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'प्रकृति के प्रति लगाव से देशभक्ति की भावना जन्मी'

निर्मल वर्मा Updated Mon, 20 Aug 2018 03:16 PM IST
निर्मल वर्मा
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मेरे भीतर यह विश्वास जमता गया, कि देशप्रेम यदि 'आत्मा की घटना' है, तो वह सिर्फ एक ऐसी संस्कृति में पल्लवित होती है, जहां 'स्पेस' और 'स्मृति' अंतर्गुंफित हो सकें। मनुष्य और पशु के संबंध की बात तो अलग रही, उन चीजों का परस्पर संबंध भी बहुत गहरा हो, जो ऊपर से अजीवंत दिखाई देते हैं... पत्थर, नदी, पहाड़, पेड़... अपने अंतर्संबंधों में वे एक जीवंत पवित्रता का गौरव, एक तरह की धार्मिक संवेदना ग्रहण कर लेते हैं।
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यह क्या महज संयोग था कि हमारे यहां प्रकृति के इन आत्मीय उपकरणों के प्रति लगाव ने 'देशभक्ति' की भावना को जन्म दिया, जो राष्ट्र की सेक्यूलर, और संकीर्ण अवधारणा से बहुत भिन्न था? क्या भारत का कोई ऐसा कोना है, जहां रामायण, महाभारत और पौराणिक कथाओं के प्रतीक मनुष्य के अपने जीवन की अर्थवत्ता पाने में सहायक नहीं होते? यदि एक भूखंड में जीता हुआ व्यक्ति एक 'रूपक' में अपने होने का प्रत्यक्षीकरण करता है, तो यह वहीं संभव हो सकता है, जहां भूगोल की देह पर संस्कृति के स्मृति-स्थल अंकित रहते हैं।

पत्थर को छूते हुए कोई देवता, नदी का स्पर्श करते ही कोई स्मृति, पहाड़ पर चढ़ते हुए किसी पौराणिक यात्रा की अंतर्कथा ऐसे पदचिह्न हैं, जिन पर कदम रखते हुए हम अपनी जीवन-यात्रा को तीर्थ-यात्रा में परिणत कर लेते हैं। अतीत में देश के प्रति यह भावना अन्य देशों में भी देखी जा सकती थी, जहां देश-प्रेम का गहरा संबंध संस्कृति और परंपरा की स्मृति से जुड़ा था। मुझे तारकोवस्की की फिल्म मिरर की याद आती है, जिसमें एक पात्र पुश्किन का पत्र अपने मित्र को पढ़कर सुनाता है, और उस पत्र में पुश्किन लिखते हैं, मुझे कभी-कभी अपने देश के प्रति गहरी झुंझलाहट महसूस होती है, पर मैं सौगंध खाकर कहता हूं कि मैं किसी भी कीमत पर अपना देश किसी और देश से नहीं बदलना चाहूंगा।
-ज्ञानपीठ से सम्मानित हिंदी कथाकार

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