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मंजिलें और भी हैं : जल संरक्षण के साथ बंजर जमीन पर लाया हरियाली
Mon, 01 Jul 2019 07:01 AM IST
Gaurav Pandey
अयप्पा मसागी
अयप्पा मसागी
Published by: Gaurav Pandey
Updated Mon, 01 Jul 2019 07:01 AM IST
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अयप्पा मसागी
- फोटो : अमर उजाला
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मेरा जन्म उत्तरी कर्नाटक के गडग जिले में एक गरीब किसान परिवार में हुआ। बचपन में अक्सर मैं देखता था कि मेरे पिता खेतों में पानी की कमी से जूझते रहते थे। तभी से मेरा सपना था कि गांवों के विकास के लिए साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करूं। मैंने पिताजी की अनिच्छा के बावजूद मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।
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पढ़ाई पूरी कराने के लिए मेरी मां को अपने गहने तक बेचने पड़े। इंजीनियरिंग की परीक्षा पास करते ही मुझे बंगलूरू के भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (बीईएमएल) में नौकरी मिल गई। वहां कुछ दिन काम करने के बाद मैं लार्सन ऐंड टूब्रो (एलएंडटी) में आ गया। लेकिन कुछ साल बाद मैंने नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह से जल संरक्षण की मुहिम में लग गया।
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अपने पैतृक गांव गडग में छह एकड़ जमीन खरीद कर मैंने उसे ही 'रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट लैब' बना दिया। उसी दौरान कर्नाटक में सूखा पड़ गया। उसके बाद आई बाढ़ से मेरी सारी फसल खराब हो गई। बाढ़ में फंसने के कारण एक बार तो मुझे पेड़ पर बैठकर रात गुजारनी पड़ी। उस आपदा के दौरान ही मेरे मन में विचार आया कि क्यों न बाढ़ के पानी को जमा करने के उपायों पर कुछ काम किया जाए।
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इस विचार को जमीन पर उतारने के लिए मैंने अन्ना हजारे और जलपुरुष राजेंद्र सिंह से मुलाकात की। इसके बाद धीरे-धीरे मैंने बोरवेल रिचार्ज की अपनी तकनीक विकसित कर ली। मुझे लगता है कि धरती सबसे बड़ी फिल्टर है। अपने मॉडल के तहत मैं पहले एक बड़े गड्ढे में बड़े पत्थर, बजरी, रेत और कीचड़ की मदद से एक ढांचा बना देता हूं। जब पानी गिरता है तो यह पानी बजरी और रेत से होता हुआ नीचे तक जाता है।
मैं प्रति एकड़ आठ ऐसी संरचना बनाता हूं। इसमें बारिश का पानी जमा होने लगता है। मैं पानी को इकट्ठा करता हूं और उसे जमीन में उतार देता हूं। पानी के गड्ढे में जमा होने के बाद वह रेत और बोल्डर से छनते हुए नीचे चला जाता है जिससे, ग्राउंड वाटर लेवल बढ़ने लगता है। जब जमीन में पूरी तरह से पानी चला जाता है, तो उस गड्ढे में बुलबुले नजर आने लगते हैं। हमेशा मेरी कोशिश यह रहती है कि जो पानी जमा हो रहा है, वह गर्मी के कारण भाप बनकर उड़ न जाए।
वर्ष 2014 में मैंने आंध्र प्रदेश के सूखा प्रभावित चिलमाचुर में 82 एकड़ बंजर जमीन खरीदी और उसे 37 कंपार्टमेंट में बांटकर पानी से लबालब कर डाला, साथ ही, पेड़ लगाकर उसे हरा-भरा कर दिया। मैं 'वॉटर लिटरेसी फाउंडेशन' भी चलाता हूं, जो वॉटर वॉरियर्स तैयार कराता है। मैं स्कूलों में जाकर बच्चों को पानी के महत्व और उसे बचाने के उपायों के बारे में बताता हूं।
मैं लैपटॉप और सीडी लेकर कर्नाटक के गांव-गांव में जाता हूं। इस दौरान किसानों को पानी के प्रति सावधानी बरतने से संबंधित एक बुकलेट भी देता हूं। अब तक तकरीबन 100 से ज्यादा इंटर्न्स मेरे मॉडल की ट्रेनिंग ले चुके हैं। अब तो जर्मनी, जापान और अमेरिका के लोग भी मेरे पास पानी बचाने के उपाय सीखने आ रहे हैं।
इस तरह मेरे मॉडल से पांच सौ झीलें और एक लाख बोरवेल रिचार्ज हो चुके हैं, जिससे लगभग बीस लाख से अधिक लोगों की पानी पर आधारित निर्भरता पूरी हूई है। इसके लिए मुझे लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में जगह भी मिली है। पानी को लेकर इतना काम करने के बाद अब सरकार भी मेरे मॉडल की तरफ ध्यान देने लगी है और उसे अन्य जगहों पर लागू करना चाहती है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।