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मंजिलें और भी हैं : आदिवासियों को औषधीय खेती से दिया रोजगार
Mon, 05 Aug 2019 05:43 AM IST
Avdhesh Kumar
राजाराम त्रिपाठी
राजाराम त्रिपाठी
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Mon, 05 Aug 2019 05:43 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : a
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मैं मूल रूप से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ का रहने वाला हूं, पर छत्तीसगढ़ में रहता हूं। मेरे दादा जी बहुत समय पहले कृषि नवाचार के लिए बस्तर बुलाए गए थे, जिसके बाद वह यहीं बस गए। खेती-किसानी में हमेशा मेरा मन लगता था। पढ़ाई खत्म होने के बाद मैं एक कॉलेज में पढ़ाने लगा। कुछ समय बाद मेरा चयन स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में प्रोबेशनरी अधिकारी के पद पर हो गया।
कुछ समय बाद नौकरी से मेरा मन उचटने लगा, तो मैंने इसे छोड़ने का निर्णय लिया। हालांकि जब मैंने नौकरी छोड़कर कृषि से जुड़ने का निर्णय किया, तो मेरे परिवार में कोई भी इस बात से खुश नहीं हुआ। नौकरी छोड़ने के बाद खेती-किसानी के नए तरीकों को जानने, समझने के लिए मैंने कई देशों में आयोजित गोष्ठियों में हिस्सा लिया और औषधीय पौधों के बाजार का भी अध्ययन किया। काफी सोचने के बाद मैंने बस्तर में मां दंतेश्वरी हर्बल ग्रुप की स्थापना की।
शुरुआती दौर में मैंने सब्जियों की विदेशी प्रजातियां उपजाने का विचार किया। इसके चलते मैंने हॉलैंड से गोभी के बीज लाकर पौध तैयार की और उनकी रोपाई की। फसल भी अच्छी हुई। गोभी तैयार होने के बाद जब मैंने फसल बाजार में भेजी, तो वह डेढ़ रुपये किलो के भाव बिकी। करीब छह क्विंटल गोभी बेचने के बाद जब मैंने सारा खर्च निकाला, तो बचत का आंकड़ा सैकड़ा भी पार नहीं कर सका। उसके बाद मैंने पारंपरिक खेती से तौबा कर ली।
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कुछ समय बाद नौकरी से मेरा मन उचटने लगा, तो मैंने इसे छोड़ने का निर्णय लिया। हालांकि जब मैंने नौकरी छोड़कर कृषि से जुड़ने का निर्णय किया, तो मेरे परिवार में कोई भी इस बात से खुश नहीं हुआ। नौकरी छोड़ने के बाद खेती-किसानी के नए तरीकों को जानने, समझने के लिए मैंने कई देशों में आयोजित गोष्ठियों में हिस्सा लिया और औषधीय पौधों के बाजार का भी अध्ययन किया। काफी सोचने के बाद मैंने बस्तर में मां दंतेश्वरी हर्बल ग्रुप की स्थापना की।
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शुरुआती दौर में मैंने सब्जियों की विदेशी प्रजातियां उपजाने का विचार किया। इसके चलते मैंने हॉलैंड से गोभी के बीज लाकर पौध तैयार की और उनकी रोपाई की। फसल भी अच्छी हुई। गोभी तैयार होने के बाद जब मैंने फसल बाजार में भेजी, तो वह डेढ़ रुपये किलो के भाव बिकी। करीब छह क्विंटल गोभी बेचने के बाद जब मैंने सारा खर्च निकाला, तो बचत का आंकड़ा सैकड़ा भी पार नहीं कर सका। उसके बाद मैंने पारंपरिक खेती से तौबा कर ली।
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