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मंजिलें और भी हैं : जरूरतमंद बच्चों के लिए लगाया भविष्य दांव पर
Fri, 31 May 2019 02:45 AM IST
Avdhesh Kumar
किंजल शाह
किंजल शाह
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Fri, 31 May 2019 02:45 AM IST
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किंजल शाह
- फोटो : अमर उजाला
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तब मैं ग्रैजुएशन में थी, जब इस अभियान का विचार आया। मेरे कुछ दोस्त सप्ताहांत में झुग्गियों में जाकर गरीब व जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाते थे। उनके साथ मैं भी इसका हिस्सा बन गई। मैं गुजरात के अहमदाबाद की रहने वाली हूं। 2008 से मैं इन बच्चों को शिक्षित करने का काम कर रही हूं। उस समय लगभग 6-7 दोस्तों के साथ मिलकर बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू किया। हमने गुलबाई टेकरा बस्ती के नगरपालिका स्कूल में जाकर बात की, जिसके बाद हर शनिवार और रविवार दो घंटे तक बच्चों को पढ़ाने की अनुमति मिल गई। मूर्तियां बनाना यहां के लोगों का मुख्य रोजगार है, लेकिन यहां के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान देने वाला कोई नहीं है। हमने वहां जाना शुरू किया, तो पता चला कि ये बच्चे पढ़ना चाहते थे, लेकिन अवसर न मिलने की वजह से आगे नहीं आ पा रहे थे।
पढ़ाई पूरी होने के बाद कुछ न कुछ कारणों से यह काम रुक-सा गया। मुझे भी नौकरी मिल गई थी, बावजूद इसके मैं हर शनिवार व रविवार इन बच्चों को पढ़ाने के लिए लगातार बस्ती में जाती रही। बस्ती में कई बच्चे ऐसे थे, जो 7वीं-8वीं के बाद स्कूल नहीं गए, जिनमें खासतौर पर कई लड़कियां थीं। इस बारे में मैंने उनके माता-पिता से बात की, तो पता चला कि कहीं सरकारी स्कूल 8वीं तक ही थे, तो कई लोग
प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने में सक्षम नहीं थे। यह सब देखकर मैंने तय किया कि इन बच्चों को सिर्फ सप्ताहांत नहीं, बल्कि रोज पढ़ाऊंगी। पर नौकरी के साथ उन्हें पढ़ाना किसी चुनौती से कम नहीं था। मेरी समझ में आ चुका था कि मेरी खुशी किसी बड़ी कंपनी के साथ नौकरी करने में नहीं, बल्कि इन गरीब व जरूरतमंद बच्चों का भविष्य सुधारने में है। मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी और पूरा समय इन बच्चों के बीच बिताने लगी।
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नौकरी छोड़ने के फैसले पर परिचित और रिश्तेदार बोलते कि, अपना भविष्य खराब करने की क्या जरूरत है, लेकिन मेरे पापा ने प्रोत्साहित करते हुए कहा, यदि तुमने यह ठान लिया है, तो तुम्हारा अभियान ऐसा हो कि तुम वाकई किसी की जिंदगी बदल सको। मैंने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से कुछ रुपये एकत्रित किए और बस्ती के पास ही एक कमरा किराये पर ले लिया। वहां रोज सुबह-शाम दो-दो घंटे मैं इन बच्चों को पढ़ाने लगी। फिर प्राइवेट स्कूलों में इन बच्चों के दाखिले के लिए भी मैंने फंड इकट्ठा किया। धीरे-धीरे, इनमें बहुत बदलाव आया और इनका स्तर ऊंचा उठा। बच्चों की सफलताओं ने मुझे एहसास कराया कि इस काम को मैं अपनी पूरी जिंदगी कर सकती हूं।
इसके बाद मैंने ‘श्वास’ नाम से एनजीओ रजिस्टर करवाया। इन बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए मैंने प्रोफेशनल टीचर रखे हैं। छह बच्चों के साथ शुरू हुआ यह अभियान अब 600 बच्चों तक पहुंच चुका है। यह अभियान गुलबाई टेकरा के अलावा कई बस्तियों तक फैल गया है। मेरा ध्यान केवल इन बच्चों की पढ़ाई पर नहीं है, इन्हें वोकेशनल ट्रेनिंग भी दी जा रही है, ताकि ये हुनर सीखें और आत्म-निर्भर बन सकें। ‘श्वास’ के लिए दो-तीन कंपनियों के सीएसआर से स्पॉन्सरशिप मिलती है, तो बहुत से लोग भी बच्चों के लिए डोनेशन देते हैं। मेरा मानना है कि, आप अपने आस-पास के किसी भी बच्चे को पढ़ाएं और लगातार उसके साथ काम करें। अगर बच्चे की काबिलियत पर भरोसा करें, तो वे जरूर कुछ बेहतर कर सकते हैं।
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पढ़ाई पूरी होने के बाद कुछ न कुछ कारणों से यह काम रुक-सा गया। मुझे भी नौकरी मिल गई थी, बावजूद इसके मैं हर शनिवार व रविवार इन बच्चों को पढ़ाने के लिए लगातार बस्ती में जाती रही। बस्ती में कई बच्चे ऐसे थे, जो 7वीं-8वीं के बाद स्कूल नहीं गए, जिनमें खासतौर पर कई लड़कियां थीं। इस बारे में मैंने उनके माता-पिता से बात की, तो पता चला कि कहीं सरकारी स्कूल 8वीं तक ही थे, तो कई लोग
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प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने में सक्षम नहीं थे। यह सब देखकर मैंने तय किया कि इन बच्चों को सिर्फ सप्ताहांत नहीं, बल्कि रोज पढ़ाऊंगी। पर नौकरी के साथ उन्हें पढ़ाना किसी चुनौती से कम नहीं था। मेरी समझ में आ चुका था कि मेरी खुशी किसी बड़ी कंपनी के साथ नौकरी करने में नहीं, बल्कि इन गरीब व जरूरतमंद बच्चों का भविष्य सुधारने में है। मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी और पूरा समय इन बच्चों के बीच बिताने लगी।
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नौकरी छोड़ने के फैसले पर परिचित और रिश्तेदार बोलते कि, अपना भविष्य खराब करने की क्या जरूरत है, लेकिन मेरे पापा ने प्रोत्साहित करते हुए कहा, यदि तुमने यह ठान लिया है, तो तुम्हारा अभियान ऐसा हो कि तुम वाकई किसी की जिंदगी बदल सको। मैंने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से कुछ रुपये एकत्रित किए और बस्ती के पास ही एक कमरा किराये पर ले लिया। वहां रोज सुबह-शाम दो-दो घंटे मैं इन बच्चों को पढ़ाने लगी। फिर प्राइवेट स्कूलों में इन बच्चों के दाखिले के लिए भी मैंने फंड इकट्ठा किया। धीरे-धीरे, इनमें बहुत बदलाव आया और इनका स्तर ऊंचा उठा। बच्चों की सफलताओं ने मुझे एहसास कराया कि इस काम को मैं अपनी पूरी जिंदगी कर सकती हूं।
इसके बाद मैंने ‘श्वास’ नाम से एनजीओ रजिस्टर करवाया। इन बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए मैंने प्रोफेशनल टीचर रखे हैं। छह बच्चों के साथ शुरू हुआ यह अभियान अब 600 बच्चों तक पहुंच चुका है। यह अभियान गुलबाई टेकरा के अलावा कई बस्तियों तक फैल गया है। मेरा ध्यान केवल इन बच्चों की पढ़ाई पर नहीं है, इन्हें वोकेशनल ट्रेनिंग भी दी जा रही है, ताकि ये हुनर सीखें और आत्म-निर्भर बन सकें। ‘श्वास’ के लिए दो-तीन कंपनियों के सीएसआर से स्पॉन्सरशिप मिलती है, तो बहुत से लोग भी बच्चों के लिए डोनेशन देते हैं। मेरा मानना है कि, आप अपने आस-पास के किसी भी बच्चे को पढ़ाएं और लगातार उसके साथ काम करें। अगर बच्चे की काबिलियत पर भरोसा करें, तो वे जरूर कुछ बेहतर कर सकते हैं।