फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Literature ›   Akhilendra Mishra film actor writing a play on hindi language

हिंदी भाषा को लेकर एक नाटक लिख रहा हूं : अखिलेन्द्र मिश्रा

Wed, 17 Jan 2018 05:15 PM IST
संजीव ‘मजदूर’ झा
संजीव ‘मजदूर’ झा Updated Wed, 17 Jan 2018 05:15 PM IST
विज्ञापन
Akhilendra Mishra film actor writing a play on hindi language
अखिलेन्द्र मिश्र
इप्टा द्वारा पोषित और अपनी सांस्कृतिक विरासत को मुंबई फ़िल्म उद्योग की रौनक से चकाचौंध न होने देने वाले छपरा के कलाकार अखिलेन्द्र मिश्रा से मिलना मन को ठीक वैसे ही तृप्त करता है जैसे वर्षों बाद संगम को देखकर साधू-सन्यासी तृप्त होते हैं।
विज्ञापन


लेकिन संगम देखना और उसमें डूब कर उसे जानना दोनों अलग-अलग अनुभव प्रदान करता है। इसी प्रकार उनके ‘एक्ट’ से मनोरंजित होना और उनके व्यक्तित्व को जानना दोनों अलग अनुभव की ओर ले जाता है।
विज्ञापन


साहित्य का शोधार्थी होने के बावजूद सिनेमा के लोगों को पढ़ने-जानने के मेरे अनुभव हिंदी सिनेमा के कलाकारों के प्रति जो मेरे अंदर छवि बन रही थी, वह सराहनीय नहीं थी। इसके अपने कारण भी थे, जैसे भाषा के स्तर पर देखें तो सारे कलाकारों के संवाद रोमन लिपि में चलते हैं जबकि फ़िल्म का समूचा व्यवसाय हिंदी पर टिका होता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

देवनागिरी लिपि के प्रयोग की समझ कलाकारों में लगभग ख़त्म होने के कगार पर है। यह कोई सामान्य समस्या नहीं है। किसी भी भाषा का प्रयोग से हटना उसके खात्मे की प्रक्रिया की मजबूत शुरुआत होती है। जो लोग ‘क्रियोलाईजेशन’ जैसे भाषाई विमर्शों के प्रति जागरूक हैं वे इस बात से भली-भांति परिचित भी हैं।

अखिलेन्द्र मिश्रा इस तरह के विमर्शों से सिर्फ़ परिचित ही नहीं बल्कि इन समस्याओं के सुलझे हुए व्याख्याकार भी हैं और यही कारण है कि पूर्व से मेरे अंदर बन रहे सिनेमाई कलाकारों की छवि को वे तोड़ते भी हैं।
 
अपने बच्चों की भाषा और स्कूलों के निर्देश पर वे बताते हैं कि – “जब स्कूल से फ़ोन आया कि आप अपने बच्चों के साथ किस भाषा में बात करते हैं? तब मैंने कहा- हिंदी। लोगों ने कहा बच्चों को हिंदी मत बोलने दीजिए, लेकिन मैं कैसे अपने बेटे से कह सकता हूँ कि जो हिंदी तुम्हें बहुत पसंद है तुम उस हिंदी भाषा में बात मत करो?”

अखिलेन्द्र मिश्रा इस बात को कहते हुए नम हो जाते हैं और कुछ ही पल में तनकर पुनः कहते हैं- “मैं अपने बच्चों पर दवाब नहीं डालूँगा हुजूर, वह भविष्य में अच्छी हिंदी बोले मुझे इससे बड़ी संतुष्टि मिलेगी, आखिर वह भाषा उसकी भी धरोहर है।”

अखिलेन्द्र जी का यह अभिभावकीय व्यक्तित्व वैचारिक स्तर पर बहुवचनात्मक अर्थ में दृष्टि प्रदान करता है और उन क्षणभंगुर अभिभावकों पर ज़ोरदार तमाचा भी लगाता है जो प्रसिद्ध होते ही इस प्रयास में जुट जाते हैं कि कैसे अतीत से उनका और उनके बच्चों का पीछा छुटे।

राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी भाषा को लेकर क्या हमें ऐसे अभिभावकीय व्यक्तित्व की आवश्यकता नहीं है? अखिलेन्द्र जी इस बात को महसूस करते हैं और भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रतापनारायण मिश्र से लेकर बालकृष्ण भट्ट तक को सरलता से परिभाषित भी करते हैं तथा साथ ही आधुनिक राजनैतिक दौर की व्याख्या में वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी को लेकर एक अच्छे प्रयास की हिमायत भी करते हैं।

मेरे लिए उनकी चिंता और उनकी व्याख्या के इस स्तर को देखना-सुनना किसी आश्चर्य से कम नहीं था। ऐसा इसलिए भी था कि नए जेनरेशन में सिनेमा तो दूर की कौड़ी समझिए, साहित्य में भी अब बहुत कम लोग हैं जो भाषा को लेकर इतने अधिक जागरूक हैं। उनकी चिंता सतही  नहीं बल्कि ‘अकादमिक’थी. 

 प्रोफ़ेसर कर्मेंदु शिशिर संतुष्टि के भाव में कहते हैं अच्छा लगता है जब सिनेमा के लोगों में भाषा को लेकर इतनी चिंता दिखती है।
 
प्रोफ़ेसर कर्मेंदु जी की संतुष्टि अनायास ही नहीं थी, वे जानते हैं कि जब चिंतन के स्वरूप का स्तर ऐसा होता है तब कहीं न कहीं इसका प्रयोग भी सामाजिक स्थितियों में होता है और ऐसे प्रयोग आने वाली नस्लों को दिशाहीन होने से बचाने का उपक्रम करती है।

​इसे इस रूप में भी समझा जा सकता है कि जब मैंने अखिलेन्द्र जी से पूछा कि आप इस पर कुछ करते क्यों नहीं। तब उन्होंने बताया कि अब वे इन विषयों पर नाटक की तैयारी कर रहे हैं। जिसमें हिंदी भाषा को लेकर एक नाटक वे स्वयं लिख रहे हैं और कुछ नाटकों का प्रस्तुति के लिए चुनाव भी कर रहे हैं।
 
चार घंटे की इस लंबी बातचीत में अखिलेन्द्र जी ने भाषा-बोली के रास्ते समूचे भारतीय संस्कृति का एक प्रगतिशील दृष्टि से दर्शन करवाया और हमारे जैसे युवा लेखकों को भाषा के प्रति उत्साहित भी किया।

यह उत्साहित करने की प्रक्रिया में उनसे अभी हमारे समाज को कला के रूप में अभी और भी बहुत कुछ मिलना बाकि है। 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed