अंतर्ध्वनि: देश से प्यार करने वाला ही आलोचना का अधिकारी है
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देखा जाए तो यह 'विचार तत्व' ही है, जो हमारे राष्ट्रीय जीवन की विपन्नता और ऐतिहासिक दुर्घटनाओं के बावजूद इस देश को बचाए रखने में सफल हुआ है। देश-विभाजन से बड़ी भीषण दुर्घटना और क्या हो सकती थी? यदि गांधी जी के लिए यह उनके जीवन का सबसे मर्मांतक घाव था, तो इसलिए कि आज के अनेक राजनेताओं की तरह उनके लिए देश की भौगोलिक अखंडता सिर्फ एक संविधानिक बात नहीं थी, जहां सिर्फ देश की सीमाओं को सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण हो। इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि इन सीमाओं के भीतर शताब्दियों से हमारे पुरखों-पूर्वजों ने एक-दूसरे के साथ अपने अनुभवों, स्मृतियों, स्वप्नों का साझा किया था-एक जीवित संग्रहालय- जिसमें कला, साहित्य और दर्शन की असाधारण रचनाएं सृजित हुई थीं। एक देश की पहचान सिर्फ उन लोगों से नहीं बनती, जो आज उसमें जीते हैं, बल्कि उनसे भी बनती है, जो एक समय में जीवित थे और आज उसकी मिट्टी के नीचे दबे हैं। समय के बीतने के साथ भूमि की भौगोलिक सीमाएं धीरे-धीरे संस्कृति के नक्शे में बदल जाती हैं। एक के खंडित होते ही दूसरे की गरिमा को भी चोट पहुंचती है। हमें कभी अपने सामाज की कुरीतियों, अपने सत्ताधारी नेताओं की स्वार्थ लिप्साओं को अपने देशप्रेम से गडमड नहीं करना चाहिए। मेरे लिए मेरा देश, मेरे राजनीतिक, सैद्धांतिक आग्रहों से कहीं ऊपर है....या होना चाहिए। गांधी से बड़ा भारत-प्रेमी कौन हो सकता था, लेकिन वह भारतीय समाज के सबसे बड़े आलोचक भी थे-क्योंकि जो व्यक्ति हृदय से अपने देश से प्यार करता है, उसे ही आलोचना का अधिकार भी प्राप्त होता है।
-दिवंगत हिंदी साहित्यकार