंग से सत्ता हस्तांतरण के कारण सैन्य दखल का खतरा टल गया था। कई वर्षों बाद पहली बार सैन्य तख्तापलट का खतरा सिर उठा रहा है। पर सवाल उठता है कि जब सैन्य प्रतिष्ठान पर्दे के भीतर रहकर सत्ता का सुख ले रहा है, तो वह सामने आकर मार्शल लॉ घोषित करना क्यों चाहेगा। सैन्य शासन के फैसले का आम लोग तो विरोध करेंगे ही, ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां भी तब इसके विरोध में एकजुट हो जाएंगी। वाशिंगटन और यूरोपीय संघ भी, जिन पर पाकिस्तान आर्थिक सहायता के लिए निर्भर रहता है, नाराज हो जाएंगे और सहायता राशि में कटौती कर देंगे। यानी सैन्य तख्तापलट इतिहास की बातें हो चुकी हैं और अब सेना के लिए ऐसा करना आसान नहीं है, खासकर तब, जब सैन्य प्रतिष्ठान पर्दे के पीछे से सत्ता को नियंत्रित कर रहा है।
लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं