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क्या केरल में बदलेगा रुझान

Wed, 20 Apr 2016 07:11 PM IST
जी. श्रीदत्तन
जी. श्रीदत्तन Updated Wed, 20 Apr 2016 07:11 PM IST
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If trend will change in kerala
जी श्रीदत्तन

एक खबरिया टीवी चैनल द्वारा हाल में किए गए सर्वे के मुताबिक, केरल के वर्तमान मुख्यमंत्री ओमान चांडी आगामी चुनाव में मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं। वहीं, विपक्ष के नेता वीएस अच्युतानंदन ज्यादातर लोगों की दूसरी पसंद माने जा रहे हैं। इससे तो यही जाहिर होता है कि भ्रष्टाचार के मामलों के बावजूद ओमान चांडी की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। लेकिन केरल के नतीजे चुनाव विश्लेषकों के लिए हमेशा एक बुरा सपना ही साबित हुए हैं। इस बार परिस्थितियां ज्यादा जटिल हो गई हैं। इस राज्य में दो दशक से अधिक समय तक दो राजनीतिक मोर्चे-लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) वैकल्पिक रूप से शासन करते रहे हैं। लेकिन पिछली बार करीबी मुकाबले में जब यह लग रहा था कि केरल इस रुझान के खिलाफ खड़ा है, तो ओमान चांडी के नेतृत्व में यूडीएफ को मामूली बढ़त मिल गई थी।

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केरल की राजनीति अत्यधिक ध्रुवीकृत है। ऐसे में चुनावी पंडितों के लिए नतीजों का अनुमान लगाना कठिन हो जाता है, खासतौर पर जब कोई स्पष्ट रुझान नजर न आ रहा हो। किसी भी गठबंधन के पक्ष में दो फीसदी का रुझान सीटों का पूरा गणित बिगाड़ सकता है। जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में सरकार बनाने में सफल रही भारतीय जनता पार्टी मजबूत कैडर एवं काफी काम करने के बावजूद केरल में खाता तक नहीं खोल सकी है। लेकिन भाजपा के समर्थकों और राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि इस बार परिस्थितियां अलग हैं।
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केरल का अपना एक खास जनसांख्यकीय ढांचा है। वहां हिंदू समुदाय सबसे बड़ा धार्मिक समूह होने के बावजूद सबसे अधिक बंटा हुआ है। 26 प्रतिशत मुस्लिम और 18.5 प्रतिशत ईसाई अल्पसंख्यक लगभग हर बार कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के साथ खड़े रहे हैं। एलडीएफ द्वारा मजबूती से खुद को धर्मनिरपेक्ष गठबंधन के रूप में पेश किए जाने के बावजूद अल्पसंख्यकों का उसे साथ नहीं मिला है। जब कभी 'सांप्रदायिक' यूडीएफ के खिलाफ हिंदू ध्रुवीकरण हुआ है, तो सीपीएम के नेतृत्व वाले एलडीएफ को फायदा हुआ है, ऐसे में उन्हें भाजपा के रूप में एक जिताऊ विकल्प मिल गया है। नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में आने के बाद भाजपा का मत प्रतिशत भी केरल में भी बढ़ा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने तिरुवनंतपुरम सीट को बेहद कम अंतर से गंवाया था। इस तरह भाजपा केरल की राजनीति में एक निर्णायक फैक्टर बनकर उभरी है, जो यह तय करेगा कि किस गठबंधन को चुनाव में बहुमत मिलेगा। इससे पहले, जब भी भाजपा को ज्यादा मत मिले, तो यूडीएफ को नुकसान उठाना पड़ा है। लेकिन, भाजपा को एलडीएफ के हिस्से के वोटों पर सेंध लगाने में काफी समय लगा। पिछले स्‍थानीय निकाय चुनाव और अरुविक्कारा विधानसभा सीट पर हुआ उप-चुनाव इसका गवाह रहा है।
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केरल की आबादी में 24 प्रतिशत प्रभावशाली एझवा समुदाय के लोग हैं, जो वाम दलों का प्रमुख आधार माने जाते हैं। यह समुदाय भाजपा के करीब आ रहा है। एझवा समुदाय के सबसे ताकतवर नेता वेलापल्ली नातेसन ने भारत धर्म जनसेना नामक राजनीतिक (बीडीजेएस) पार्टी बनाकर भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ गठजोड़ किया है। राजग इस बार के चुनाव में कई प्रमुख हस्तियों को अपने उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतारने में कामयाब हुआ है। क्रिकेटर श्रीसंत तिरुवनंतपुरम सीट पर भाजपा के उम्मीदवार के हैं। तेजतर्रार आदिवासी नेत्री सीके जानू सुल्तानबत्तेरी से राजग उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रही हैं। भाजपा को उम्मीद है कि वह इस चुनाव में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरेगी। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़कर 10.3 हो गया और 2015 के स्‍थानीय निकाय चुनाव में पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़कर 13.3 तक पहुंच गया, जो अब तक उसका सर्वाधिक है।

ओमान चांडी के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी रही है। मुख्यमंत्री के निजी स्टाफ संदिग्ध भूमि सौदों और अन्य भ्रष्ट गतिविधियों में शामिल रहे हैं। सौर घोटाले में आरोपी सरिता नायर ने जांच पैनल को बताया कि उन्होंने मुख्यमंत्री को एक करोड़ रुपये से अधिक दिए हैं! कांग्रेस के भीतर आंतरिक झगड़े भी यूडीएफ की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। लेकिन इसके पक्ष में जो एक बात है, वह अल्पसंख्यकों का संभावित जुड़ाव ही है।

हालांकि माकपा के भीतर गुटीय झगड़ों पर नियंत्रण किया गया है, लेकिन उसकी 'हत्या की राजनीति' के खिलाफ लोगों में भारी नाराजगी भी है। 93 वर्षीय वीएस अच्युतानंदन माकपा के लोकप्रिय नेता बने हुए हैं, लेकिन लोगों को लग रहा है कि अगर एलडीएफ जीतती है, तो उनके प्रबल विरोधी पिनरायी विजयन मुख्यमंत्री बन जाएंगें। हालांकि खुद पिनरायी भी एक घोटाले में आरोपी हैं।


चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में अभी एलडीएफ को बढ़त दिख रही है, पर भाजपा का प्रदर्शन पार्टी की योजना को बना या फिर बिगाड़ सकता है। माकपा और कांग्रेस के लिए यह ‘करो या मरो’ की स्थिति है। कांग्रेस एक के बाद एक राज्य खोती जा रही है। असम में पार्टी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। अगर केरल में कांग्रेस जीत गई, तो राष्ट्रीय राजनीति में कमजोर हो रही इस पार्टी के लिए यह एक जीवनदान होगा। माकपा अगर केरल को जीतने में विफल रही, तो इससे पिनारयी और महासचिव सीताराम येचुरी के नेतृत्व पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा।

वरिष्ठ पत्रकार

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