मेरा दरवाजा तुम्हारे लिए चौबीसों घंटे खुला है !
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नवंबर 1963 शाम के लगभग चार-पांच बजे आर.के. स्टूडियो के कार्यालय में शैलेंद्र जी और मैं जीना चढ़कर बालकनी पहुंचे। बायीं ओर शुरू में और अंत में दो दरवाजों वाली दीवार थी। बालकनी का अंत होता था सामने एक दरवाजे में। बाहर मोटा पायदान था, जिस पर एक जोड़ी जूते रखे थे। राज कपूर के कविराज शैलेंद्र ने मुझे जूते उतारने को कहा, अंदर झांक कर कुछ कहा और बोले,“अंदर चले जाओ।” फिर वह न जाने कहां अंतर्ध्यान हो गए।
शायद यह पूर्वनिश्चित था। मैं संकरे से कमरे में घुसा। दाहिने किसी मशीन के पीछे राज कपूर थे। इशारे से बुलाया, हाथ मिलाया, पास ही कुर्सी पर बैठने को कहा। मेरे लिए अजीब-सा कमरा था। दीवार पर लंबी-सी कांच के दिलों वाली अलमारी में फिल्मों की रील वाले गोल डिब्बे थे। मशीन के आसपास क्लिपों से फिल्मों की पट्टियां झूल रही थीं। वह जो मशीन थी वह मूविओला थी- फिल्म का संपादन करने वाली मशीन। राज कभी एक पट्टी उतारते, मशीन में लगाते, देखते, मुझे भी दिखाते।
राज ने बताया कि ‘संगम’ फिल्म के बोटिंग वाले सीन का संपादन कर रहे हैं। गुत्थी में उलझे थे। एक के बाद एक कई पट्टियां लगाईं, असंतुष्ट होकर उठने को हुए। मुझे समझाया,“ये जो बोट चलने की दिशाएं हैं, मुझे उनको काटती दिशा से आती बोट वाले शॉट की तलाश है।” मेरे पूछने पर उन्होंने बताया, “दर्शक की आंखों को राहत देने के लिए वैसा शॉट चाहिए। शूट किया था, मिल नहीं रहा। चलो, फिर कभी देखूंगा।” तब तक मेरे लिए संपादन का मतलब था किसी पत्रिका या समाचार पत्र का संपादन। अब पता चला कि फिल्मों की नामावली में जो संपादक का नाम आता है, उसका क्या मतलब है और क्या महत्व है।
बिना कुछ समझाए राज ने मुझे फिल्म निर्माण का एक पहलू समझा दिया था। हम उठे, बाहर निकले। राज ने बालकनी के दीवार में पास वाला दरवाजा खोला। अब हम एक छोटे से सिनेमाघर में थे। यह ऑडिटोरियम था, जहां फिल्मों की प्रगति देखने के लिए उन्हें बार-बार देखा जाता है। पूरी होने पर भी। यहीं डिस्ट्रीब्यूटर्स को फिल्म दिखाई जाती है। आर. के. का यह ऑडिटोरियम शानदार था।
जिधर से फिल्म प्रोजेक्ट की जाती है उधर लाल मखमल चढ़ी चौड़े हत्थों और चौड़ी सीटों वाली कुर्सियों की चार-पांच पंक्तियां थीं। सामने बहुत दूर सिनेमा का पर्दा था। सबसे ऊपर वाली पंक्ति में बीच की एक कुर्सी के हत्थे पर इंटरकॉम वाला टेलीफोन रखा था। राज उस कुर्सी पर बैठे, पास ही मुझे बैठाया, बोले, “अब हम आराम से बातें करेंगे।” वह मुझे और मेरी पसंद-नापसंद परख रहे थे, माप रहे थे। मैं उनका भक्त था। पर अपने पत्रकारिता के लंबे अनुभव से सीख गया था कि बड़े से बड़े आदमी से किस तरह सहजता से बात की जाती है।
मैं भी राज को पहचान और समझ रहा था। राज ने पहला सवाल फेंका, “मेरी किसी भी फिल्म का जो भी गाना तुम चाहो सुन सकते हो।” मैंने कहा,“ ‘आवारा’ में बरसात में दुकान के थड्डे पर बैठे कुछ लोग गा रहे हैं। पूरे या सही बोल कुछ इस तरह थे ‘किया कौन अपराध त्याग दई सीता महतारी।” राज चौंक पड़े।
यह छोकरा-सा दिखने वाला कैसा लड़का है, जिसे टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी नई पत्रिका सौंप दी है, आत्मविश्वास का पुतला, सोच में सब फिल्म पत्रकारों से अलग रुचि वाला! जिसे मुझसे मिलाने स्वयं कविराज लाए हैं, जो भी हो, उन्होंने फोन पर कुछ कहा और मैं सामने परदे पर देख रहा था –सरकारी वकील रघुनाथ के मन का अंतर्द्वंद्व। उसके तनाव पूर्ण चेहरे के कई क्लोजअप, कई स्त्रियों के बोल सुनाई पड़ते हैं –‘राम ने सीता को वनवास दिया।’‘हम उसे घर में नहीं रहने देंगी’... ‘निकालो निकालो।’ रघुनाथ अपनी पत्नी को घर से निकाल रहे हैं।
सड़क किनारे दस बारह लोग तन्मय होकर गा रहे हैं, गा क्या रहे हैं, गुहार कर रहे हैं, “जुलुम सहे भारी जनक दुलारी।” सशक्त मर्मस्पर्शी फिल्मांकन वाले गीत के भाव उस शाम भी मेरी संवेदनाओं को सीधा ठोंक रहे थे। दिल जोर से धड़क रहा था। मैं मंत्रमुग्ध-सा बैठा था। मुझे सामान्य होने का समय देकर राज ने कहा। “आप पहले आदमी हैं, जिसने मुझसे यह सीन देखने को कहा। ”मैंने बताया –“इस गीत ने मेरी मानसिकता को गढ़ा है। यह आज के समाज की पहचान है।” साथ ही मैं यह कह बैठा कि एक और गीत है, जिसने मुझे तबाह कर दिया। राज इस बार और भी चौंके। पूछा, ‘कौन-सा है वह गीत?’ मैंने बताया, ‘प्यासा’ का ‘यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’। ” राज कपूर फिर चौंके, “ पूछा इसमें ऐसा क्या है?”
अब मैं खुल कर बात कर रहा था। “यह गीत कह रहा है कर्म निरर्थक है। मैं जीवन को निस्सार मानने लगा। अपने से भागने लगा। अब तक अपनी तलाश में हूं। शायद अपने नए काम में डूब कर अपने को पा सकूं।” राज मुझे कुछ-कुछ समझ रहे थे। तब हम ने बहुत-सी बातें की। कुछ उनकी बेहद निजी बातें। वैजयंती के बारे में, बहुत कुछ ऐसा भी जो प्रकाशनीय नहीं था। उस दिन मैंने तय किया कि कोई बड़ा आदमी आपके भरोसे में अपनी बातें खोल दें, तो वे कमरे सेे बाहर नहीं जानी चाहिए।
इस के बाद ‘श्रीमान 420’ के बारे में भी हम बातें करते रहे। कई बार मैंने उन्हें बच्चों- सा किलकता देखा। पता नहीं राज ने क्या इशारा किया, शैलेंद्र आ गए। हम विदा लेने लगे। राज ने कहा, “तुम शैलेंद्र के दोस्त हो, मेरा दरवाजा तुम्हारे लिए चौबीसों घंटे खुला है।”
समाहार: ‘माधुरी’ को अच्छे सिनेमा का पैरोकार और स्वस्थ पत्रकारिता का प्रतिमान बनाने की प्रक्रिया में मैं अपने को ही तलाश रहा था। और दस साल बाद 26-27 दिसंबर 1973 की आधी रात मुझे अपने जीवन की दिशा मिल गई। समुचित तैयारी कर के 1978 मई में ‘माधुरी’ और फिल्म उद्योग को नमस्कार कर के हिंदी को पहला थिसारस देने की एकांत साधना में लग गया। दिसंबर 1973 को जो लगन लगी थी, वह 23 साल बाद दिसंबर 1996 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर शंकरदयाल को ‘समांतर कोश’ का पहला सेट भेंट करने पर पूरी हुई।