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चिट्ठियां: उदासी को उल्लास की जगह क्यों दें हम?

Sun, 07 Jan 2018 03:56 PM IST
अभियान डेस्क, अमर उजाला
अभियान डेस्क, अमर उजाला Updated Sun, 07 Jan 2018 03:56 PM IST
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letter of readers: a son act embarrassing humanity, he thrown out Elderly mother by roof
चिट्ठी 1- अपने समाज को गौर से देखिए !
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एक समर्थ बेटा मां की बीमारी से इस कदर थक जाए, खीझ जाए या हार जाए कि वह अपनी मां को छत से फेंक दे, तो हमें तमाम प्रगति और उपलब्धियों के बीच अपने होने और अपने समाज को ठीक से समझने की जरूरत है। यह किसी पाषाण युग की घटना नहीं है, बल्कि साइबर युग की है। मां का दर्जा इस जहां में सबसे ऊपर माना जाता है।

रिश्तों की दुहाई की बात हो, तो भी सबसे पहले मां और बेटे के रिश्ते की दुहाई दी जाती है। लेकिन एक कलयुगी बेटे ने इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली वारदात को अंजाम दिया। उसने अपनी ही बुजुर्ग मां को छत से फेंक कर मार डाला। वजह भी उतनी झकझोर देने वाली है, जितना कि यह अपराध। इस कुकर्म के पीछे कारण सामने आया है मां की बीमारी। बीमार मां की देखभाल से बचने के लिए कलयुगी बेटे ने मां को छत से फेंक कर मार डाला।
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वैसे यह वारदात कुछ महीने पहले की बताई जा रही है, लेकिन सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद इस वारदात के बारे में अब पता चला है। पहले तो लोग इसे एक एक्सीडेंट समझ रहे थे। उन्हें लगा कि महिला की मौत छत से गिरने से हुई है। लेकिन उक्त महिला की मौत के कुछ दिन बाद पुलिस को एक गुमनाम चिट्ठी मिली और फिर जब सीसीटीवी फुटेज को खंगाला गया, तब सब-कुछ साफ हो गया।
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सीसीटीवी फुटेज में साफ दिख रहा था कि जो असहाय मां खुद अपनी चप्पल भी नहीं पहन सकती थी, उसे किस तरह यह कलयुगी बेटा खींचता-घसीटता हुआ पहले सीढ़ियां चढ़ाने की कोशिश कर रहा है। सीसीटीवी में मां की लाचारी साफ-साफ दिख रही है, जिसे चार से पांच सीढ़ियां चढ़ने में 15-20 मिनट का समय लगा। पुलिस को यही बात नागवार गुजरी कि जो महिला चार सीढ़ियां खुद से नहीं चढ़ सकती, वह छत पर क्या करने जाएगी और छत की बाउंड्री पर कैसे चढ़ेगी? इसके बाद मामला साफ था। इस मामले में आरोपी बेटा असिस्टेंट प्रोफेसर संदीप है।

कहा जाता है कि दुनिया में मां और बेटे का रिश्ता सबसे पवित्र रिश्तों में से एक होता है। लेकिन अगर एक बेटा ही इस रिश्ते को कलंकित कर अपनी मां की जान लेने पर उतारू हो जाए, तो फिर उस बेटे के बारे में आप क्या कहेंगे? ऐसा ही हुआ गुजरात के राजकोट में रहने वाली जयश्री बेन नथवाणी के साथ। इस मामले में सीसीटीवी फुटेज न सिर्फ इस बेटे की करतूत दिखाती है, बल्कि समाज को आईना भी दिखाती है कि हम कहां जा रहे हैं? पुलिस पूछताछ में संदीप ने जो बताया वह भी हैरान कर देने वाला था।

उसने बताया कि उसकी मां बीमार रहती थीं और घर में झगड़ा बहुत होता था। मां की देखभाल घर का कोई सदस्य नहीं करना चाहता था। खुद संदीप भी नहीं। नई, बेहतर और तेज जिदंगी की चाह में उसकी मां ही उसकी बेड़ियां बन गई थीं। जिन्हें रास्ते से हटाने के लिए इंसानियत को शर्मसार करने वाली वारदात को अंजाम दिया गया। आखिर ऐसी प्रगति हमें क्यों चाहिए, जहां रिश्तों की कोई कदर ही न हो? इंसानियत को शर्मसार करने वाली इस तरह की घटनाएं समाज में क्यों बढ़ रही हैं, इस पर सोचने की जरूरत है?
- गोरखपुर से अलका श्रीवास्तव

 

चिट्ठी 2- खगोलीय दृष्टि से भी महान महीना है माघ

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माघ महीना प्रकृति में बदलाव का संदेश लेकर आता है। इस माह को दिशा बदलाव का माह भी कहा जाता है, क्योंकि सूर्य 16 जुलाई को कर्क राशि में प्रवेश करने के बाद छह महीने के दौरान सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक और धनु राशि में रहता है और सूर्य की छह माह की यह अवस्‍था दक्षिणायन अवस्‍था कहलाती है। दक्षिणायन अवस्था में सूर्य का तेज कम और चंद्र का प्रभाव अधिक रहता है। इस दौरान दिन छोटे होने लगते हैं और रातें लंबी होती हैं। लेकिन माघ मास में सूर्य उतरायण हो जाता है।

उत्तरायण होते ही, सूर्य का तेज बढ़ने लगता है। दिन लंबे होने लगते हैं और रातें छोटी। इस माह पड़ने वाला मकर संक्रांति पर्व, सूर्य की दिशा और मौसम की दशा बदलने का सूचक भी है, जो मनुष्य को प्रकृति के समीप लेकर आता है। यह माह शीत ऋतु की विदाई और बसंत ऋतु के स्वागत का भी माह होता है।

इस माह में प्रयाग में स्नान करना अति उत्तम माना गया है। विशेषज्ञों की मानें, तो इस दिन आकाशीय नक्षत्रों से निकलने वाली तरंगों का विशेष प्रभाव केंद्र प्रयाग होता है। माघ मास में बसंत पंचमी के दिन से बसंत ऋतु का आगमन होता है। यह ऋतु सेहत की दृष्टि से भी लाभकारी है, इसलिए हमें इस महीने का दिल से स्वागत करना चाहिए।
- देहरादून से मेघवर्ण ठाकुर

चिट्टी 3- लोकतंत्र पर हावी भीड़ के ठेकेदार

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एक समय था जब लोग स्वेच्छा से नेताओं के भाषण सुनने जाते थे, लेकिन अब भाषण जबरन सुनवाए जाने का चलन शुरू हो गया है। बेरोजगारी, लाचारी, भुखमरी, आपाधापी, बेईमानी, भ्रष्टाचार अशिक्षा, गरीबी के बहुमत को छूते वर्तमान भारत में नेताओं की लोकप्रियता बरकरार रखने के लिए पार्टी कार्यकर्ता स्वेच्छा या विवशता के कारण भी नेताओं का भाषण सुनने आए।

प्रत्येक व्यक्ति को दैनिक मजदूरी से कुछ अधिक दाम और मुफ्त खाने-पीने व मुफ्त आने-जाने का लालच देकर भीड़ मैनेजमेंट ठेकेदारों से भीड़ इकट्ठी करने का ठेका दे देते हैं, क्योंकि अब रोजाना ही विपक्ष के नेता, सीएम, पीएम या मंत्री का कहीं-न-कहीं भाषण होता ही रहता है और कामकाजी व्यक्ति तो इन भाषणों से दूरी बनाए ही रखता है, परंतु रैली सफल बनाने और नेताजी को आनंदित करने के लिए भीड़ भी जरूरी है और यदि भीड़ इकट्ठी न हुई, तो नेताजी का क्रोध सातवें आसमान पर चढ़ना स्वाभाविक है।

क्या कारण है कि अब नेताओं के लिए पहले जैसी भीड़ नहीं जुटती। इसका एक कारण तो शायद पहले जैसे नेताओं का नहीं होना भी है और दूसरा नेताओं की कही बातों से भरोसा उठ जाना है। राजनेता वादे तो कर जाते हैं, लेकिन उनके वादे कितने पूरे होते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। यही कारण है कि नेताओं की रैलियों में पहले जैसी भीड़ नहीं जुटती है।
- मेरठ से डॉ. मनोज दुबलिश

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