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'मेरे लेखन में विद्रोह और व्यंग्य साथ-साथ चलते हैं'
किरण नागरकर
Updated Fri, 12 Jan 2018 08:47 AM IST
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Kiran Nagarkar
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मेरा बचपन गरीबी में गुजरा। मेरे दादाजी विद्रोही थे और उनका असर मेरे स्वभाव से लेकर मेरे लेखन तक पर पड़ा है। मराठी चितपावन ब्राह्मण होने के बावजूद उन्हें ब्रह्म समाज ने आकर्षित किया। वह स्वामी विवेकानंद के साथ अमेरिका गए थे।
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पर शिकागो धर्म सम्मेलन में वह विवेकानंद जैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाए। वह मुंबई में अंग्रेजी के शुरुआती भारतीय प्रोफेसरों में से थे और उन्होंने 1893 में स्वराज की मांग की थी। बचपन में मैं अभिनेता बनना चाहता था, लेकिन मैंने अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया। अलबत्ता बतौर लेखक मेरी शुरुआती रचना मराठी में आई। मेरे दोस्त दिलीप चित्रे के पिता अभिरुचि नाम से एक मराठी पत्रिका निकालते थे, जिसमें मैंने एक छोटी कहानी लिखी थी।
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फिर सात साक्कम त्रिचलीस नाम से मेरा उपन्यास आया, जिसे मराठी साहित्य का क्लासिक माना जाता है। दोस्त और कवि अरुण कोल्हटकर के साथ फ्रीलांस कॉपीराइटर का काम करते हुए मैंने रावण और एडी लिखी, जिस पर फिल्म बनने वाली थी, पर नहीं बनी। अलबत्ता महाभारत पर आधारित बेडटाइम स्टोरी लिखने के बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। यह मूलतः आपातकाल की स्मृतियों पर है।
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इसकी द्रोपदी पांडवों को डांटती है, क्योंकि उन्होंने उसे पांचों भाइयों की पत्नी बना दिया, तो एकलव्य द्रोणाचार्य को गुरुदक्षिणा में मिट्टी का अंगूठा भेंट करता है। मेरे लेखन में विद्रोह और व्यंग्य साथ-साथ चलते हैं। हालांकि मराठी में मुझे कभी गंभीर लेखक नहीं माना गया। लेकिन इसका मुझे दुख नहीं। कोई मुझे सुने या न सुने, मैं अपनी बात कहता रहूंगा।