अंतर्ध्वनि: दूर की कौड़ी लाने की महत्वाकांक्षा मैंने कभी नहीं की

भवानी प्रसाद मिश्र Published by: देव कश्यप Updated Wed, 11 Sep 2019 12:09 AM IST
सांकेतिक तस्वीर
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कोई भी अनचाहा, बेमन का काम करणीय नहीं होता। कवि और कविता के बारे में जितनी बातें कही और लिखी जाती हैं, उनके आसपास जो प्रकाश-मंडल खींचा जाता है और उन्हें जो रोजमर्रा मिलने वाले आदमियों और इनकी कृतियों से कुछ अलग स्वभाव, प्रेरणाओं और सामर्थ्यों की चीज माना जाता है, वैसा कम से कम अपने बारे में मुझे कभी नहीं लगा। हो सकता है कि मैं कवि ही न होऊं। पुराने कवि मैंने कम पढ़े, नए कवि जो मैंने पढ़े, मुझे जंचे नहीं।
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मैंने जब लिखना शुरू किया, तब अगर मैथिलीशरण गुप्त और सियाराम शरण को छोड़ दें, तो छायावादी कवियों की धूम थी। निराला, प्रसाद और पंत फैशन में थे। ये तीनों ही बड़े कवि लकीरों में मुझे अच्छे लगते थे। किसी एक की भी एक पूरी कविता बहुत नहीं भा गयी, तो उनका क्या प्रभाव पड़ता। वर्ड्सवर्थ की एक बात मुझे बहुत पटी कि कविता की भाषा यथासंभव बोलचाल के करीब हो। तत्कालीन हिंदी कविता इस ख्याल से बिल्कुल दूसरे सिरे पर थी। तो मैंने जाने-अनजाने कविता की भाषा सहज रखी।


प्रारंभ की एक रचना में मैंने बहुत सी बातें की थीं, दो पंक्तियां याद हैं- जिस तरह हम बोलते हैं/ उस तरह तू लिख/ और उसके बाद भी/ हमसे बड़ा तू दिख। मैं भगवान की बात कम करता हूं, जब करता हूं, तो रहस्य की तरह नहीं। क्योंकि इस सिलसिले में मेरे सामने जो कुछ साफ है, वह खूब साफ है और जो साफ नहीं है, उसकी बात करने का अर्थ दूसरों के लिए एक उलझन की संभावना पैदा करने जैसा है। कदाचित इसलिए मैंने अपनी कविता में प्रायः वही लिखा है, जो मेरी ठीक पकड़ में आया है। दूर की कौड़ी लाने की महत्वाकांक्षा मैंने कभी नहीं की। बहुत मामूली रोजमर्रा के सुख-दुख मैंने कविताओं में कहा है, जिनका एक शब्द भी किसी को समझाना नहीं पड़ता- शब्द टप-टप टपकते हैं फूल से, सही हो जाते हैं मेरी भूल से।

(दिवंगत हिंदी कवि।)

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