अंतर्ध्वनि: राजनीति की समझ के बिना यथार्थ की पहचान नहीं हो सकती

गिरिजा कुमार माथुर Published by: देव कश्यप Updated Mon, 30 Sep 2019 02:34 AM IST
सांकेतिक तस्वीर
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मालवा के परिवेश में बिताए बचपन के दिन भुलाए नहीं भूलते। मीलों दूर तक विस्तृत लाल पठार हैं और उसके साथ ही काली मिट्टी के सांवले खेत आरंभ हो जाते हैं। इमली, सेमल, नीम, खजूरों के झुरमुट, पलाश, खिरनी, जामुन, आम, महुवे, चिरौंची और ताड़ के वृक्षों से छाया हुआ यह प्रदेश है, जहां के ढूहों, टौरियों, टीलों के घुमावदार कटावों के बीच से चट्टानी नदियां बहती हैं।
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मालवे का सौंदर्य व संगीत मुझे बचपन से ही भिगोता रहा। मेरे बिम्ब ऊपरी सजावट या अलंकरण नहीं हैं...बल्कि मेरी अपनी वास्तविकता से उपजे हैं। वह मेरी अनुभव की दुनिया का यथार्थ है। मैं उस प्रदेश का हूं, जहां कालिदास जैसे कवि हुए हैं, जिन्होंने 'मेघदूत' लिखा, 'विक्रमोर्वशीय' और 'अभिज्ञान शाकुंतल' लिखा, तो ऐतिहासिक काव्य 'रघुवंश' भी।


लिहाजा जैसे कालिदास को केवल प्रेम व शृंगार का कवि नहीं कहा जा सकता, उसी तरह मेरे प्रयोगों में, गीतों-कविताओं में मालवी कमनीयता होते हुए भी मुझे केवल शृंगारिक कवि कहकर नहीं समझा जा सकता। मैंने जीवन की आसक्ति और जीवन का उजास पूरा मुक्त जिया है। मार्क्सवाद के अध्ययन से मेरी आंखें खुल गईं। मुझे स्पष्ट हुआ कि राजनीति की समझ के बिना यथार्थ की पहचान नहीं हो सकती।

सत्ता का स्वरूप, राजनीति, समाज का आर्थिक आधार, ठोस यथार्थ, वर्ग चेतना, इतिहास की द्वंद्वात्मकता, दमन और शोषण से मानवीय समता और स्वाधीनता का नया रास्ता नजर आने लगा। वस्तुत: मार्क्सवाद को मैंने अपने देश की जन परंपरा और सांस्कृतिक उत्स की मिट्टी में रोपकर आत्मसात कर लिया और एक नई जीवन दृष्टि मुझे प्राप्त हुई। मुक्ति के यही मूल्य मेरी कविता को झंकृत और उद्दीप्त करते रहे हैं।

(हिंदी के दिवंगत कवि।)

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