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नवाज शरीफ की बढ़ती मुश्किलें
मरिआना बाबर
Updated Thu, 21 Apr 2016 07:23 PM IST
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पाकिस्तान के मशहूर लेखक दिवंगत अर्देशिर कावसजी ने पाकिस्तानी नेताओं को चोर बताया था। उनकी मौत के बाद फिर उनके शब्दों को तब याद किया जा रहा है, जब पनामा पेपर्स के खुलासों ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को चिकित्सीय कारणों से लंदन जाने के लिए मजबूर कर दिया। उनके लंदन दौरे को संयोग नहीं कह सकते, न ही तबीयत खराब होने के उनके बहाने पर कोई यकीन करने वाला है।
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पनामा पेपर्स के सामने आने से शरीफ परिवार के सदस्यों की विदेशी संपत्ति का पता चला है। प्रधानमंत्री के बच्चे मरियम, हसन और हुसैन या तो कंपनियों के मालिक थे या कई कंपनियों में लेन-देन के लिए अधिकृत थे। मरियम को इन दस्तावेजों में ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड स्थित निलसन इंटरप्राइजेज लिमिटेड एवं नेस्कोल लिमिटेड की मालकिन बताया गया है। एक दस्तावेज में निलसन इंटरप्राइजेज का पता सऊदी अरब के जेद्दा में सरूर पैलेस बताया गया है। जून, 2012 के एक दस्तावेज में मरियम सफदर को 'लाभार्थी मालकिन' बताया गया है।
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दस्तावेजों के अनुसार, हुसैन एवं मरियम ने जून, 2007 में एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए, जो लेने-देन की शृंखला का एक हिस्सा था, जिसमें ड्यूश बैंक, जिनेवा से 1.38 करोड़ डॉलर नेस्कोल, निलसन और अन्य कंपनियों को लंदन की संपत्तियों के साथ सहायक कंपनी के तौर पर दिया गया।
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हसन नवाज शरीफ को फरवरी, 2007 में ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड में बनी हैंगॉन प्रोपर्टी होल्डिंग लिमिटेड का एकमात्र निदेशक बताया गया है, जिसने अगस्त, 2007 में करीब 1.12 करोड़ में लाइबेरिया स्थित कॉस्कॉन होल्डिंग्स इस्टेब्लिशमेंट लिमिटेड को अधिगृहीत किया। विदेशी कंपनियों का उपयोग पूरी तरह से कानूनी है, लेकिन प्रधानमंत्री को अरबों डॉलर की टैक्स चोरी साबित करनी होगी और यह भी साबित करना होगा कि यह उनके बच्चों की मेहनत की कमाई है, जो विदेशों में जमा है और इसमें उनकी कोई संलिप्तता नहीं है, उनके उपक्रमों में उन्होंने कोई निवेश नहीं किया है और मामले की जांच के लिए स्वतंत्र आयोग की मांग को स्वीकार करने के लिए वह तैयार हैं। विदेशी सरकारों से पाकिस्तान सरकार को यह मांग करनी होगी कि विदेशी खातों के लाभार्थी मालिकों के बारे में सूचनाओं का खुलासा करें और उसे उपलब्ध कराएं। लेकिन क्या शरीफ सरकार के पास इतना नैतिक साहस है कि वह अपने बारे में सूचनाओं का खुलासा करने की मांग करेगी?
यह हास्यास्पद ही था कि नवाज शरीफ के बच्चों की टैक्स चोरी के मामले में विपक्ष ने जब एक न्यायिक आयोग बनाने की मांग की, तब प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकर्ताओं को इमरान खान की पूर्व पत्नी जेमिना खान के लंदन स्थित घर के बाहर प्रदर्शन करने भेज दिया। प्रधानमंत्री की गैरमौजूदगी में जब इस धन को छिपाने के बारे में कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं आया, तब सरकार पर सच सामने लाने का भारी दबाव पड़ा। तभी सेना प्रमुख राहील शरीफ ने कहा, पाकिस्तान की एकता, अखंडता और समृद्धि के लिए सबका समान रूप से जवाबदेह होना जरूरी है। साथ ही, उन्होंने जोड़ा कि आतंक के खिलाफ युद्ध तब तक नहीं जीता जा सकता, जब तक कि भ्रष्टाचार को पूरी तरह से उखाड़कर नहीं फेंका जाता। इससे पहले सीनेट के चेयरमैन, पीपीपी के रजा रब्बानी ने चेतावनी दी थी कि अगर शरीफ परिवार पारदर्शी जबावदेही प्रक्रिया का पालन नहीं करते, तो गैर राजनीतिक ताकतें लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पटरी से उतारने के लिए प्रदर्शनकारियों का समर्थन करेंगी।
ज्यादातर लोग नवाज शरीफ के इस स्पष्टीकरण पर यकीन नहीं करते कि वह और उनका परिवार जब निर्वासन में सऊदी अरब गए थे, तब उनके पिता ने एक स्टील विनिर्माण संयंत्र की स्थापना के लिए अल-बुराक बैंक से उधार लिया था। उसी उपक्रम के लाभ को विदेशी खाते में हस्तांतरित किया गया। फिलहाल सरकार और विपक्ष किसी ऐसे विश्वसनीय व्यक्ति की तलाश में हैं, जो जांच का नेतृत्व स्वीकार करने के लिए तैयार हो, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश जाहेर जमाली ने जांच समिति का नेतृत्व करने से यह कहकर इन्कार कर दिया कि जांच कराना कार्यपालिका का काम था।
पाकिस्तान का इतिहास बताता है कि भले ही बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो, लेकिन कभी भी कोई आयोग सच सामने नहीं ला पाया, न ही किसी दोषी को कभी दंड दिया गया। पीटीआई और पीपीपी इस बात पर सहमत हैं कि न्यायिक आयोग और एक अंतरराष्ट्रीय फॉरेंसिक लेखा कंपनी पाकिस्तान में पनामा लीक की फॉरेंसिक जांच करे। विपक्ष के एक नेता एतिजाज अहसन कहते हैं कि अगर प्रधानमंत्री अपनी और अपने परिवार की संपत्ति की घोषणा कर दें, तो जांच की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी। वह आगे कहते हैं कि अगर उन्होंने पारदर्शी तरीके से संपत्ति अर्जित की है, तो संपत्ति के खुलासे में क्या हर्ज है?
नवाज शरीफ ने इस मामले की जांच के लिए एक आयोग बनाने की घोषणा की है। असल में नवाज शरीफ के लिए चिंता की बात यह है कि चुनाव में मात्र दो वर्ष बचे हैं (हालांकि उनके पद छोड़ने की मांग उठने लगी हैं), लेकिन यह पहले भी हो सकता है। आम तौर पर राजनेताओं या सरकार के खिलाफ आरोप विपक्ष की ओर से लगाए जाते हैं, लेकिन पनामा लीक मामले में यह काम एक अंतरराष्ट्रीय निकाय ने किया है, जिसकी शरीफ के साथ कोई शत्रुता नहीं है। ऐसे में नवाज शरीफ किसे दोष देंगे? उनके सामने खुद को साफ-सुथरा साबित करने के सिवा कोई चारा नहीं है। अगर वह ऐसा नहीं करते हैं, तो इसकी कोई गारंटी नहीं है कि अगले चुनाव में उन्हें मतदाताओं का समर्थन मिलेगा। यह बदला हुआ पाकिस्तान है, जहां मतदाता भ्रष्ट लोगों से जवाब मांगता है और मीडिया भी यह सुनिश्चित करेगा कि शरीफ जवाब दें।
संक्षेप में कहें, तो शरीफ अपने अतीत के कारनामों के साथ पकड़े गए हैं और वास्तव में फंस चुके हैं। क्या वह इससे उबर पाएंगे, यही सवाल आज सबके जेहन में है।
लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं