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Hindi News ›   Columns ›   Literature ›   Interpolation : Not less than half, provided we have the art of living it

अंतर्ध्वनि : आधा भी कम नहीं, बशर्ते हमें उसे जीने की कला आती हो

Tue, 23 Jul 2019 03:28 AM IST
Avdhesh Kumar कुंवर नारायण
कुंवर नारायण Published by: Avdhesh Kumar Updated Tue, 23 Jul 2019 03:28 AM IST
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Interpolation : Not less than half, provided we have the art of living it
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : demo pic
आधा भी कम नहीं होता, बशर्ते हमें उसे भी पूरी तरह जीने की कला आती हो। अधूरे तर्क भी बड़े काम के होते हैं, क्योंकि कोई भी तर्क कभी पूरा नहीं होता। अधूरे किस्से, अधूरी खोजें, अधूरी आकांक्षाएं, अधूरे समझौते, अधूरे युद्ध, अधूरे सपने, अधूरे प्रेम, अधूरी ज़िंदगी...एक पूरा संसार है इनका, उस संसार से कहीं बड़ा और रोचक, जिसे हम पूर्णताओं का संसार कहते हैं। 
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संदेह करना चाहिए कि पूर्णता जैसा कुछ है भी या वह भी एक भ्रम है? या हम कहीं भी 'समाप्त' लिख कर अपने को समझा लेते हैं कि एक किताब पूरी हुई। मैंने ऐसी कोई भी किताब नहीं पढ़ी है, जिसके 'अंत' से एक नई किताब की शुरुआत न हो सके। मुझे शुरुआतें पसंद हैं : उनमें एक उत्साह, उम्मीद और ताजगी होती है। सब कुछ अंत तक जी डाला जाए, यह जरूरी तो नहीं। काफी कुछ को अधूरा ही छोड़ कर नई-नई शुरुआतों की ओर लौटना अधिक रोमांचक और आशाप्रद लगता है। 
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'उपदेश' जैसे शब्दों से भागने की जरूरत नहीं। ये भी 'विचार' करने, देने और पाने के जायज तरीके रहे हैं - संवादी तरीके। कविता की ताजगी जब खत्म होने लगती है, तब वह सब से पहले भाषा की ओर से सड़ना शुरू करती है। कविता, अनुभव और भाषा के साथ एक खास तरह का सलूक करती है। कविता अनुभव की भाषा पर एक दूसरी तरह का चिंतन है। कविता 'यथार्थ' के बारे में 'कल्पना' की भाषा में बोलती है। 
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इस तरह यथार्थ और कल्पना के बीच वह एक निकटता बनाती है- दूरी नहीं। हम कल्पना की भाषा में भी यथार्थ के बारे में सोच और बातें कर सकते हैं। इस विरोधाभास को दूर करने में ही कविता न केवल दर्शन को संभव बनाती है, बल्कि इस आम धारणा को भी खंडित करती है कि कल्पनाशीलता और यथार्थ में कोई बुनियादी विरोध है ही, जिसे दूर नहीं किया जा सकता।

दिवंगत हिंदी कवि
 
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