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अकाल: जवाबदेही का सवाल
रीतिका खेड़ा
Updated Wed, 11 May 2016 03:36 PM IST
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रीतिका खेड़ा
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अकाल से संबंधित परिस्थिति काफी समय से गंभीर है। पिछले साल ही, ललितपुर, बांदा समेत बुंदेलखंड के अन्य जिलों से खबर आई थी कि पानी और खाद्य सुरक्षा को लेकर लोग परेशान हैं। महाराष्ट्र से भी पानी की किल्लत की खबरें हैं। यहां तक कि एक आठ-वर्षीया बच्ची की उस हैंडपंप पर लू से मौत हो गई, जहां वह अपने परिवार के लिए पानी लेने जाती थी।
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देश में अकाल कोई नई बात नहीं है। यही वजह है की सरकार ने ‘सुखाड़ मैनुअल’ बना रखे हैं, जिनमें सूखा से संबंधित परेशानियों को समय पर चिह्नित करने के संकेत दिए गए हैं। मसलन, इनमें कहा गया है कि ‘अनावरी’ रिपोर्ट पर ध्यान रखा जाए, क्योंकि इससे बुवाई के समय ही पता चल सकता है की पैदावार में समस्या तो नहीं आने वाली। साथ ही, पानी की किल्लत, पलायन और सामाजिक अशांति पर भी निगरानी रखने की बात है। इसके बावजूद केंद्रीय मंत्री का मानना है कि सूखा ऐसी परिस्थिति नहीं, जिसके लिए सरकार तैयारी और प्लानिंग कर सकती है।
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इस सुखाड़ मैनुअल में सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदम भी शामिल हैं। सूखे की स्थिति में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह लोगों को रोजगार मुहैया करवाए और लोगों को बाजार में कीमतों और आपूर्ति के उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए, सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा उचित मूल्य पर अनाज उपलब्ध करवाए।
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सवाल यह उठता है कि इस अकाल में इन सब का किस हद तक इस्तेमाल किया जा रहा है? इसे समझने के लिए, सूखाग्रस्त बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश वाले जिलों की तुलना उत्तर प्रदेश वाले जिलों से करने पर पता चलता है कि अकाल में एनएफएसए कितनी अहम भूमिका निभा सकता है। मध्य प्रदेश में इसे 2014 में लागू करने का काम शुरू हुआ और जुलाई, 2015 में हमने पाया कि ज्यादातर लोगों के पास एनएफएसए के नए राशन कार्ड/पर्ची थे और वे नियमित रूप से दो रुपये किलो के हिसाब से प्रति व्यक्ति पांच किलो अनाज अनाज पा रहे थे। अनाज की चोरी भी काफी कम हुई है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री ऐलान कर रहे हैं कि राज्य में एनएफएसए लागू हो चुका है, मगर सच्चाई यह है कि कई गांवों में नए राशन कार्ड/पर्ची अब तक नहीं पहुचें। लोगों को इसकी जानकारी भी नहीं है कि राशन कार्ड की नई सूची में उनका नाम होगा या नहीं। लोगों को तो छोड़िए, ललितपुर में कुछ डीलरों के पास भी नई सूची नहीं पहुची! अनाज का आवंटन नई सूची में दर्ज संख्या के अनुसार होना है, लेकिन सूची न होने की वजह से, डीलर को पता नहीं कि पुरानी सूची के अनुसार बांटें कि नई सूची का इंतजार करें।
बुंदेलखंड क्यों, राजधानी लखनऊ से 23 किलोमीटर की दूरी पर बक्शी का तालाब प्रखंड के फतेहपुर खेमराई ग्राम पंचायत में लवी पंत (शोधकर्ता) ने पाया कि भले ही खाद्य आपूर्ति विभाग वहां गांवों में 360 नए कार्ड बांटने का दावा करता है, लेकिन गांव में लोगों को एक भी कार्ड नहीं मिला है। वास्तव में, पुरानी सूची के 10 परिवारों को अनाज बंट रहा है। इन पंक्तियों को लिखते वक्त जब मुख्यमंत्री का ट्वीटर हैंडल खंगाला गया, तो अप्रैल में लगभग 30 ट्वीट में से मात्र तीन ट्वीट ही खाद्य सुरक्षा और पेंशन से संबंधित थे। जब मुख्यमंत्री ही एनएफएसए के काल्पनिक क्रियान्वयन से संतुष्ट हैं, तो जमीनी अधिकारी पर क्या दबाव पड़ेगा। वे भी निश्चिंत बैठे हैं। ऐसे में जवाबदेही किसकी बनती है? क्या राज्य सरकार और प्रशासन लोगों के प्रति जवाबदेह नहीं है? विपक्षी दलों को क्या एनएफएसए के झूठे क्रियान्वयन को लेकर आवाज नहीं उठानी चाहिए? अचरच इस पर है कि अगले साल राज्य में चुनाव होने हैं, तब भी सरकार और विपक्ष मौन हैं।
अकाल की स्थिति में, सरकार के लिए मनरेगा एक मजबूत हथियार हो सकता था, लेकिन इसे भी कुंद कर दिया गया। अकाल से संबंधित रिपोर्टें आ रही हैं, लेकिन राज्य और केंद्र सरकारें काम खोलने के लिए औपचारिक रूप से काम की मांग का इंतजार करती हैं। औपचारिक प्रक्रिया को ज्यादा जटिल बना दिया गया है-पहले मजदूर को रोजगार सेवक द्वारा काम की मांग स्वीकृत करवानी होगी। रोजगार सेवक इसे स्वीकृत करने से कतराता है, क्योंकि यदि 15 दिनों के अंदर काम नहीं खुला, तो उस पर बेरोजगारी भत्ते का डर रहता है। इसके बाद, काम खोलने की प्रक्रिया शुरू होगी, जिसमें ईएमआर बनेगा। यानी, जिन मजदूरों ने काम मांगा, उनके नाम कंप्यूटर में चढ़ाए जाएंगे, फिर काम खुलेगा। मनरेगा में काम पा लेना ही एक बड़ी जीत है। इसके बाद, भुगतान की लड़ाई है। चूंकि पिछले साल बजट कम था, इसलिए जनवरी-फरवरी में हुए काम का भुगतान अप्रैल में किया गया।
उपर से कुछ राज्य सरकारें मनरेगा, पीडीएस और वृद्धावस्था-विधवा पेंशन में आधार कार्ड को अनिवार्य बनाने में लगी हुई हैं। चित्रदुरगा (कर्नाटक) में मजदूरों ने काम किया, लेकिन जब कुछ महीने बाद भुगतान की नौबत आई, तो पाया गया कि उनके नाम मनरेगा सॉफ्टवेयर से गायब थे। जांच में पाया गया कि केंद्र से ‘आधार-सीडिंग’ पर इतना जोर था कि डाटा-एंट्री ऑपरेटर ने उन मजदूरों के नाम ही काट दिए गए, जिनका आधार नंबर नहीं था। राजस्थान में बुढ़ापा और विधवा पेंशन पानेवाले परेशान हैं, क्योंकि पहले गांवों में डाकिये द्वारा दी जाने वाली पेंशन के लिए अब उन्हे बैंक जाना पड़ रहा है। बैंक जाकर पेंशन की निकासी के लिए उन्हें अपने बेटे-पोतों का मुंह ताकना पड़ता है। इन वजहों से लोग योजनाओं से वंचित हो जाते हैं, तो सरकार बताती है कि आधार से पैसों की ‘बचत’ हुई है। आज जवाबदेही खोखला शब्द बनकर रह गया है। यदि सरकार इस समस्या को लेकर गंभीर है, तो केंद्र एवं राज्य सरकारों को मिलकर हर पंचायत में मनरेगा का एक काम लगातार खुला रखना होगा। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार को खाद्य सुरक्षा कानून तेजी से लागू करना चाहिए।
लेखिका किंग्स कॉलेज, लंदन में आईसीसीआर विजिटिंग प्रोफेसर हैं और आईआईटी, दिल्ली में पढ़ाती हैं