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मंजिलें और भी हैं : दुर्गम इलाकों में पुल बनाकर लोगों को मुख्यधारा से जोड़ा
Mon, 29 Jul 2019 03:06 AM IST
गिरीश भारद्वाज
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गिरीश भारद्वाज
Published by: गिरीश भारद्वाज
Updated Mon, 29 Jul 2019 03:06 AM IST
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गिरीश भारद्वाज
- फोटो : amar ujala
मैं कर्नाटक में दक्षिण कन्नड़ जिले के सुल्लिया का रहने वाला हूं। मैंने मांड्या स्थित पीईएस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल की है। मेरे पिता किसान थे। उन्होंने खेतों में प्रयोग होने वाली मशीनों की मरम्मत के लिए अपनी कार्यशाला भी बनाई थी। मैं अक्सर उसी कार्यशाला में मशीनों में आई खराबी को दूर करता था। पढ़ाई के बाद मैं इंजीनियरिंग क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहता था, लेकिन कुछ कारणों से नौकरी नहीं कर सका।
वहां से विफल होने पर मैंने अपना कारोबार शुरू करने का निर्णय लिया। मैंने रेशनल इंजीनियरिंग इंडस्ट्रीज नाम से एक कंपनी खोली। इस बीच एक दिन एक वन अधिकारी ने मुझसे कहा, क्या आप कावेरी (निसार्गधाम) में एक पुल का निर्माण कर सकते हैं? मुझे बिल्कुल भी पता नहीं था कि यह कैसे होगा, लेकिन मैंने इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद मैंने अपने एक दोस्त की मदद से इसके लिए एक प्रारूप बनाना शुरू कर दिया। इसके बाद बिना किसी मूल योजना के लकड़ी, तार की रस्सियों और इस्पात की छड़ों को जोड़कर करीब 50 मीटर लंबा पैदल यात्री पुल का निर्माण किया।
पुल का निर्माण होने के बाद मैंने देखा कि स्थानीय लोगों के जीवन में बदलाव आया। पुल न होने की वजह से पहले वे मुख्यधारा से कटा महसूस करते थे, पर अब वह धीरे-धीरे वहां से बाहर निकलने लगे। इसने मुझे प्रभावित किया, इसके बाद मैंने ऐसे गांवों को मुख्य धारा से जोड़ने का फैसला किया जो कि पुल न होने की वजह से आवाजाही नहीं कर पाते थे।
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वहां से विफल होने पर मैंने अपना कारोबार शुरू करने का निर्णय लिया। मैंने रेशनल इंजीनियरिंग इंडस्ट्रीज नाम से एक कंपनी खोली। इस बीच एक दिन एक वन अधिकारी ने मुझसे कहा, क्या आप कावेरी (निसार्गधाम) में एक पुल का निर्माण कर सकते हैं? मुझे बिल्कुल भी पता नहीं था कि यह कैसे होगा, लेकिन मैंने इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद मैंने अपने एक दोस्त की मदद से इसके लिए एक प्रारूप बनाना शुरू कर दिया। इसके बाद बिना किसी मूल योजना के लकड़ी, तार की रस्सियों और इस्पात की छड़ों को जोड़कर करीब 50 मीटर लंबा पैदल यात्री पुल का निर्माण किया।
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पुल का निर्माण होने के बाद मैंने देखा कि स्थानीय लोगों के जीवन में बदलाव आया। पुल न होने की वजह से पहले वे मुख्यधारा से कटा महसूस करते थे, पर अब वह धीरे-धीरे वहां से बाहर निकलने लगे। इसने मुझे प्रभावित किया, इसके बाद मैंने ऐसे गांवों को मुख्य धारा से जोड़ने का फैसला किया जो कि पुल न होने की वजह से आवाजाही नहीं कर पाते थे।
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वर्ष 1989 में दक्षिणी कर्नाटक के अरामंबुर में पसाविनी नदी में मैंने पुल का निर्माण किया। इसके बाद से पुलों का निर्माण और लोगों की समस्याओं को सुलझाना ही मेरा काम हो गया। मैंने यह काम सिर्फ मानवता के लिए किया और कभी भी अपने काम में किसी भी जाति, पंथ, या धर्म के लिए भेदभाव नहीं किया। 2007 में मैं तेलंगाना के वारंगल जिले में ऐसे ही एक पुल परियोजना पर काम कर रहा था।
वहां मैंने लकनावरम गांव में एक बड़ी झील के किनारे लटकते हुए पुल का निर्माण किया था। जिस क्षेत्र में इस पुल का निर्माण होना था, वह नक्सलियों के वर्चस्व का इलाका था। यह एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि ऐसे किसी भी कार्य में नक्सली अक्सर हस्तक्षेप करते थे। पुल के निर्माण के दौरान कई बार उन्होंने मुझे प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष तौर पर धमकाया, और इस काम को करने से रोका। लेकिन मेरा ध्यान आम लोगों के रोजमर्रा के जीवन में आने वाले फायदे के लिए इस पुल को सफलतापूर्वक निर्मित करने पर था।
तमाम धमकियों और खतरों के बावजूद, मैंने चार साल में इसे बनाकर तैयार किया। इस काम ने नक्सलियों सहित उस क्षेत्र के हर इंसान को चकित कर दिया। मैंने राज्य के होम गार्ड डिपार्टमेंट में 24 साल तक अपनी सेवा दी। मैं अपनी निर्माण तकनीकी से, पारंपरिक पुलों की तुलना में सिर्फ 10 फीसदी की लागत में ही पुल का निर्माण कम समय में करता हूं। अत्यधिक दुर्गम पश्चिमी घाट में मेरे द्वारा बनाए गए पुल लोगों के लिए मददगार साबित हुए हैं। मेरी टीम में करीब 30 इंजीनियर शामिल हैं, जो पुल निर्माण के विशेषज्ञ हैं।
अधिकांश पुलों का निर्माण सरकारी योजनाओं के फंड से किया जाता है, लेकिन यह पहल आम तौर पर स्थानीय समुदाय द्वारा की जाती है। मैंने तकरीबन 127 पर्यावरण-अनुकूल पुलों का निर्माण किया, जिसके लिए 2017 में मुझे पद्मश्री सम्मान दिया गया। मेरा मानना है कि अनुभव चरित्र बनाता है और काम व्यक्तित्व। मैं जो कर रहा हूं, उससे लोगों के जीवन में जो सुविधा, राहत और आनंद मिलता है, उसका कोई मोल नहीं है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
वहां मैंने लकनावरम गांव में एक बड़ी झील के किनारे लटकते हुए पुल का निर्माण किया था। जिस क्षेत्र में इस पुल का निर्माण होना था, वह नक्सलियों के वर्चस्व का इलाका था। यह एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि ऐसे किसी भी कार्य में नक्सली अक्सर हस्तक्षेप करते थे। पुल के निर्माण के दौरान कई बार उन्होंने मुझे प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष तौर पर धमकाया, और इस काम को करने से रोका। लेकिन मेरा ध्यान आम लोगों के रोजमर्रा के जीवन में आने वाले फायदे के लिए इस पुल को सफलतापूर्वक निर्मित करने पर था।
तमाम धमकियों और खतरों के बावजूद, मैंने चार साल में इसे बनाकर तैयार किया। इस काम ने नक्सलियों सहित उस क्षेत्र के हर इंसान को चकित कर दिया। मैंने राज्य के होम गार्ड डिपार्टमेंट में 24 साल तक अपनी सेवा दी। मैं अपनी निर्माण तकनीकी से, पारंपरिक पुलों की तुलना में सिर्फ 10 फीसदी की लागत में ही पुल का निर्माण कम समय में करता हूं। अत्यधिक दुर्गम पश्चिमी घाट में मेरे द्वारा बनाए गए पुल लोगों के लिए मददगार साबित हुए हैं। मेरी टीम में करीब 30 इंजीनियर शामिल हैं, जो पुल निर्माण के विशेषज्ञ हैं।
अधिकांश पुलों का निर्माण सरकारी योजनाओं के फंड से किया जाता है, लेकिन यह पहल आम तौर पर स्थानीय समुदाय द्वारा की जाती है। मैंने तकरीबन 127 पर्यावरण-अनुकूल पुलों का निर्माण किया, जिसके लिए 2017 में मुझे पद्मश्री सम्मान दिया गया। मेरा मानना है कि अनुभव चरित्र बनाता है और काम व्यक्तित्व। मैं जो कर रहा हूं, उससे लोगों के जीवन में जो सुविधा, राहत और आनंद मिलता है, उसका कोई मोल नहीं है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।