फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Literature ›   irshad khan sikandar poetry review

आसुओं का तर्जुमा: भरपूर शायरी की खेप

Fri, 23 Sep 2016 02:05 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 23 Sep 2016 02:05 PM IST
विज्ञापन
irshad khan sikandar poetry review
irshad khan
वैसे तो कविता के सभी स्वरूपों में उर्दू शायरी का दुनिया भर में एक अलग मुकाम और जलवा शुरू से ही कायम रहा है, मगर पिछले दसेक सालों में उर्दू शायरी की लोकप्रियता में जबरदस्त बढ़ोत्तरी देखने में आ रही है। शायरी के कद्रदान शायरी को और बेहतर समझने और इससे लुत्फंदोज़ होने के लिए उर्दू ज़बान तक सीख रहे हैं। 
विज्ञापन


जाहिर है, इसमें सोशल मिडिया की अहम् भूमिका है। लेकिन उससे भी बड़ा कारक है जदीद शायरी की एक नई बयार। यह जदीद शायरी रवायतों को बिना खारिज किये अपने लिए नए रास्ते तलाश करती हुई आहिस्ता आहिस्ता अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ रही है। 
विज्ञापन


इरशाद खान सिकंदर इसी जदीद शायरी की तहरीक की नुमाइंदगी करने वाली एक नौजवान और बुलंद आवाज का नाम है। और यह आवाज उनके पहले ही ग़ज़ल संग्रह ‘आंसुओं का तर्जुमा’ से एक गूँज बन कर उभरी है।
विज्ञापन
विज्ञापन


शायरी का डिक्शन एक बहसतलब मौजूअ है। मगर इरशाद अपनी शायरी को किसी बहस में उलझाना नहीं चाहते। उनका डिक्शन हिंदी, उर्दू और फ़ारसी के झगडे से परे अवाम का डिक्शन है। यह खालिस हिन्दुस्तानी स्वर है जो शायरी के ऊँचे मेयारों तक पहुँचने के लिए पाठक का रास्ता सुगम बना रहा है। 

आमफहम शब्दावली का इस्तेमाल हल्की मंचीय शायरी भी करती है, मगर उसमें कविता के बुनियादी तत्वों का अभाव होता है। इरशाद के यहाँ ख़ास बात यह है कि उनके लिए सरलता और काव्यात्मकता या शेरियत में कोई अंतर्विरोध नहीं है। उनकी ग़ज़लें शेरियत से भरपूर भी हैं और आसानी से संप्रेषित भी होती हैं। कविताई का यह मुश्किल हुनर वर्षों की साधना और नैसर्गिक प्रतिभा के अनोखे मेल से पैदा होता है। और इरशाद इन दोनों के धनी हैं:   “अब मैं ज़ख्मों को फूल कहता हूँ/ फन ये मुश्किल से हाथ आया है।”

सच है, शायरी या कविता दर्द को संगीत बनाने की कला है। लेकिन इसमें जान तभी आती है जब दर्द भी असली हो और संगीत भी गहरा। उथलेपन और बनावटी भावों से ज्यादा अकाव्यात्मक कोई चीज नहीं हो सकती। अफ़सोस कि ये समझ आते आते वक्त लग जाता है। ग़ज़लों को महबूब से गुफ्तगू का जरिया भर बताने से बात कहीं आगे जा चुकी है। 

आज शायरी ज़िन्दगी के तमाम पहलुओं से रूबरू है और ख़ुशी का बायस यह है कि यह अंतर्संवाद उसी नफासत, अनुशासन और शाइस्तगी के साथ हो रहा है जो ग़ज़ल की रूह है। इरशाद की शायरी पर चर्चा करते हुए सबसे ज्यादा उसकी इसी आधुनिकता पर बात होनी चाहिए। 

इरशाद के पास अनुभवों का एक प्रमाणिक संसार है जिसे वे बखूबी अपनी ग़ज़लों में पिरोते हैं। और इन अनुभवों, इन ख़यालों को व्यक्त करने के लिए वे बिलकुल ताज़ा क़ाफिये चुनते हैं। ऐसे क़ाफिये जो जितने प्रयोगधर्मी हैं, उतने ही परंपरा में धंसे हुए। ग़ज़ल में क़ाफ़ियों की अपनी अहमियत है। नए क़ाफ़ियों का अर्थ है नए विचार। इरशाद के यहाँ क़ाफ़ियों के अभिनव प्रयोग के कुछ नमूने देखिये:
“इतना तो हेर-फेर हुआ उनके हाथ से

दिल की तपिश का और भी विस्तार कर दिया।”

“क्या करूँ ग़म भी छुपाना ठीक से आता नहीं

दास्ताँ छेड़ी किसी ने मैं उजागर हो गया”

 “बस इसी बात की तसल्ली है

हर कदम मेरा सार्थक उट्ठा”

“मसाइल बांह फैलाए हमारा

हमारे घर में स्वागत कर रहे थे”
 
“इक मुकद्दर के पुजारी ने ये आफत बोई है

खुद तो नर्वस था ही आकर सबको नर्वस कर गया।”

 “हमारी जेब में पैसे नहीं हैं

सो हम क्या और हमारी आस्था क्या”


ऊपर के इन तमाम अश’आर में ‘विस्तार’, ‘उजागर’, ‘सार्थक’, ‘स्वागत’, ‘नर्वस’ और ‘आस्था’ जैसे क़ाफिये ग़ज़ल की खूबसूरती को प्रभावित किये बगैर उसके आयाम को विस्तृत कर रहे हैं। प्रत्येक शब्द का एक अपना अर्थ-संसार होता है और ग़ज़ल के फॉर्मेट में नए लफ़्ज़ों का सटीक इस्तेमाल उसकी प्रभावकारिता और अर्थवत्ता को दोबाला कर देता है। इरशाद की इस आधुनिक काव्य चेतना में ज़िन्दगी की तल्ख़ हकीकतें सबसे ऊपर हैं। लेकिन उनकी शायरी इस तल्खी से परे रहती है। 

वे कड़वी से कड़वी सच्चाई को पचाते हुए उसमें सकारात्मकता तलाश करते हैं। और इसी दृष्टिकोण से उनकी शायरी में एक ख़ास चमक पैदा हो जाती है। उर्दू शायरी की एक बड़ी खासियत यह है कि इसमें कटुता के लिए कोई स्थान नहीं है। तंज अगर है भी तो उसका लहजा इतना मीठा, नर्म और सौम्य है कि तमाम दुश्वारियों के बीच ज़िन्दगी पुरउम्मीद लगने लगती है। वह कविता जिसमें समस्त अंधियारे के बावजूद उजाले का ख्वाब न हो, किसी काम की नहीं है। इरशाद की शायरी में रौशनी का यह ख्वाब तो है ही, दुनिया को रौशन करने का भरपूर हौसला भी है: “मैं चराग़ से जला चराग़ हूँ/ रौशनी पेशा है खानदान का।” यह अदब की खिदमत में जुटे सभी मातहतों के लिए एक तारीख़ी शेर है।
 
इरशाद की शायरी की आधुनिकता का एक और उल्लेखनीय पहलू है उनकी समकालीनता। उनकी शायरी ऐसी है जिसमें झाँक कर उनके वक़्त का बहुत साफ़ अक्स देखा जा सकता है। उनकी शायरी महानगरीय जीवन के विकट व्यक्तिवाद, बाजार का छलावा, बेहिसी, सामाजिक विकार और आर्थिक विषमता को सलीके से दर्ज करती चलती है और इन सब के दरमियान इंसान के लगातार अकेले पड़ते जाने को रेखांकित करती है। उदाहरण के लिए इन अश’आर पर नज़रसानी करें:

“ ये घर मकान में तब्दील हो न जाए कहीं

हरेक बात पे मेरा, तुम्हारा होता हुआ।”

 “ज़मीनें आसमां छोने लगी हैं

हमारी कीमतें अब भी वही हैं।”

 “समझ आया है है ये बीनाई खो कर

उजालों से भी डरना चाहिए था।”
 
“कुछ लोग फेंक आते हैं कूड़े के ढेर में

कुछ लोग टूट जाते हैं औलाद के बगैर।”

 “ऊँची इमारतों की बिना डालता रहा

ग़ुरबत के भारी बोझ से दुहरा हुआ बदन।”


 गौर करने वाली बात ये है कि इन तमाम शेरों में समकालीन यथार्थ इकहरा या सपाट नहीं है। कविता के ठोस मानकों पर खरा उतरने वाले ये यथार्थ के बहुअर्थी रूपक हैं। इरशाद की शायरी की यह गहराई उन्हें अपने अहद का एक ज़रूरी शायर बनाती हैं। शायरी न सिर्फ यथार्थ को अभिव्यक्त करने की एक युक्ति है बल्कि शायर से यह भी अपेक्षा रखनी चाहिए कि यथार्थ के पार जा कर जीवन के विरोधाभासों को सुलझाने की कोशिश करे। कहने की ज़रूरत नहीं कि यह कार्य कितना दुष्कर है।

 मगर इरशाद अपनी शायरी में इन लक्ष्य दुसाध्य को ही करते हैं। विरोधाभासों को पहचानना और उनको सही परिप्रेक्ष्य में रखने की इरशाद की सलाहियत उनकी आंतरिक समझदारी का धोतक है जो बहुत सहजता से उनके पाठक तक पहुँचती है और उसे एक पकी हुई मैच्योर कविता का आस्वाद मिलने लगता है। ज़िन्दगी के दांव-पेंच और उसकी विडंबनायें उर्दू शायरी में बहुतायत में आई हैं। मगर इरशाद इस रवायत को और मानीखेज बनाते हुए उसे और पुख्ता करने में लगे हैं। “वहां पर ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी थी/ उसी कूचे में मरना चाहिए था।” शायरी जीवन के प्रति इसी दृष्टि की खोज का नाम है। 

इस खोज की आगे और परवाज तो देखिये: “अब मेरे सर पे सबको हंसाने का काम है/ मैं चाहता हूँ काम ये संजीदगी से हो।” इरशाद की शायरी मानवीय गरिमा से छलकती हुई शायरी है। उनका भरोसा अपनी खुद्दारी और अज्म पर है। प्रतिकूलताएं उन्हें डिगा नहीं पातीं। “ज़ब्त करूँगा ग़म की शिद्दत/ बिछड़ा तो मर जाऊँगा नइं।” “मसाइल हल न होंगे ख़ुदकुशी से/ उलझना ही पड़ेगा ज़िन्दगी से।”
 
ग़ज़ल के फॉर्मेट में प्रयोग की गुंजाइश न के बराबर है। मगर इरशाद जैसे हौसलामंद शायर अपनी प्रयोगधर्मिता के लिए कोई न कोई गलियारा खोज ही निकालते हैं। इरशाद ने अपनी शायरी में मुहावरों और ज़बान का बेहद दिलचस्प और सुन्दर इस्तेमाल किया है। इरशाद की शायरी की एक और विशिष्टता अदबी परंपरा के प्रति उनका गहरा सम्मान भाव है। वे आधुनिकता और परंपरा के मेल को ले कर किसी भ्रम में नहीं नज़र आते। 


उनके यहाँ उर्दू के ट्रेडमार्क रवानी वाले इश्किया शेर और अहसासात हैं तो खालिस जुझारूपन से भरी नई संवेदना भी है। लेकिन अपने बुजुर्गों और असातिजा के सामने उन्हें सर झुकाने में कोई गुरेज नहीं होता: “वो बारगाहे-अदब है अकीदतों की जगह/ मैं उस गली से न गुजरूँगा ख़ाक उड़ाता हुआ।” और ये भी कि “पढ़-पढ़ के सोचता हूँ किताबों की शक्ल में/ कितने अज़ीम लोग मिरे घर में बस गए।” आज की पीढ़ी में ऐसी विनम्रता दुर्लभ है। और यही उन्हें उनका असली मकाम भी दिलवाएगी। ‘आंसुओं का तर्जुमा’ इरशाद खान सिकंदर की भरपूर शायरी का मज़ा लेने के लिए तो पढ़ी ही जानी चाहिए, उनकी शायरी के चमकदार मुस्तकबिल की तस्दीक करने के लिए भी हर अच्छी शायरी के मुरीद को इसका मुताअला ज़रूर करना चाहिए।

 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed