पॉलिटिक्स ऑफ द वूंब: उम्मीद और मजबूरी का ताना-बाना

नाज खान/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 20 Nov 2016 12:49 AM IST
review of the book politics of the womb
d
पॉलिटिक्स ऑफ द वूंब
लेखिका- पिंकी विरानी प्रकाशक- पेंग्विन रेंडम हाउस, इंडिया
मूल्य- 360 रुपये

उम्मीद और मजबूरी का ताना-बाना


सरोगेसी की दुनिया में कुछ लोगों के लिए उम्मीद है, तो कुछ के लिए मजबूरी। इससे जुड़े हर पहलू और इसके व्यावसायीकरण को इस किताब में विस्तार से बताया गया है।

लेखिका और सोशल एक्टिविस्ट पिंकी वीरानी 'बिटर चॉकलेट’ और ‘अरुणाज स्टोरी’ के बाद अपनी नई किताब ‘पॉलिटिक्स ऑफ द वूंब’ से एक बार फिर चर्चा में हैं। आईवीएफ और सरोगेसी जैसे मुद्दों के व्यापारिक रूप लेने के बारे में खुलकर बहस करती यह किताब आईवीएफ तकनीक के खतरों, सरोगेसी के जरिए पैदा कराए जाने वाले बच्चों और मांओं को लेकर बद्तर होते जा रहे हालात पर भी ध्यान दिलाती नजर आती है। 

यह बताती है कि भारत सरोगेसी उद्योग के एक उभरते हुए बड़े बाजार में तब्दील हो चुका है। मतलब साफ है कि निसंतान को संतान का सुख देने वाली परोपकारी मानसिकता से अलग आज सरोगेसी का व्यावसायिकरण कर दिया गया है और इसके जरिए ज्यादा से ज्यादा रुपया कमाया जा रहा है। मगर इस बीच सरोगेट मां के बुनियादी अधिकारों की पूरी तरह अनदेखी का खेल जारी है। 

भारत में ऐसे कई राज्य हैं, जहां महिलाएं परिवार की बेहतर स्थिति व बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए सरोगेट मदर बनती हैं। इस मामले में गुजरात पहले नंबर पर है। दरअसल, इसके लिए परिवार की खराब आर्थिक हालत भी जिम्मेदार है। इसी की वजह से ज्यादातर महिलाएं अपनी कोख बेचने पर मजबूर होती हैं। इसी का फायदा सरोगेसी का बाजार खड़ा करने वाले लोग उठाते हैं। आर्थिक तौर पर कमजोर और अशिक्षित महिलाएं भी अपने अधिकार समझे बिना ही सरोगेसी के लिए तैयार हो जाती हैं। 

इन अहम बिंदुओं के अलावा किताब तकनीक के भयावह इस्तेमाल की ओर भी इशारा करती है और बताती है कि इसमें महिला के शरीर का इस्तेमाल किसी युद्ध अपराधी के तौर पर किया जा रहा है। यहां कृत्रिम प्रजनन के लिए उस पर हाइपर चिकित्सा और हार्मोनल हिंसा का बार-बार इस्तेमाल किया जाता है। 

भारत की लचर कानून व्यवस्था और नैतिक मूल्यों का अभाव भी इसके बाजार में तब्दील होने का बड़ा कारण है। यही वजह है कि बांझपन को दूर करने और संतानसुख देने के नाम पर कुकुरमुत्तों की तरह क्लीनिक खुले नजर आते हैं। यूं तो समय-समय पर इसके खिलाफ आवाजें उठती रही हैं, लेकिन इसके लिए जो कदम उठाए गए हैं, वह नाकाफी हैं। सरोगेट मदर की पीड़ा के साथ सरोगेसी के पीछे की वास्तविकता को उजागर करती यह किताब विषय के लिहाज से अहम है। इसमें तथ्यों का इस्तेमाल और गंभीरता के साथ विस्तार से की गई चर्चा इसे और खास बनाती है।
 

Spotlight

Most Read

Literature

'अनजान चीजों के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहती हूं'

मैं हमेशा चीजों को कहने के लिए कई तरीके ढूंढती रहती हूं।

19 फरवरी 2018

Related Videos

32 से लेकर 170 किलो तक वजन घटा चुके हैं ये सेलिब्रिटीज, अब दिखते हैं ऐसे

यह सभी जानते हैं कि मोटापा बीमारियों की जड़ है। फिर भी लोग अपनी सेहत पर ध्यान नहीं देते। पर जब कोई सेलिब्रिटी इस काम को ममुकिन कर दिखाता है, तो वह लोगों के लिए मिसाल बन जाते हैं।

20 फरवरी 2018

Switch to Amarujala.com App

Get Lightning Fast Experience

Click On Add to Home Screen