इतिहास की गलियों से वर्तमान तक का सफर

कुमार प्रशांत Updated Sun, 28 Jan 2018 02:25 PM IST
 Journey between history to the present
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1948 की 12 जनवरी थी! अभी-अभी आजाद हुए देश की राजधानी दिल्ली का बिरला भवन। आज बापू का मौन दिवस था, लेकिन यह दूसरे मौन दिवसों से कुछ अलग था, क्योंकि बापू कहीं भीतर ही गुम थे। प्रार्थना खत्म हुई। उलझते-से पांवों से वह अपने कमरे की ओर चले। मनु ने ओढ़ाकर सुला दिया। बापू सोए नहीं, उठ बैठे और कुछ लिखने लगे।
जो लिखा, उसका अनुवाद सुशीला नैयर करती थीं। सुशीला जी ने पढ़ना शुरू किया कि अचानक वह चीख पड़ीं : अरे, मनु, देख यह क्या! बापू तो कल से अनशन पर जा रहे हैं !! उपवास फिर? अभी ही तो बमुश्किल छह माह पहले कोलकाता का वह भयंकर उपवास हुआ था।

बात जंगल में आग की तरह फैल गई। सरदार, जवाहर, राजेन बाबू, मौलाना, देवदास सभी एक-पर-एक पहुंचने लगे। किसी के पास कहने को कुछ नहीं था, लेकिन यह सबको पता था कि यह बूढ़ा आदमी नहीं रहा, तो किसी के बस का कुछ भी नहीं रह जाएगा।

मौन पूरा हुआ। बापू ने कहा :  पंजाब जाने के लिए आया था यहां, लेकिन देखा कि दिल्ली तो वह दिल्ली बची नहीं है। दिल्ली हाथ से निकली, तो हिंदुस्तान निकला समझिए! मैंने देखा कि हिंदू, मुसलमान, सिख एक-दूसरे के लिए पराए हो चुके हैं। जो मिला, उसी ने बताया कि दिल्ली में मुसलमानों का रह पाना अब संभव नहीं है। ऐसी लाचारी के साथ जीना तो मैं कभी कबूल न करूं। मेरा उपवास लोगों की आत्मा को जाग्रत करने के लिए है, उसे मार डालने के लिए नहीं।
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