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'जीवन जितना ही दुखद होता है, उतना ही सुखद भी'
जॉन बैनविले
Updated Tue, 20 Feb 2018 09:45 PM IST
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Author John Banville
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कल्पित किरदार शब्दों में बने होते हैं, हाड़-मांस के नहीं। उनकी स्वतंत्र इच्छा नहीं होती, क्योंकि वे इच्छाशक्ति का प्रयोग नहीं कर सकते। उन्हें आसानी से रचा और खत्म किया जा सकता है। लेकिन एक मनुष्य अगर खुद पर निर्भर नहीं रहता, तो वह बहुत कुछ नहीं कर सकता है।
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लिखने के लिए वास्तव में खुद को स्वयं में गहरे डुबोना होता है और वहीं खो जाना पड़ता है। मेरा मानना है कि मानव सभ्यता का सबसे बड़ा आविष्कार वाक्य है। मैं लगातार घंटों बैठकर एक आदर्श वाक्य लिखने की कोशिश करता रहता हूं। लिखकर जीवित रहना एक बहुत बड़ा विशेषाधिकार है। लंबे समय तक बैठकर असाधारण शब्दों को इकट्ठा करना एक अद्भुत बात है। इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता।
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मैं इसे देवत्व के करीब होने के समान मानता हूं। हम जो कुछ भी करते हैं, वह इस ज्ञान के साथ जुड़ा होता है कि यह शायद हम आखिरी बार कर रहे हैं और यही चीज हमारे कार्य को अविश्वसनीय रूप से बेहतर बनाती है। बचपन में खुशी एक अलग चीज थी।
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तब इसका मतलब नई चीजों, नए अनुभवों और नई भावनाओं को हासिल करना होता था। और उनका उपयोग करना उसी तरह था, जैसे बहुत-सी चमकदार ईंटों को इस उम्मीद में रखना कि एक दिन इससे शानदार मंडप बनेगा। सभी कलाएं एक निश्चित स्तर पर मनोरंजन हैं। अब भी ऐसे लोग हैं, जो किताबों की परवाह करते हैं और यह मानना अपने आप में बड़ी बात है कि साहित्य से आप जीवन को संवार सकते हैं। जीवन जितना ही दुखद होता है, उतना ही सुखद भी होता है।
-आयरिश उपन्यासकार एवं पत्रकार