राजनीति को समाज की चिंता क्यों नहीं
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लोकसभा चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा फिर सरकार बनाने जा रही है। यह चुनाव भाजपा की भारी जीत के साथ-साथ बेहद महंगे चुनाव अभियान के कारण भी चर्चा में रहा। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि चुनाव खर्च कम कर देश के नागरिकों की मूलभूत आश्यकताओं के लिए बजट बढ़ाया जाए, ताकि उनका जीवन स्तर सुधरे? जल संकट का समाधान, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा की उपलब्धता और गुणवत्ता में सुधार करना सरकारों की ही जिम्मेदारी है। झारखंड के सिमडेगा जिले की 11 वर्षीय संतोषी कुमारी की भूख से हुई मौत को हम भूल नहीं सकते। उसने भात मांगते-मांगते दम तोड़ा था। राजनेताओं के अंधाधुंध खर्चे स्वतंत्रता सेनानियों की सादगी की परवाह नहीं कर रहे।
दलित उत्पीड़न की घटनाएं सामाजिक सौहार्द समाप्त कर रही हैं। पिछले दिनों राजस्थान के अलवर जिले में एक युवक के सामने ही उसकी पत्नी के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। हद तो तब हो गई, जब चुनाव को देखते हुए उस खबर को दबाने की कोशिश की गई। लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल हो जाने के कारण यह घटना संवेदनशील लोगों के लिए नागवार गुजरी, जिससे गैरदलित लोग भी दलित को न्याय दिलाने के लिए सड़कों पर आ गए। अंततः आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया।
बलात्कार की वह इकलौती घटना नहीं थी। ऐसी अनेक घटनाएं हैं, जो बताती हैं कि समाज में दलितों के प्रति न केवल घृणा मौजूद है, बल्कि उनके प्रति हिंसक प्रवृत्तियां भी सक्रिय हैं। दलित घोड़े पर चढ़कर अपनी बारात निकाल ले, इतना भी सवर्ण समाज को बर्दाश्त नहीं। ऐसी एक घटना दो साल पहले हाथरस में तब हुई थी, जब कई महीनों की कसरत के बाद प्रशासन ने एक दलित की बारात सेना के साये में निकाली थी। बेशक उस मामले में कानून ने मदद की थी, पर इससे यह भी पता चलता है कि सवर्ण समाज स्वेच्छा से दलित को सम्मानित जीवन जीने का अधिकार नहीं देना चाहता।
हाल ही में गुजरात के मेहसाणा जिले के एक गांव में ऊंची जाति के पांच लोगों के खिलाफ एससी-एसटी ऐक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज कराई गई। दलितों का गुनाह यह था कि उन्होंने सवर्णों की तरह अपना दूल्हा भी घोड़ी पर सवार कर गांव में घुमा दिया। सवर्णो ने न केवल दूल्हे को घोड़ी से उतार कर बेइज्जत किया, बल्कि पंचायत में फरमान जारी किया कि दलितों को पूरे गांव में कोई खाद्य सामग्री नहीं दी जाए और किसी वाहन पर सवारी न करने दी जाए।
दलितों से बदसुलूकी करने वाले लोग अपनी करतूत को इस कारण जायज ठहराते हैं कि दलित अपनी हद में नहीं रहते। वे ऊंची जातियों की बराबरी करने की काशिश करते हैं। इसका अर्थ यह कि दलितों को समता और स्वतंत्रता के वे अधिकार नहीं देने हैं, जो भारतीय संविधान सभी नागरिकों को प्रदान करता है। अब इससे अधिक क्रूरता और क्या होगी कि पिछले दिनों ऊंची जाति के लोगों के सामने खाना खाने पर एक दलित युवक को पीट-पीटकर मार डाला गया।
उत्तराखंड के एक गांव में एक दलित युवक रिश्तेदार की शादी में गया था। वहां सवर्णों के सामने कुर्सी पर बैठकर वह खाना खाने लगा, तो पास ही खा रहे लोगों ने उस दलित को जातिसूचक गालियां देते हुए तुरंत कुर्सी से उतरने के लिए कहा और उतरने में देर देखकर दलित पर हमला कर दिया। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसकी मौत हो गई। एससी-एसटी ऐक्ट के तहत पुलिस ने मुकदमा तो दर्ज कर लिया, पर उसकी विधवा मां और बहन के लिए कमाकर सहारा देने वाला चला गया।
हमारे यहां अस्पृश्यता अमेरिका और अफ्रीका की गुलाम पृथा से अधिक अमानवीय है। हमारे देश को आजाद हुए सात दशक से अधिक हो गया, पर दलित दमन और बढ़ गया। अस्पृश्यता रूप बदल कर आज भी जारी है। हम उन देशों से भी प्रेरणा नहीं लेते, जिन्होंने जातिभेद की तरह नस्लभेद और रंगभेद को समाप्त कर दिया। हमारे यहां संविधान सम्मत व्यवहार नहीं हो रहा।
जबकि आवश्यकता इस बात की है कि लोगों की सामाजिक शिक्षा सकारात्मक और संविधान सम्मत हो। छात्रों को संविधान की मूलभूत शिक्षा अवश्य पढ़ाई जानी चाहिए। समता भाव जगाने वाली फिल्मों, कविताओं, कहानियाें, चित्रकला, गीत, संगीत, नृत्य आदि को विशेष प्रोत्साहन देना चाहिए। दलित आदिवासियों के साहित्य इस दिशा में काफी सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
अध्ययन बताता है कि दास पृथा केवल दासों के प्रयासों से समाप्त नहीं हुई। उसमें स्वामी वर्ग का भी योगदान था। दरअसल गोरे स्वामियों का एक बड़ा हिस्सा दास पृथा के विरोध में खड़ा हो गया था। पचास फीसद गोरे कालों की गुलामी के विरोध में खड़े हो गए और दास पृथा को उन्होंने समाप्त कर दिया। यही नहीं, अमेरिका ने उसके बाद कला, मीडिया, उद्योग, शिक्षा, साहित्य जैसे सभी क्षेत्रों में अफर्मेटिव ऐक्शन के तहत दलितों की भागीदारी सुनिश्चित कर और काम करने के अवसर देकर अपने देश को महाशक्ति बना दिया।
दूसरी ओर, हमारे देश में दलितों और आदिवासियों को सेवाओं से बाहर रखने के लिए ही नए-नए तरीके अपनाए गए, जिससे देश को उनकी सेवाओं का लाभ नहीं मिल सकता। हमारे नेता केवल राजनीति में ही रुचि लेते हैं, समाज सुधार की चिंता उन्हें नहीं होती। चूंकि समाज में, साहित्य में, शिक्षा में उच्च मानवीय आदर्श नहीं हैं, इसलिए ऐसे वर्णभेदी समाज से निकला नेता भी लोकतांत्रित समता भाव का विकास नहीं करना चाहता, वह समाज में मौजूद भेदभाव का केवल राजनीतिक लाभ लेना चाहता है।