नई जमीन : जहां आंखों की रोशनी न होना वरदान है
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जोएल बर्केट का पहला उपन्यास ड्रिंक टू एवरी बीस्ट बेस्टसेलर किताबों की सूची में ऊपर नहीं चढ़ रहा है। न ही आलोचकों की तरफ से इस किताब को महत्व मिल रहा है। लेकिन यह एक दूसरे कारण से महत्वपूर्ण है। दरअसल अपनी आंखें खो चुकने के बाद जोएल ने यह उपन्यास खत्म किया। पेनसिल्वेनिया के हैरिसबर्ग में रहने वाले 64 साल के पर्यावरणीय वकील पिछले काफी वर्षों से खाली समय में लिखते रहे थे।
उन्होंने इस उपन्यास के अलावा और भी कई उपन्यासों पर काम शुरू किया था। लेकिन उन्हें अपनी किसी भी किताब के लिए प्रकाशक नहीं मिला। फिर वर्ष 2018 की शुरुआत में उनकी दाईं आंख से कम दिखने लगा। उससे डेढ़ साल पहले उनकी बाईं आंख से भी कम दिखने लगा था। आंखों की तकलीफ जब ज्यादा ही बढ़ गई, तो उन्होंने वकालत का काम छोड़ दिया। उन्हें महसूस हुआ कि उनके पास लिखने के लिए अब ज्यादा समय है। लिखने की उनकी इच्छाशक्ति भी बढ़ गई।
'मैं यह साबित करना चाहता था कि मैं वह काम कर सकता हूं, जो एक दृष्टिबाधित आदमी नहीं कर सकता। यह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था', बर्केट ने हाल ही में फोन पर बातचीत करते हुए मुझसे कहा। उन्होंने एक डिक्टेशन सॉफ्टवेयर लिया, एक संपादक रखा और ड्रिंक टू एवरी बीस्ट में जरूरी संशोधन करते हुए, जो कि सुस्क्यूहैन्ना नदी में फेंके जाने वाले विषैले कूड़े पर आधारित एक थ्रिलर है, उसे हेडलाइन बुक्स को भेज दिया, जो उन लेखकों का स्वागत करते हैं, जिनके अपने एजेंट नहीं होते। प्रकाशक ने कुछ ही सप्ताह पहले बर्केट का उपन्यास छाप दिया।
इस उपन्यास के बारे में साहित्य जगत की कुछ भी प्रतिक्रिया हो, पर बर्केट की खुशियों की कोई सीमा नहीं है। वह गर्व के साथ कहते हैं, अब मैं भी खुद को जेम्स जॉयस, जेम्स थर्बर और दूसरे दृष्टिबाधित लेखकों के साथ खुद को खड़ा पाता हूं। जोएस और थर्बर पूरी तरह दृष्टिबाधित नहीं थे। लेकिन आंखों में आंशिक खराबी या पूरी तरह दृष्टिबाधित लेखकों के प्रति बर्केट का गर्व सही है-गर्व इसलिए, क्योंकि वे तमाम लेखक बाधाओं से पार पाने के स्पष्ट उदाहरण हैं, क्योंकि अपनी सीमाओं को ही उन्होंने अपनी ताकत बनाया है, क्योंकि वे देख पाने की क्षमता को चुनौती देते है। और ऐसा करते हुए वे अपने दिमाग का इस्तेमाल करते हैं।
दिमाग में जो चित्र होते हैं, वे उन्हें एकजुट करते हैं, उनका संपादन करते हैं, और फिर उन्हें शब्दों में बदल देते हैं। अगर दृष्टिबाधित लेखकों की कल्पना शक्ति प्रबल हो, तो वे घने कोहरे और घनी कालिमा में भी स्पष्टता और रंग ढूंढ पाते हैं। जॉन मिल्टन, जॉर्ज लुई बोर्खेज और दर्जनों कम लोकप्रिय लेखकों का महत्व इसी कारण है कि उन्होंने जवानी में अपनी आंखें खो दी थीं।
उन्हें सहायता की जरूरत थी, लेकिन वे लिखते चले गए। उन्होंने एक ऐसी दुनिया के लिए लिखा, जो दिव्यांगों को अक्सर कमतर करके आंकती है और अपनी प्रतिक्रियाओं के जरिये बताती है कि वैसे लोगों पर उसने कितनी कृपा की।
महाकवि मिल्टन ने 1652 में अपनी आंखें खोने के लगभग एक दशक बाद पैराडाइज लॉस्ट और पैराडाइज रिगेन्ड जैसी विलक्षण कृतियों की रचना की। इसके पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि उन्होंने अंधे होने के बावजूद नहीं, बल्कि अंधे होने के कारण ही ऐसी कालजयी रचनाएं कीं। यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास में मिल्टन पढ़ाने वाले जॉन रमरिक कहते हैं, मिल्टन ने अपने अंधेपन को अपनी गहरी अंतदृष्टि की कीमत के रूप में देखा। भीतरी आंखों के होते हुए बाहरी आंखों की जरूरत नहीं रह गई थी। और इसी बोध ने मिल्टन को अपनी इन दो कृतियों की रचना के लिए और भी प्रेरित किया।
होमर को भी दृष्टिबाधित बताया जाता है, हालांकि इस बारे में ठीक-ठीक कुछ कह पाना कठिन है। साहित्य के विशेषज्ञ अभी तक यही तय नहीं कर पाए हैं कि इलियड के रचयिता होमर एक कवि थे या इस नाम के कई कवि थे। लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी की लेक्चरार हीदर टिले ने ब्लाइंडनेस ऐंड राइटिंग : फ्रॉम वर्ड्सवर्थ टू गिसिंग नाम की एक किताब लिखी है, जिसमें विक्टोरियन युग के कई दृष्टिबाधित लेखकों का जिक्र है।
मैंने बर्केट से पूछा कि आंखों की कमी ने उनके लेखन पर कितना असर डाला है। उनका कहना था कि आंखें न रहने से उनकी स्मृति ज्यादा प्रखर हुई है, पात्रों के शारीरिक ब्योरों को वह ज्यादा विस्तार दे पाते हैं, 'और इस शारीरिक कमी ने मुझे ज्यादा धैर्यवान, ज्यादा दयालु और पहले से अधिक समझदार बनाया है। सहानुभूतिशील तो मैं पहले भी थी, लेकिन अब मुझमें समानुभूति भी है।'
© The New York Times 2019