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मंजिलें और भी हैं : नशे से बाहर निकल ड्रग्स के खिलाफ चला रहा अभियान

Tue, 23 Jul 2019 03:40 AM IST
Avdhesh Kumar पंकी सूद
पंकी सूद Published by: Avdhesh Kumar Updated Tue, 23 Jul 2019 03:40 AM IST
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Campaign run against drug outbreaks
पंकी सूद - फोटो : अमर उजाला
हिमालय से उपहार में मिले प्राकृतिक सौंदर्य के चलते पूरी दुनिया से लोग हिमाचल प्रदेश में घूमने आते हैं। मैं इसी प्रदेश के कुल्लू जिले का रहने वाला हूं। मेरा पारिवारिक व्यवसाय यहां आने वाले पर्यटकों को हिमालयन नेशनल पार्क के आसपास घुमाना था। यहां बहुत सारे लोग ट्रैकिंग करने आते हैं, मैं भी उन लोगों के साथ पहाड़ों की चोटियों की यात्राएं करने लगा। हालांकि बाद मुझे पता चल गया कि यहां लोग सिर्फ घूमने के लिए नहीं आते हैं। वह अपने साथ ड्रग्स लेकर आते हैं, और इन हसीन वादियों में उसका इस्तेमाल करते हैं।
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अक्सर मैं उन लोगों के साथ कभी-कभार सिगरेट पी लेता था, पर बाद में पता चला कि वह सामान्य सिगरेट नहीं, बल्कि ड्रग्स होती थी। उन समूहों के साथ जंगलों में घूमते, पहाड़ों की चोटियों को फतह करते-करते मैं नशे के जाल में फंस गया। सिगरेट से शुरू हुई कहानी, जब कोकीन, एलएसडी, किटमिन, हेरोइन तक पहुंच गई, तब मुझे पता चला कि मैं ड्रग्स का शिकार हो गया। 
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मैं मन में सोचता था कि इससे छुटकारा पाना है, लेकिन शारीरिक इच्छाओं के चलते दोबारा ड्रग्स लेना पड़ता। ड्रग एडिक्शन के चलते मेरा सबकुछ दांव पर लग गया। मैं शारीरिक और मानसिक तौर पर अपने-आपको असहाय महसूस करने लगा। हालांकि इस दौरान मेरे परिवार ने हर संभव मुझे इससे छुटकारा दिलाने की कोशिश की। इस बीच, मेरी शादी यह सोचकर करा दी गई कि जिम्मेदारियां आने पर स्वत: सब सही हो जाएगा। लेकिन मेरी हालत मेरे ही वश से बाहर हो गई थी। 
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मेरे परिवार ने मेरे बाहर आने-जाने पर रोक लगा दी थी, ताकि मुझे ड्रग्स मिल न सके। लेकिन मैं अपने बच्चे को खिलाने का बहाना बनाकर बाहर निकल आता था। वह सर्दियों के दिन थे, शाम हो गई थी। मैंने अपने बच्चे को उठाया और उसे लेकर बाहर आ गया। परिवार को लगा कि बच्चे के साथ है, कहीं नहीं जाएगा। पर मेरे सोचने की शक्ति ऐसे खत्म हो चुकी थी। कुछ महीने के उस बच्चे को दरवाजे के बाहर बर्फबारी में छोड़ कर, मैं नशे की तलाश में निकल गया। 

हलांकि मेरे बड़े भाई तब तक बच्चे को उठाकर अंदर ले जा चुके थे। इसके बाद मैंने इससे बाहर निकलने का निर्णय लिया। मेरे भाई मुझे दिल्ली स्थित नशा मुक्ति केंद्र पर ले गए। मैंने वहां करीब छह माह गुजारे। वहां के काउंसलर मुझसे कहते थे कि, ड्रग्स छोड़ना आसान है, लेकिन उसे छोड़े रखना कठिन है। यह सब बहुत मुश्किल था, लेकिन नामुमकिन नहीं। उन्होंने इससे बाहर निकलने में मेरी बहुत मदद की। 

मैं वहां से ठीक होकर वापस अपने घर आया। नशा मुक्ति केंद्र से वापस आकर मैंने सस्टेनेबल टूरिज्म की शुरुआत की। यहां आने वाले लोगों को हिमाचली संस्कृति से रूबरू करवा रहा हूं। इससे एक तरफ जहां पर्यटकों को संस्कृति की जानकारी मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ मैं यहां के स्थानीय निवासियों को रोजगार भी दे रहा हूं। इससे गांव के लोग रोजगार की तलाश में शहर की दौड़ नहीं लगा रहे हैं। नशे की जड़ें हमारे समाज में बहुत गहराई तक फैल चुकी हैं। 

मैं और मेरी पत्नी, दोनों मिल कर कुल्लू और आसपास के इलाकों के स्कूलों में जाकर बच्चों से बातचीत कर उन्हें नशे के प्रति जागरूक करते हैं। मैं ड्रग एडिक्ट युवाओं को परामर्श देता हूं, साथ ही जरूरत पड़ने पर उन्हें नशा मुक्ति केंद्र भी ले जाता हूं। मेरा मानना है कि, ड्रग एडिक्शन भी एक बीमारी है। ड्रग एडिक्ट व्यक्ति के आस-पास मौजूद लोग उससे संवाद करें और नशा छोड़ने के लिए उसे प्रोत्साहित करें, तो वह इस बीमारी से उबर कर समाज में दोबारा अपनी जिंदगी शुरू कर सकता है।
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