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अंतर्ध्वनि : काव्य-कला समेत जीवन के सारे व्यापार लीला ही हैं
Tue, 28 May 2019 07:48 PM IST
Gaurav Pandey
शमशेर बहादुर सिंह
शमशेर बहादुर सिंह
Published by: Gaurav Pandey
Updated Tue, 28 May 2019 07:48 PM IST
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दिवंगत साहित्यकार शमशेर बहादुर सिंह
- फोटो : फाइल फोटो
कवि का कर्म अपनी भावनाओं में, अपनी प्रेरणाओं में, अपने आंतरिक संस्कारों में, समाज-सत्य के मर्म को ढालना-उसमें अपने को पाना है और उस पाने को अपनी पूरी कलात्मक क्षमता से पूरी सच्चाई के साथ व्यक्त करना है, जहां तक वह कर सकता हो। कविता में सामाजिक अनुभूति काव्य-पक्ष के अंतर्गत ही महत्वपूर्ण हो सकती है। काव्य-कला समेत जीवन के सारे व्यापार एक लीला ही हैं और यह लीला मनुष्य के सामाजिक जीवन के उत्कर्ष के लिए निरंतर संघर्ष की ही लीला है।
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भाषा की जान होता है मुहावरा। अगर कविता (जिसे कहते हैं) ‘जीवन से फूटकर’ निकलती है, तो उसमें जीवन की सारी बेताब उलझनें और आशाएं और शंकाएं और कोशिशें और हिम्मतें कवि के अंदर की पूरी ईमानदारी के साथ अपने सरगम के पूरे बोल बजाने लगेंगी। कला कैलेंडर की चीज नहीं है। वह कलाकार की अपनी बहुत निजी चीज है। जितनी ही अधिक वह उसकी अपनी निजी है, उतनी ही कालांतर में वह औरों की भी हो सकती है।
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अगर वह सच्ची है, कला-पक्ष और भाव-पक्ष दोनों ओर से। वह ‘अपने-आप’ प्रकाशित होगी। और कवि के लिए वह सदैव कहीं न कहीं प्रकाशित है, अगर वह सच्ची कला है, पुष्ट कला है। प्रकाशन-प्रदर्शन औसत-अक्षम कलाकार को खा जाता है। प्रभाव सभी कवियों और कलाकारों पर पड़ते हैं। अनोखी और अजीब और नई चीजें जरूरी नहीं कि बेशकीमती भी हों। वह परखने पर हल्की और घटिया भी हो सकती हैं। सारी कलाएं एक-दूसरे में समोई हुई हैं, हर कला-कृति दूसरी कलाकृति के अंदर से झांकती है। भाषा की अवहेलना किसी भी रचना को सहज ही साहित्य के क्षेत्र से बाहर फेंक देती है और शिल्प की अवहेलना कला के क्षेत्र से।
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-हिंदी के दिवंगत साहित्यकार