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मंजिलें और भी हैं : बेसहारा लोगों की भूख मिटाने को ठुकराया विदेश का प्रस्ताव

Thu, 01 Aug 2019 12:37 AM IST
नारायण कृष्णन नारायण कृष्णन
नारायण कृष्णन Published by: नारायण कृष्णन Updated Thu, 01 Aug 2019 12:37 AM IST
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manzilein aur bhi hain : abroad Proposed rejects for Destitute and hungry people
नारायण कृष्णन - फोटो : अमर उजाला
मैं तमिलनाडु के मदुरई का रहने वाला हूं। पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने बंगलूरू के एक फाइव स्टार होटल में बतौर शेफ अपने करियर की शुरुआत की थी। मैंने कई तरह के पकवान बनाने की विधि सीख ली थी, जिसके चलते मुझे स्विट्जरलैंड के एक पांच सितारा होटल में काम करने का प्रस्ताव मिला। वहां जाने से पहले मैं माता-पिता से मिलने के लिए मदुरई गया। मैं एक दिन वहां 
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घूम रहा था कि मेरी नजर कुछ विक्षिप्त लोगों पर पड़ी, जो कूड़ेदान में फेंका गया खाना निकालकर खा रहे थे। 

यह देखकर मैं दंग रह गया। मैं बार-बार यही सोच रहा था कि दुनिया में न जाने कितने लोग ऐसे हैं, जिन्हें एक वक्त का खाना भी नहीं मिलता। इस घटना के बाद मैं परेशान हो उठा। मैंने निर्णय लिया कि चाहे जो हो जाए, उनके लिए कुछ न कुछ जरूर करूंगा। पूरे दिन इधर-उधर भटकने के बाद जब मैं घर पहुंचा, तो पिताजी बहुत गुस्से में थे और मां व बहन परेशान थीं। सभी के बार-बार पूछने पर मैंने उनको बताया कि अब स्विट्जरलैंड नहीं जाना चाहता। 
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यह सुनकर मेरे माता-पिता स्तब्ध रह गए। उन्हें समझ में नहीं आया कि आखिर ऐसा क्या हो गया कि मैं कहीं न जाने की बात कर रहा हूं। मैंने उनसे कहा, मुझे यहीं रहना है। यहां कितने लोग भूखे हैं? तमाम तो ऐसे हैं, जो इस लायक ही नहीं कि खुद के लिए दो वक्त की रोटी जुटा सकें। मैं ऐसे लोगों के लिए कुछ करना चाहता हूं। मेरे इस फैसले से पिताजी बहुत नाराज हुए। सबने मुझे बहुत समझाया, अंत में यह तय हुआ कि मुझे जो करना है वह करूं, लेकिन परिवार इसमें कोई मदद नहीं करेगा। इसके बाद मैंने यह काम शुरू कर दिया। 
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नौकरी छोड़ते समय मेरे पास कुछ रुपयों की बचत थी, जिससे मैं सड़क किनारे रेस्त्रां से खाना खरीदता और सड़क किनारे पड़े उन लोगों को खिलाता, जो विक्षिप्त थे, या काम करने में असमर्थ थे। धीरे-धीरे वे लोग मुझे पहचानने लगे। लेकिन आखिरकार ऐसा कब तक चलता? बहुत जल्द मेरी आर्थिक स्थिति डगमगाने लगी। इसलिए काफी सोचने के बाद मैंने यह निर्णय लिया कि इन्हें खाना खुद बनाकर खिलाऊंगा। लेकिन यहां समस्या यह आई कि आखिर जगह कहां मिलेगी। 

पिताजी मुझसे नाराज थे, पर मां ने मेरी बातों को सुनने के बाद पुराने मकान की जगह इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी। इस बीच मेरे साथ कुछ और लोग जुड़े। मैं रोजाना सुबह चार बजे उठकर खाना बनाता हूं, जिसे एक वैन में रखा जाता है। हम मदुरई के करीब दो सौ किलोमीटर के दायरे में आने वाले भूखे, नंगे, पागल, बीमार, अपंग, बेसहारा, बेघर को ढूंढ़कर खाना देते हैं। साथियों की सलाह पर मैंने इस काम के लिए अक्षय ट्रस्ट नाम की संस्था बनाई। 

इस बीच, एक दिन मेरे पिता के बॉस ने मेरी तारीफ करते हुए मिलने की बात कही। साथ ही पापा को दस हजार का चेक मेरी संस्था के नाम देते हुए अप्रत्यक्ष मदद की बात कही। यह सुनकर पापा को बहुत अच्छा लगा, वह मेरे काम से खुश हुए। मेरे काम के लिए सीएनएन ने मुझे उन 10 लोगों की सूची में शामिल किया, जो समाज सेवक के रूप में मशहूर थे और पूरी ईमानदारी से बिना किसी दिखावे के अपना काम कर रहे थे। 

यह काम चंदे से मिले पैसों से चलता है। लेकिन उससे महीने में करीब 22 दिन ही काम चल पाता है। बाकी के दिनों के लिए मैं अपने घर से मिलने वाले किराये को भी गरीब व बेसहारा लोगों की भूख मिटाने के लिए लगा देता हूं।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
 
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