मंजिलें और भी हैं: वेतन के दसवें हिस्से से शुरू की थी मुहिम
मैं उत्तर प्रदेश में इटावा जिले के नगला ककरैया (लखना) का रहने वाला हूं। मेरे पिता खेती के साथ ही मुफ्त में आयुर्वेद चिकित्सा भी किया करते थे। बचपन से ही वह मुझे दूसरों का सहयोग करने व सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करते रहते थे। इटावा से पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए मैं लखनऊ आ गया। यहां लखनऊ पॉलीटेक्निक से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद मेरी नौकरी रेलवे में लग गई। पढ़ाई के दौरान भी मेरे अंदर लोगों का सहयोग करने की भावना मौजूद रही, जिसके कारण मैं कई तरह के जन-जागरूकता कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी निभाता रहा। कुछ समय बाद मेरी तैनाती रेलवे के अनुसंधान, अभिकल्प एवं मानक संगठन के ब्रांच आफिस मुंबई में हुई। वहां जाकर भी मैं लगातार सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहा। वहां मेरी मुलाकात अनेक ऐसे युवक-युवतियों से हुई, जो सरकारी नौकरी की तैयारी के लिए पैसे कमाने मुंबई आए थे। पर उच्च शिक्षित होने के बावजूद योग्यता के अनुरूप काम न मिलने पर वे जिल्लत भरी जिंदगी जी रहे थे।
तैयारी करना चाहते थे।