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मंजिलें और भी हैं : गरीबी को मात देकर विदेश तक पहुंचाई अपनी कला

Fri, 26 Jul 2019 01:49 AM IST
शकीला शेख शकीला शेख
शकीला शेख Published by: शकीला शेख Updated Fri, 26 Jul 2019 01:49 AM IST
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manzilein aur bhi hain shakeela sheikh says Overcome poverty and took art work abroad
शकीला शेख - फोटो : Amar Ujala
मेरा जन्म पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के मोगराघाट गांव में हुआ था। छह भाई-बहनों में मैं सबसे छोटी थी। मैंने और मेरे परिवार ने गरीबी में दिन बिताए हैं। ऐसा समय भी देखा जब घर में खाने के लिए कुछ नहीं होता था। तब मेरी उम्र महज एक वर्ष की थी, जब मेरे पिता हमें छोड़कर बांग्लादेश चले गए। मेरी मां ने हमारा पालन-पोषण करने के लिए सब्जी बेचना शुरू किया। चूंकि गांव में सब्जियां कम कीमत में बिकती थीं, इसलिए मां मोगराघाट से चालीस किलोमीटर दूर कोलकाता सब्जी बेचने जाती थीं। कभी-कभार जिद करने पर वह मुझे भी अपने साथ ले जाती थीं। पर मां मुझे सब्जी नहीं बेचने देती थीं। मैं सड़क पर चलने वाले लोगों, गाड़ियों, बस और ट्राम को देखती रहती थी। कई बार जब मां काम कर रही होती, तो मैं फुटपाथ पर ही अपनी नींद पूरी कर लेती थी। जब घर में दो वक्त के खाने का जुगाड़ नहीं हो पा रहा था, तो शिक्षा जैसी चीजों से भला मेरा क्या वास्ता पड़ता। 
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इस बीच, हमें बलदेव राज पनेसर मिले। वह सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी थे, उन्हें चित्रकला से प्रेम था, वह बेहतरीन चित्रकारी भी करते थे। वह सब्जियां खरीदने के लिए हर दिन बाजार आते थे और हमारी दुकान से सब्जियां खरीदते थे। वह कंधे पर कॉटन का एक झोला रखते थे, जिसमें हमेशा चॉकलेट, पेंसिल और पत्रिकाएं होती थीं, जिन्हें वह गरीब बच्चों के बीच वितरित किया करते थे। एक दिन वे बच्चों को चॉकलेट और अंडे वितरित कर रहे थे। मैं उनके सामने थी, उन्होंने मुझे भी वे चीजें दीं, लेकिन मैंने लेने से इनकार कर दिया। इससे वह प्रभावित हुए, उन्होंने मुझसे चॉकलेट और अंडे न लेने का कारण पूछा तो मैंने उन्हें सारी स्थिति बता दी। इसके बाद उन्होंने स्कूल में मेरा दाखिला करवाया और मेरी किताब-कॉपी आदि खरीदी। मैं उनको बाबा कहकर बुलाती थी। शुरुआत में मेरी मां को बाबा की यह दयालुता कोई छल लगती थी। लेकिन बदलते समय के साथ वह उनकी नेकी पर कोई प्रश्न चिह्न न उठा सकीं। तीसरी कक्षा तक मैं कोलकाता में ही पढ़ी। पर बाबा को लगा कि रोज गांव से आना-जाना मेरे लिए सुरक्षित नहीं होगा, तो उन्होंने मेरा दाखिला गांव में ही कराने के बारे में सोचा। इसके लिए उन्होंने मेरे भाई को तीन सौ रुपये भी दिए। पर भाई ने वे रुपये अपने पास रख लिए और दाखिला भी नहीं करवाया। हालांकि यह बात मैं कभी भी बाबा को नहीं बता पाई।
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इस बीच, मेरी शादी अकबर शेख से हो गई। हालांकि उनकी भी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। ऐसे में परिवार के भरण-पोषण के लिए मैंने कागज के लिफाफे बनना शुरू किया, जिससे रोजाना 20-30 रुपये की कमाई हो जाती थी। एक बार बाबा ने मुझे और मेरे पति को एक प्रदर्शनी में आमंत्रित किया, जिसमें फाइन आर्ट्स के नमूनों को प्रदर्शित किया जाना था। प्रदर्शनी देखने के बाद मैं भी इस तरह की चित्रकारी करने के बारे में सोचने लगी। मैंने भी कार्डबोर्ड और पेंट मंगवाए और अपने पहले कोलाज पर काम करना शुरू किया। एक वर्ष तक पेंटिंग में खुद को लगाने के बाद बाबा के संरक्षण में मैंने कोलकाता में अपनी पहली एकल प्रदर्शनी का आयोजन किया। जहां अपनी पेंटिंग्स से मैंने 70 हजार रुपये कमाए। इसके बाद बाबा ने मुझे कोलकाता में सीआईएमए (इंटरनेशनल मॉडर्न आर्ट सेंटर) कला गैलरी से जोड़ा। जहां से मेरे द्वारा बनाए गए पेंटिंग कोलाज देश के साथ फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे और अमेरिका तक पहुंच रहे हैं। मैंने गरीबी को कभी मजबूरी नहीं बनाई। पनेसर बाबा ने जो मुझे शिक्षा दी, उसी को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।
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-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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