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भारत में रंगून की याद के साथ
सुरेंद्र कुमार
Updated Sun, 06 Mar 2016 05:37 PM IST
सार
- प्राचीन भारतीय इतिहास के छात्रों के लिए स्वर्णभूमि कोई नया नाम नहीं होगा। उन्हें इस जगह के बारे में इतिहास की किताबों में कई संदर्भ मिलते हैं।
- श्वेदागन पगोड़ा से जुड़े आश्चर्यों और उसके प्रति सम्मान को सहेजने वाले कई ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद हैं।
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विस्तार
अगर आप म्यांमार का इतिहास, भूगोल और समाजशास्त्र एक ही किताब में पढ़ना चाहते हैं, तो इस किताब की मदद लेना बुरा विकल्प साबित नहीं होगा।
प्राचीन भारतीय इतिहास के छात्रों के लिए स्वर्णभूमि कोई नया नाम नहीं होगा। उन्हें इस जगह के बारे में इतिहास की किताबों में कई संदर्भ मिलते हैं। श्वेदागन पगोड़ा से जुड़े आश्चर्यों और उसके प्रति सम्मान को सहेजने वाले कई ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद हैं। धर्म और संस्कृति के सदियों पुराने रिश्तों से बंधे भारत और म्यांमार के बीच शांति और सौहार्द्र के रिश्तों को और मजबूत बनाने में भारतीय बौद्ध भिक्षुओं की भी अहम भूमिका रही है। बौद्ध धर्मशास्त्र में भी यहां के श्वेदागन पगोड़ा का जिक्र मिलता है। इससे इतर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रशंसक भी उन्हें याद करते हुए उनके बर्मा के साथ संबंधों की पुरानी यादों में खोने से खुद को रोक नहीं पाते हैं। इनसे अलग वे हिंदी सिनेमा प्रेमी भी हैं, जो आज भी `मेरे पिया गए रंगून, वहां से किया है टेलीफून' गाना बजने पर उसकी लय में खो जाते हैं।
फिर शायद ही कोई ऐसा शख्स हो, जो यंगून की जमीन में दफ्न अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की इन पंक्तियों पर सहम न जाता हो- 'कितना बदनसीब है जफर दफ्न के लिए, दो गज जमीन तक न मिली कु-ए -यार में', मगर आज के दौर की बात करें, तो उत्तर-पूर्व के लोगों को छोड़कर, एक आम भारतीय के लिए म्यांमार का महत्व न के बराबर है।
तथ्यों पर गौर करें, तो भारत के 95 प्रतिशत युवा, जो फेसबुक और ट्विटर पर सक्रिय रहते हैं, वे म्यांमार की नई राजधानी 'नाएप्यीडॉ' का नाम तक नहीं बता सकते। इस मायने में राजीव भाटिया की यह किताब बेहद साहसिक और सराहनीय है। विस्तृत होने के साथ-साथ यह किताब रोचक भी है, इसे गहन अध्ययन के बाद लिखा गया है। इसमें म्यांमार में हुए बदलावों से जुड़ी कई छोटी-छोटी रोचक घटनाएं भी मिलेंगी और इतिहास के पन्ने खोलते अंश भी। इसमें म्यांमार का वह इतिहास भी है, जिसने म्यांमार को एक देश के रूप में विकसित होते हुए और यहां के निवासियों के जीवन को पीढ़ी दर पीढ़ी उससे प्रभावित होते देखा है।
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हर अध्याय के बाद संदर्भ के कई पन्ने और 200 से ज्यादा एब्रिवेशन (संक्षिप्तीकरण) लेखक द्वारा इस विषय में की गई कड़ी मेहनत और शोध को भी दर्शाते हैं। जानकारीपूर्ण होने के बावजूद भी यह किताब एक उपन्यास की तरह मनोरंजक लगती है। भारत और म्यांमार के ऐतिहासिक संबंध, म्यांमार की जातीय विभिन्नता, समय-समय पर किए गए लोकतांत्रिक प्रयोग और उसकी जगह लेता लंबा सैनिक शासन, खूनी संघर्ष, अशांति और उनके नाटकीयपात्र...ये सभी दृश्य इस किताब में जीवंत प्रतीत होने लगते हैं और आभास दिलाते हैं जैसे कोई डॉक्यूमेंट्री देख रहे हों। ब्रिटिश भारत की नीतियां, सैनिक शासन के शुरुआती दौर में भारत-म्यांमार के रिश्तों में आया बदलाव, नरसिम्हा राव के शासनकाल और उनके बाद आए प्रधानमंत्रियों की तरफ से भारत की लुक ईस्ट पॉलिसी के तहत म्यांमार के महत्व को समझने की बात को इस किताब में विस्तार से लिखा गया है।
भारत, चीन, अमेरिका, जापान, यूरोपियन यूनियन और आसियान देशों समेत अन्य बाहरी देशों से म्यांमार के संबंधों का विश्लेषण भी इस किताब में निरपेक्ष तरीके से किया गया है।
हालांकि पिछले 20 सालों के दौरान भारत-म्यांमार के बीच हुई यात्राओं के बारे में दिया गया संदर्भ थोड़ा विवादास्पद लगता है। इसे पढ़कर मालूम होता है जैसे विदेश मंत्रालय की बीएसएम डिविजन द्वारा तैयार समीक्षा पढ़ी जा रही हो। अगर आप एक किताब में म्यांमार के इतिहास, संस्कृति, समाज, धर्म, राजनीति और आरि्थक स्थिति से जुड़ी सभी जानकारियां हासिल करना चाहते हैं, तो यह किताब काफी मददगार साबित हो सकती है।
छात्रों से लेकर शिक्षाविदों और कूटनीति की समझ रखने वालों के लिए भी यह किताब भारत और म्यांमार के रिश्तों को जानने-समझने का एक रोचक दस्तावेज है।
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प्राचीन भारतीय इतिहास के छात्रों के लिए स्वर्णभूमि कोई नया नाम नहीं होगा। उन्हें इस जगह के बारे में इतिहास की किताबों में कई संदर्भ मिलते हैं। श्वेदागन पगोड़ा से जुड़े आश्चर्यों और उसके प्रति सम्मान को सहेजने वाले कई ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद हैं। धर्म और संस्कृति के सदियों पुराने रिश्तों से बंधे भारत और म्यांमार के बीच शांति और सौहार्द्र के रिश्तों को और मजबूत बनाने में भारतीय बौद्ध भिक्षुओं की भी अहम भूमिका रही है। बौद्ध धर्मशास्त्र में भी यहां के श्वेदागन पगोड़ा का जिक्र मिलता है। इससे इतर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रशंसक भी उन्हें याद करते हुए उनके बर्मा के साथ संबंधों की पुरानी यादों में खोने से खुद को रोक नहीं पाते हैं। इनसे अलग वे हिंदी सिनेमा प्रेमी भी हैं, जो आज भी `मेरे पिया गए रंगून, वहां से किया है टेलीफून' गाना बजने पर उसकी लय में खो जाते हैं।
फिर शायद ही कोई ऐसा शख्स हो, जो यंगून की जमीन में दफ्न अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर की इन पंक्तियों पर सहम न जाता हो- 'कितना बदनसीब है जफर दफ्न के लिए, दो गज जमीन तक न मिली कु-ए -यार में', मगर आज के दौर की बात करें, तो उत्तर-पूर्व के लोगों को छोड़कर, एक आम भारतीय के लिए म्यांमार का महत्व न के बराबर है।
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तथ्यों पर गौर करें, तो भारत के 95 प्रतिशत युवा, जो फेसबुक और ट्विटर पर सक्रिय रहते हैं, वे म्यांमार की नई राजधानी 'नाएप्यीडॉ' का नाम तक नहीं बता सकते। इस मायने में राजीव भाटिया की यह किताब बेहद साहसिक और सराहनीय है। विस्तृत होने के साथ-साथ यह किताब रोचक भी है, इसे गहन अध्ययन के बाद लिखा गया है। इसमें म्यांमार में हुए बदलावों से जुड़ी कई छोटी-छोटी रोचक घटनाएं भी मिलेंगी और इतिहास के पन्ने खोलते अंश भी। इसमें म्यांमार का वह इतिहास भी है, जिसने म्यांमार को एक देश के रूप में विकसित होते हुए और यहां के निवासियों के जीवन को पीढ़ी दर पीढ़ी उससे प्रभावित होते देखा है।
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हर अध्याय के बाद संदर्भ के कई पन्ने और 200 से ज्यादा एब्रिवेशन (संक्षिप्तीकरण) लेखक द्वारा इस विषय में की गई कड़ी मेहनत और शोध को भी दर्शाते हैं। जानकारीपूर्ण होने के बावजूद भी यह किताब एक उपन्यास की तरह मनोरंजक लगती है। भारत और म्यांमार के ऐतिहासिक संबंध, म्यांमार की जातीय विभिन्नता, समय-समय पर किए गए लोकतांत्रिक प्रयोग और उसकी जगह लेता लंबा सैनिक शासन, खूनी संघर्ष, अशांति और उनके नाटकीयपात्र...ये सभी दृश्य इस किताब में जीवंत प्रतीत होने लगते हैं और आभास दिलाते हैं जैसे कोई डॉक्यूमेंट्री देख रहे हों। ब्रिटिश भारत की नीतियां, सैनिक शासन के शुरुआती दौर में भारत-म्यांमार के रिश्तों में आया बदलाव, नरसिम्हा राव के शासनकाल और उनके बाद आए प्रधानमंत्रियों की तरफ से भारत की लुक ईस्ट पॉलिसी के तहत म्यांमार के महत्व को समझने की बात को इस किताब में विस्तार से लिखा गया है।
भारत, चीन, अमेरिका, जापान, यूरोपियन यूनियन और आसियान देशों समेत अन्य बाहरी देशों से म्यांमार के संबंधों का विश्लेषण भी इस किताब में निरपेक्ष तरीके से किया गया है।
हालांकि पिछले 20 सालों के दौरान भारत-म्यांमार के बीच हुई यात्राओं के बारे में दिया गया संदर्भ थोड़ा विवादास्पद लगता है। इसे पढ़कर मालूम होता है जैसे विदेश मंत्रालय की बीएसएम डिविजन द्वारा तैयार समीक्षा पढ़ी जा रही हो। अगर आप एक किताब में म्यांमार के इतिहास, संस्कृति, समाज, धर्म, राजनीति और आरि्थक स्थिति से जुड़ी सभी जानकारियां हासिल करना चाहते हैं, तो यह किताब काफी मददगार साबित हो सकती है।
छात्रों से लेकर शिक्षाविदों और कूटनीति की समझ रखने वालों के लिए भी यह किताब भारत और म्यांमार के रिश्तों को जानने-समझने का एक रोचक दस्तावेज है।