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मंजिलें और भी हैं : घायल पक्षियों का इलाज और संरक्षण
Thu, 08 Aug 2019 12:16 AM IST
राकेश अहलावत
राकेश अहलावत
राकेश अहलावत
Published by: राकेश अहलावत
Updated Thu, 08 Aug 2019 12:16 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
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मैं हरियाणा के झज्जर जिले के डीघल गांव का रहने वाला हूं। मैंने स्नातक तक पढ़ाई की है। बचपन से ही पशु-पक्षी मेरे आकर्षण का केंद्र रहे हैं। उनका खुले आसमान में उड़ना मुझे बहुत पसंद है। दुर्भाग्य की बात है कि इंसान ने पक्षियों के लिए कोई भी जगह नहीं छोड़ी है। पक्षियों के प्रमुख बसेरे पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है। प्रवासी पक्षियों के साथ-साथ स्थानीय पक्षियों को भी रहने, विचरण करने की जगह नहीं मिल पा रही है। वर्ष 2011 से मैंने इनके संरक्षण और घायल पक्षियों के उपचार की शुरूआत की।
किसी भी जीव-जन्तु के संरक्षण के लिए सबसे जरूरी चीज होती है, कि आपको उनके बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। मसलन, वे किस वातावरण में रहना पसंद करते हैं, उनका चारा क्या होता है, नाम, रंग, विशेष पहचान आदि। इसके लिए मैंने एक दूरबीन व पक्षियों से जुड़ी एक किताब खरीदी और अपने गांव में ही पक्षियों को खोजना, पहचानना और संरक्षित करना शुरू किया। बहुत जल्द ही मुझे पक्षियों की पहचान और नाम याद हो गए।
इसके बाद मैं दक्षिण भारत के एक स्वयंसेवी संगठन से जुड़ा, जो पक्षियों के संरक्षण के लिए काम करता है। इसके तहत हम पक्षियों की प्रजातियों की पूरी जानकारी प्राप्त करते हैं, इसके बाद स्थानीय अधिकारियों का सहयोग लेकर उनके संरक्षण के लिए काम करते हैं। मैंने देखा है कि प्लास्टिक आज के समय में पक्षियों का सबसे बड़ा दुश्मन बन चुका है। हमें प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल करना चाहिए और खुले में तो इसे बिल्कुल नहीं फेंकना चाहिए। मैंने कई घायल पक्षियों का उपचार किया है, जिनकी चोंच, पैर या पंख प्लास्टिक से जख्मी हो गए थे।
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किसी भी जीव-जन्तु के संरक्षण के लिए सबसे जरूरी चीज होती है, कि आपको उनके बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। मसलन, वे किस वातावरण में रहना पसंद करते हैं, उनका चारा क्या होता है, नाम, रंग, विशेष पहचान आदि। इसके लिए मैंने एक दूरबीन व पक्षियों से जुड़ी एक किताब खरीदी और अपने गांव में ही पक्षियों को खोजना, पहचानना और संरक्षित करना शुरू किया। बहुत जल्द ही मुझे पक्षियों की पहचान और नाम याद हो गए।
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इसके बाद मैं दक्षिण भारत के एक स्वयंसेवी संगठन से जुड़ा, जो पक्षियों के संरक्षण के लिए काम करता है। इसके तहत हम पक्षियों की प्रजातियों की पूरी जानकारी प्राप्त करते हैं, इसके बाद स्थानीय अधिकारियों का सहयोग लेकर उनके संरक्षण के लिए काम करते हैं। मैंने देखा है कि प्लास्टिक आज के समय में पक्षियों का सबसे बड़ा दुश्मन बन चुका है। हमें प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल करना चाहिए और खुले में तो इसे बिल्कुल नहीं फेंकना चाहिए। मैंने कई घायल पक्षियों का उपचार किया है, जिनकी चोंच, पैर या पंख प्लास्टिक से जख्मी हो गए थे।
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एक घायल पक्षी को पकड़ने में कई बार मुझे पांच दिन भी लग जाते हैं। लेकिन मैं उन्हें पकड़ता हूं, उनका इलाज करता हूं, फिर उन्हें छोड़ देता हूं। पक्षी व जीव संरक्षण में सबसे अहम है, शिकारियों पर रोक लगवाना। एक बार मैं पक्षियों के एक बसेरे को देखने जा रहा था। रास्ते में मुझे कुछ शिकारी एक नील गाय का शिकार करते दिखे। इससे पहले कि मैं उन्हें रोकता, उन्होंने उसे मार दिया। इसके बाद वे उसका सिर धड़ से अलग कर बोरियों में बांधकर ले जाने लगे। तब तक मैं वहां पहुंच गया और उन्हें रोका, तो वे धमकाने लगे। उनमें से एक तो मुझे मारने के लिए भी दौड़ा, पर मैंने खुद को बचा लिया।
इस बीच शोर सुनकर गांव से कई लोग मौके पर पहुंच गए। मैंने तुरंत वाइल्ड लाइफ के अधिकारियों को फोन किया, जब तक अधिकारी नहीं आए, तब तक वे मुझे लगातार मारने की धमकी देते रहे और धक्का-मुक्की करते रहे। पर मैं पीछे नहीं हटा, अंतत: उन्हें पकड़वा ही दिया। एक समय मेरे गांव और उसके आसपास के इलाकों में पक्षियों व अन्य जानवरों के शिकारियों की भरमार थी। पर जब से उन्हें पकड़वाकर वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट से जुर्माना लगवाना शुरू किया है, यह संख्या नगण्य हो गई है।
मेरे काम का सुखद परिणाम यह है, कि अब मेरा गांव पक्षियों की पसंदीदा जगह बन गया है। मेरे गांव में करीब तीन सौ से ज्यादा प्रजाति की पक्षियां देखी जा चुकी हैं। गांव में अक्सर देश-विदेश के पक्षी प्रेमी आते रहते हैं। इस काम के साथ-साथ मैं पौधारोपण भी करता हूं। मैं अपने आस-पास अक्सर देखता हूं कि कई प्रजातियों के पेड़ तो विलुप्त होने की कगार पर है। हम स्थानीय पेड़ लगाने के बजाय सजावटी बाहरी पेड़ लगा रहे हैं। स्थानीय पेड़ों का संरक्षण इसलिए जरूरी है, क्योंकि इन पर पक्षी अपना बसेरा बनाते हैं।
इस बीच शोर सुनकर गांव से कई लोग मौके पर पहुंच गए। मैंने तुरंत वाइल्ड लाइफ के अधिकारियों को फोन किया, जब तक अधिकारी नहीं आए, तब तक वे मुझे लगातार मारने की धमकी देते रहे और धक्का-मुक्की करते रहे। पर मैं पीछे नहीं हटा, अंतत: उन्हें पकड़वा ही दिया। एक समय मेरे गांव और उसके आसपास के इलाकों में पक्षियों व अन्य जानवरों के शिकारियों की भरमार थी। पर जब से उन्हें पकड़वाकर वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट से जुर्माना लगवाना शुरू किया है, यह संख्या नगण्य हो गई है।
मेरे काम का सुखद परिणाम यह है, कि अब मेरा गांव पक्षियों की पसंदीदा जगह बन गया है। मेरे गांव में करीब तीन सौ से ज्यादा प्रजाति की पक्षियां देखी जा चुकी हैं। गांव में अक्सर देश-विदेश के पक्षी प्रेमी आते रहते हैं। इस काम के साथ-साथ मैं पौधारोपण भी करता हूं। मैं अपने आस-पास अक्सर देखता हूं कि कई प्रजातियों के पेड़ तो विलुप्त होने की कगार पर है। हम स्थानीय पेड़ लगाने के बजाय सजावटी बाहरी पेड़ लगा रहे हैं। स्थानीय पेड़ों का संरक्षण इसलिए जरूरी है, क्योंकि इन पर पक्षी अपना बसेरा बनाते हैं।